कवयित्री: डॉ. अर्चना प्रकाश

आज की लड़की
कस कर मुँह पर कपड़ा बांधे ,
मनी बैग महँगा धरे काँधे ।
आते जाते स्कूटरों पर ,
नजर मिलाती पैनी आँखें ।
घर वालों को राह दिखाये ,
धंधे के गुर नये सिखाये ।
कीमतदार मोबाइल ले कर ,
बड़े बड़ो की खोले आँखे ।
बदला पहनावा बदली सोचें ,
किन्तु न बदली मन की पाँखें ।
मन को तन से बांधे बाँधे ,
खोल रही सदियों की गांठें ।
बदले संस्कृतियों के ताने बाने ,
संयम संस्कारों के नये पैमाने ।
सुख दुःख के नये घरोंदे खोदे,
चिरयौवन की भरे उड़ाने ।
धर्म धरा सी बहकी बहकी ,
पूरब पश्चिम का फर्क मिटाये ।
आज की लड़की सबको भरमाये !

करोना
कॅरोना है क्या ?
ये खौफ़ की हवा है ,
दिलों में समाई दहशत ,
आसन्न मृत्यु की पुकार है।
जन्मा ये चीन में ,
करता भृमण सारे विश्व में ।
अकेलो से डरता है ,
करे न इन पर वार ।
कोरोना अहंकार है ,
स्वयम आता नहीं घर में।
बाहर ही करे इंतजार ,
जाओ गे बाहर तो आये साथ ।
कॅरोना सन्नाटा है ,
रंग रूप से बेज़ार ।
वाणी शब्दोंसे लाचार ,
साँय साँय से करे सम्वाद ।
कोरोना असुर है ,
मांसाहार असंयम से ,
अस्वछता से करे प्यार ।
मलिन बस्तियों में ये गुलजार ।
कॅरोना रक्तबीज है ,
समूहों समुदायों में करे अट्टहास ।
एकांत क़वारन्टीन का,
कराता अभ्यास ।
कॅरोना वॉयरस है महामारी है,
इसके नाश की भारत में तैयारी है ।
किन्तु जो स्वच्छ है ,
सयंमित शाकाहारी है ।
योग सम्पन्न एकांती है ,
कॅरोना उनके लिए ,
कुछ भी नहीँ।
उन्हें कॅरोना का डर नहीँ ।

कवियत्री अर्चना प्रकाश


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