धारावाहिक उपन्यास भाग 01 : सुलगते ज्वालामुखी

धारावाहिक उपन्यास

सुलगते ज्वालामुखी

लेखिका – डॉ अर्चना प्रकाश

जुलाई का महीना प्रकृति व प्राणी दोनों ही के लिए उत्साह परिवर्तन व उथल पुथल से भरा होता है। सावन का प्रारम्भ होने से एक ओर प्रकृति तपती गरमी से राहत पाती है, तो दूसरी ओर हाई स्कूल इन्टर की परीक्षा परिणाम से युवावर्ग भी अति उत्साहित रहता है। यू° भी विद्यार्थी जीवन मनुय के जीवन का स्वर्ण काल माना गया है। एैसे में किशोर व युवाओं के लिए ये समय उपलब्धियों भरा ही रहा है।

मुशीरा, सुनीता, यशोदा और जीनत भी इन्टरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास हुई। हर्ष एवम् उत्साह से भरपूर चारों मिल कर साथ बैठी तो भविष्य की बातें शुरू हो गई।

‘‘मेरे मम्मी पापा कहते हैं कि यूनीवर्सिटी में एक से एक उम्रदराज लड़के आते हैं और आये दिन वहा° कोई न कोई फसाद होता ही रहता है। यशोदा ने कहा।’’

‘‘फिर तुम आगे की पढ़ाई कहा° से करोगी यशोदा! मुशीरा ने पूछा!’’

‘‘यदि हमें अच्छी पढ़ाई करनी है तो महिला कालेज या आई.टी.कालेज में ही दाखिला लेना चाहिए।’’ यशोदा बोली ‘‘और मेरा घर तो महिला कालेज के पास ही है। इसलिए मुझे तो महिला से पढ़ाई करने में ही सुविधा रहेगी! ये जीनत थी।

‘‘मेरे माॅम डैड ने तो यूनीवर्सिटी का फार्म भी भरवा दिया है और मेरा वहा° एडमीशन भी जरूर हो जायेगा सुनीता बोली।’’

‘‘मैं तो तीन भाइयों की इकलौती बहन हूं इसलिए अब्बू व भाईजान मेरा दाखिला यूनीवर्सिटी में अवश्य करा देंगे!’’ मुशीरा ने जोड़ा।

चारो सहेलियों में सुनीता के मातपिता दोनों ही डाक्टर थे, अतएव वह उच्चवर्गीय आर्थिक स्थिति में थी किन्तु यशोदा सिंह के पिता सौरभ सिंह क्लर्क की पोस्ट पर थे और उसकी माता शान्ति देवी स्कूल टीचर थीं। यशोदा सिंह का परिवार निम्न मध्यम वर्गीय था। जबकि यशोदा का छोटा भाई अखिल कक्षा तीन में पढ़ रहा था।

इसी क्रम में जीनत सिद्धकी के पिता अब्दुल करीम मोटर मैकेनिक थे साथ में उन्हें दो बच्चे एक पुत्र व पुत्री और थे। अतएव पारिवारिक स्थिति निम्न आय वर्गीय ही थी। सभी सहेलियों में मुशीरा खान सबसे सुन्दर व आकर्षक थी। उसके पिता वसीम खान लखनऊ के पुराने रईस थे। उनके पास जायदाद बहुत थी, उसी के किराये से गुजारा होता था। मुशीरा का एक भाई उससे बड़ा व दो छोटे थे। इसलिए वह पिता व भाइयों की बेहद लाडली थी। अब सुनीता व मुशीरा तो यूनीवर्सिटी में थी किन्तु यशोदा व जीनत महिला कालेज में बी.एस.सी. में थीं।

यशोदा व जीनत फ्री पीरियड में साथ-साथ बैठी बातें कर रही थीं।

कालेज के दिनों में सुनीता ही अक्सर हम चारों को पानी के बताशे खिलाती थी,’’ जीनत ने कहा।

‘‘और बताशे खाने के बाद दोना भर भर के पानी पीना भूल गई क्या?’’ यशोदा बोली।

‘‘ये भी भूलने की बात है? छन्नू काका हमें बुला कर पानी पिलाते थे। कितने प्यार से कहते -दी! जरा पानी टेस्ट करिये न! जीनत ने कहा।

लेकिन अब हमारा मिलना कितना कम हो गया है? यशोदा ने अफसोस जताया।

हा° आ। लेकिन महीने दो महीने में तो हजरत गंज की लवलेन या अमीनाबाद की पीछे वाली गली में तो हमारी चैकड़ी बैठती ही है और चाट के साथ गपशप भी तो होती ही है। जीनत बोली।

गपशप भी कैसी? बस, मुशीरा व सुनीता के मनचले लड़कों के किस्से सुनते है और लोट पोट होते हैं। यशोदा ‘ह°सते’ हुए कह रही थी।

मुशीरा व सुनीता दोनों ही बी.एस.सी. बायों ग्रुप में थी। जिसमें लगभग सौ लड़के लड़किया° थे जिसमें वेदान्त ब्राह्माण थे और देशराज एस.सी. यानि महार थे? इनके साथ इलियास, अहमद व मधुकर भी थे जिनका गु्रप बना हुआ था। वेदान्त व देशराज लखनऊ गाजीपुर से एक ही गा°व के थे, अतएव एक ही कमरे में किराये पर साथ साथ रहते थे और साथ-साथ ही पढ़ाई भी करते थे।

वेदान्त के पिता सरकारी अस्पताल में कम्पाउन्डर थे एवं वेदान्त की एक छोटी बहन रश्मि भी थी। अतः परिवार निम्न मध्यम वर्गीय था। किन्तु देशराज बेहद गरीब परिवार से थे कि उसके माता पिता मजदूरी करके गुजारा करते थे। यही कारण था कि राशन इत्यादि वेदान्त ही लाते थे। अपने दूसरे कार्य वे मिलजुुल कर करते थे। क्योंकि दोनों का लक्ष्य सिविल सेवाओं में जाने का था और दोनों की आ°खों में भविष्य के अनगिनत स्वप्न थे।

देखते देखते तीन वर्ष गुजर गये और बी.एस सी. के परिणाम भी आ गये। यद्यपि सभी के अंकों के प्रतिशत अलग थे। तथापि देशराज मधुकर वेदान्त व इलियास सभी ने अब एम.एस सी में यूनीवर्सिटी में ही दाखिला ले लिया।

सुनीता पा°डे व मुशीरा खान भी एम. एस सी. में थी। यशोदा सिंह ने बी.एस सी. में महिला कालेज में टाप किया था और अब वह भी विश्वविद्यालय में उसी बैच में आ गई थी। पिछले तीन वर्षों से सहशिक्षा में पढ़ते हुए मुशीरा व सुनीता, की झिझक समाप्त हो चुकी कभी नोट्स कभी किताबों के आदान प्रदान को ले कर मुशीरा की वेदान्त से और सुनीता की देशराज से अक्सर कुछ बातें हो जाती थीं जिनमें हल्का फुल्का ह°सी मजाक भी कभी हो जाता था। ऐसे में सुनीता जब खिलखिला कर ह°सती

तो देशराज उसे देखते ही रह जाते। इधर बिना मेकअप के भी मुशीरा वेदान्त को हीरोइन से कम न लगती।

जीनत एम.ए. की पढ़ाई प्राइवेट फार्म भर कर कर रही थी, साथ में नर्सरी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी कर के घर खर्च में माता पिता की मदद भी कर रही थी। अब यूनीवर्सिटी में इन सबका एक ग्रुप सा बन गया था। जब भी चार पा°च दिनों की छुटी होती तो ये सब मिलकर किसी ढाबे या रेस्टोरेन्ट में इकट्ठे होते, खाना पीना और गपशप में तब कितना समय गुजर गया किसी को ध्यान ही न रहता।

क्रमशः

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