कवि: भारतभूषण अग्रवाल

फिर– फिर बदल दिए कैलेण्डर

फिर फिर

बदल दिये कैलेण्डर

तिथियों के संग संग प्राणों में

लगा रेंगने

अजगर सा डर

सिमट रही साँसों की गिनती

सुइयों का क्रम जीत रहा है!

पढ़कर

कामायनी बहुत दिन

मन वैराग्य शतक तक आया

उतने पंख थके जितनी भी

दूर दूर नभ

में उड़ आया

अब ये जाने राम कि कैसा

अच्छा बुरा अतीत रहा है!

संस्मरण

हो गई जिन्दगी

कथा कहानी सी घटनाएँ

कुछ मनबीती कहनी हो तो

अब किसको

आवाज लगाएँ

कहने सुनने सहने दहने

को केवल बस गीत रहा है!

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