कवि और कविता : कवयित्री लता प्रासर

खुशी के ताप से संताप भगाएं थोड़ा मुस्कुराएं

ओह आंसू से आंसू मिलाए जा रहे हैं

ग़म है इतना खुद को भुलाए जा रहे हैं

बचना बचाना ही है बहुत बड़ी चुनौती

दुष्कर है लेकिन खुशियां पिलाए जा रहे हैं!

  • लता प्रासर

यहां बारिश हो रही है ये बूंदें आपको मुबारक

भीग रहा अंबर आनन

भीग रहा मन का आंगन

भीगा शब्द शब्द मेरा

इसने छन छन कर घेरा

बादल ऊपर गरज रहा

पपिहा मिलने को तरस रहा

बह जाए इन बूंदों संग

सारे ग़म के कानन

सहस बिहस पंछी चंचल हो

सुप्त मन बहुत विचल हो

उमड़ घुमड़ बादल छाया

बरखा झमझम बरस रही

बूंद-बूंद छम छम नाच रही

क्या बोलूं और क्या-क्या गाऊं

बादल बरसा बूंदों का धुन सुनाऊं!

  • लता प्रासर

आने दो अंधड़ तुफान को भीतर ज्वालामुखी फूटा है

कुछ घड़ी बैठ लम्बी सांसे भरकर कह दो

ओ हवा हमको तुमसे प्यार है बोलो ना कह दो

कानन में आनन को ढूंढ़ो जिसने उसे हराया

बीज बीज में सोया वृक्ष मिलने को मिट्टी से कह दो

हंसी ओढ़कर चलती हूं दिल घबराये ना इसलिए

खुद को छोड़कर चलती हूं आंखें डबडबाए ना इसलिए

दफ़न सीने में कर बैठी घूंट खून का कतरा कतरा

ख़तरा ख़तरा सुन डरती हूं  कोई कतराए ना इसलिेए!

  • लता प्रासर

मौसम संग अंगड़ाइयां लेते रहिए मुस्कुराते रहिए

संयम समरस संगम सहस साथ जीवन का

देखकर मुस्कुरा देना हथियार जीवन का

नमी अंदर सहेज हरियाली खिलखिला उठती

सत्ताईस नक्षत्रों सा चक्र घूमा  वैवाहिक जीवन का

सुनती रही गीतकार शैलेन्द्र और बोल हैं लता के

एक दिन आयी एक ऐसी ही घड़ी कुछ बता के

सच हुआ साबित फिल्मी नाम जीवन में उतर आया

सत्ताईस वर्ष पहले लग्न हुआ शैलेन्द्र और लता के!

  • लता प्रासर

बाहर की तपिश से भीतर की तपिश जोड़े रखिए

क़फ़स में कैद है इस क़दर आदमी

बना गया है वैद इस क़दर आदमी

गुम़ हुआ जाता है होशो-हवास आदमी का

सैद-ए-अफ़्गन की जद में है इस क़दर आदमी!

  • लता प्रासर

कभी धूप कभी छांव का आनन्द लीजिए मुस्कुरा दीजिए

बोल कलम तुझे क्या कहना है

क्या डटकर सदा तुझे चलना है

कुछ कह ऐसा मनोबल जाग उठे

अधिकारों की रक्षा तुझे करना है!

  • लता प्रासर

बाहर तुफान आनेवाला है भीतर के बवंडर को सम्भालिए

दिल की किताब उसने पढ़ी ही नहीं

इसलिए वो मौत का सौदागर हो गया

नशा ऐसा चढ़ा तरक्की पाने की उसे

वो भूल गया वह एक अदना इंसान है

बात उसकी क्या करना जो केवल मन की बात करे

हम दिलवालों को उसकी भाषा समझ नहीं आती!

  • लता प्रासर



पहली जेठ की बरसात मुबारक

आते ही हवाओं ने

खिड़की दरवाजे

जोर से खटखटाए

जाने क्या पूछना है उसे

बार बार लगातार

अलसाए हुए मौसम ने

हवा से कुछ कहना चाहा

हवा ठिठकी नहीं

आती जाती रही

उसके संग बादल बूंदें

इतराने लगे

धोती रही अनचाहे कम

हवा के स्पर्श से

मौसम खिलखिला उठा!

  • लता प्रासर

हे प्रभु अपने आंसुओं से सबके आंखों के आंसू धो डालो

हवा के लवों पर

मौसम का नाम है

हवा के प्यार से

मौसम जवान है

इन्हें देखकर बादल मेघा

थिरकने को बेताब है

बूंदों की छन छन सुन

‘लता’ तरु से लिपटान है!

  • लता प्रासर

जेठ में ठंडक को सलाम

डबडबाती रहीं बूंदें कश्ती की तरह

ग़म सिमटती रही किसी हस्ती की तरह

किस्सा कोई नया नहीं है ये दोस्तों

आंखें ढोतीं रहीं इन्हें भिश्ती की तरह!

  • लता प्रासर

कुदरत के कदम रुकते नहीं साथ चलते रहिए

अपनी ख़ामोशियों से झकझोरता है वह

पीकर ग़मों को नि:शब्दता ओढ़े रहा वह

वक्त ही मरहम बन तोड़ेगा ये खामोशियां

अपने के भीतर की मनोज्ञता पहचानता है वह!

  • लता प्रासर

तपिश में तपाये रखिए खुद को और जमाने को

क्या-क्या कहां कहां कैसे कैसे काबू करेंगे

लत लताड़ने की लगी उनसे कैसे लड़ेंगे

कौन है वह पागल जिसने पंगा पहले लिया

समानांतर समझ सहेजकर सपनों को संवारेंगे!

  • लता प्रासर



दुआ करते रहिए संग संग अपने देश दुनिया के लिए

तुम्हारे हुक्म की तामील करते करते

वो बच नहीं पाये जीनेवाले मरते मरते

कुछ दुआएं गांठ बंधी थी लेकिन दवा न मिली

कैसे कहें अपना तुम्हें सोचती हूं हंसते हंसते

गली चौबारों में ये चर्चे आम हैं तेरे

तू हठ की लकीरों से कैनवस रंगता है

रंगना जरा भूख भय भरोसा उंगलियों से

फिर भी खाली रहेगी झोली भरते-भरते!

  • लता प्रासर

हौले से किसी को सुनकर दिल से मुस्कुरा दीजिए

तरस तन का महसूसते रहिए वर्ना

तकलीफ की आमद बढ़ेगी सच

दूर दुनिया से हो जाओ लेकिन

दूर खुद से न हो पाओ रहो बच

ग़म का सिला तुम तक आता रहेगा

पछाड़ कर वक्त पर उसे जरा सा नच

फिक्र नहीं कौन क्या करता यहां

‘लता’ कुछ भी कर पर खुद को जच!

  • लता प्रासर

थोड़ा सा बहकावे में मन को भी जाने दो

ये गया वो गया कारवां क्या थम गया

जो देखता रहा इसे

वो फिर से खुद में रम गया

अपनी बात कहूं तो क्या वो समझेगा इसे जरा

कर अटपटी कहा सुनी जहां था वहीं जम गया

ये गया वो गया कारवां क्या थम गया!

  • लता प्रासर

टकाटक टकाटक निहारने वाले चलो टीका लगा लें

एक टीका वीरों पर सजता

एक टीका दुल्हन को रचता

वक्त का पहिया ऐसा घूमा

एक टीका रोग को डसता

टीकाकरण कराकर अपना

सपनों को जरा पंख लगा लो

टिकना है छोड़ो टीका-टिप्पणी

एक टीका जीवन में बसता!

  • लता प्रासर

दूरियों के दरमियान मोहब्बत को पलने दें

चलो मेड़ पर पेड़ लगाएं

सपनों के नये फूल खिलाएं                       

ऑक्सीजन का बीज बोकर

सांसों को आराम दिलाएं!

  • लता प्रासर

अंगारों से मृगतृष्णा का अटूट नाता है

कदम कदम पर तुझको याद मैं करती हूं

जब भी बारिश हो उसको सावन मैं कहती हूं

जेठ दुपहरी तप कर तन से स्वेद बरसते हैं पल पल

हर बूंदों में तुझसे मिलने की ख्वाहिश करती हूं

कोलाहल में तुमको ही केवल मैं सुनती हूं!

  • लता प्रासर

जेठ मास तू ले जा पाती बचा रहे धरती की थाती

भाव की भूख लिए

सरल सा दुख लिए

फिरती हूं मारी मारी

जेठ की दुपहरी सी

सागर की रेत सी

जलती हूं कण कण

बूंद-बूंद शीतलता

तरसे बाहर भीतर

ढहती हूं पल पल!

  • लता प्रासर

मृगशिरा की बारिश का स्वागत

वक्त ने वक्त को वक्त के लिए किया समर्पण

सारी धरती सारा अंबर कर रहा वक्त का तर्पण

वक्त के मारे हम सब हैं लेकिन वक्त ही हमें संवारेगा

वक्त के लिए सही वक्त पर आओ कर दें प्रेम अर्पण!

  • लता प्रासर

मृगशिरा में खेत की सोंधी खुशबू का आनंद लेते रहिए

बीते कल की बात निराली

आगत की सौगात उजाली

विस्मित जग क्या ढूंढ रहा

हर तरफ है जज़्बात काली!

  • लता प्रासर

मृगशिरा की बाहों हवा और मौसम मचल रहे

दिवस दिवस यूं बीत रहा

मानो मुझको वो जीत रहा

हम सारे हारे हुए खिलाड़ी

हां सबका एक ही गीत‌ रहा

जंग छिड़ा जीवन मृत्यु में

बंद रहना सबके हित रहा

वृक्ष लगाना सीख लो प्यारे

यही प्रकृति का संगीत रहा!

  • लता प्रासर

अपने भीतर की तपिश बचाए रखिए

उंघते अनमने से दिन को क्या कहें

आंख की जुगनुओं को बात क्या कहें

भविष्य भय के आगोश में सुस्ता रहा

गांव नगर शहर के जज़्बात को क्या कहें

उंगलियों पर गिनतियां करते हैं वो

उनकी कशमकश की रात को क्या कहें

बढ़ती हुई लपटें लेना चाहे आगोश में

बंट रहे चंद जमात के खैरात को क्या कहें!

  • लता प्रासर

जेठ की तपिश और जेठ का बरसात आत्मसात करें

कर्म का आनंद और आनंद से कर्म करना

दोनों का अनोनाश्रय संबंध होते हुए भी

कर्म को बोझ की तरह झेलते हैं हम सभी

और इस तरह आनंद हमसे तटस्थ होने लगता है

क्यों न आनंद को गले लगा कर्म का आनंद लें

कर्म स्पर्श की कटुता और मधुरता का आनंद लें

तटस्थ होकर दुख सुख से आनंद की गली में खेलें

भूल जाएं खुद को खुद के लिए सब को अपना बना लें!

  • लता प्रासर

चांदनी रात और बरसात की शीतलता सहेज लीजिए

कोरे कागज पर

पैगाम घूमता रहा

सारे अक्षर बेहिसाब

इधर उधर चमकता रहा

बताता क्यों नहीं कोई

बस देखकर सरकता रहा

ज़ुल्म का इल्म है उसके पास

कत्ल को मोहब्बत कहता रहा

संदेश मेरा भी ले जाए कोई

यूं ही छोड़कर जाता रहा!

  • लता प्रासर

पिघलता रहा जेठ बारिश की बूंदों संग

अमृता पुकारते हैं

लोग उसे

वह सहमी सी रहती है

फिर भी

नुक्कड़ की चाय

नुक्कड़ की गपशप

दूर दूर की सैर

अमृत सा लगता उसे

क्या यह सोचना भर है!

  • लता प्रासर

नृत्य करते बूंद मन मोह लेते हैं

पैर की थिरकन खेतों में होनेवाली है

बूंद-बूंद धरती में समाने वाली है

पांव कहीं कमजोर न पड़े सोचना

सींचना है सपने अंकुरण होने वाली है!

  • लता प्रासर

प्रेम की आंच से तपिश बचाए रखिए

शिक़ायत क्या करूं उनकी

धौंस जमाना काम जिनका

भला करना उन्हें आता नहीं

अपने भविष्य से वो खेलते हैं

हाशिए पर धकेला जिन्हें

उनकी हंसी उड़ाते हैं वो

डर पीकर भीतर भीतर

अपनी कब्र खोदते हैं वो!

  • लता प्रासर

अनलिखा पढते रहिए प्रेम में पगते रहिए

कुछ शब्द शातिर शामिल है जिंदगी में

सतत प्रयास से भी कौन कामिल है जिंदगी में

बहुत भला करना चाहे कोई किसी की फिर भी

वक्त और जमात से बिस्मिल है जिंदगी में!

  • लता प्रासर

आद्रा नक्षत्र का बहुत बहुत स्वागत

बहुत लिखा, पढ़ा नहीं जाता

अनलिखा बहुत नहीं पढ़ने वाले

लिखने पढ़ने वाले के बीच संधि

शब्द शब्द संरक्षित रहता है

कुछ लिखें कुछ पढ़ें!

  • लता प्रासर

जेठ की गर्मी थह-थह श्रमसीकर बाहर भीतर

हारना किसी जीत से बड़ा जलसा होता है

क्योंकि इसमें विचारों का गुच्छा जश्न मनाता है

पहली बार जीतने से अच्छा बार बार हारकर जीतना

तब भय करूणा अहमं साथ छोड़ चुका होता है!

  • लता प्रासर

अलविदा जेठ फिर फिर आना

करूं क्या

कहूं क्या

सुनूं क्या

गुम हूं

वक्त के साथ

कौन

खबर लेगा

इस मंज़र का

इम्तहां है

वक्त का!

  • लता प्रासर

स्वागत आषाढ़ की पहली घनघोर बारिश का

कौन है अपना कौन पराया कौन यहां किससे हारा

बेघर बेचारा है वो उसके सपनों को किसने मारा

नवल निकेतन के वासी बसेरा रहा उजाड़

मूसलाधार में आग बरसती मानव को किसने जारा

कितनों की रातें भीग गई दिन बारिश में धूल गया

ये आषाढ़ का पहला दिन था रंक का रंग मूल गया

सपनों ने सपनों को मारा सपने जाने किधर गये

मानव दानव बनकर सारी संवेदनाएं भूल गया!

  • लता प्रासर

मौसम की संवेदनशीलता में डूबिए उतरिए

कोलाहल के पीछे की खामोशियां

क्यों बेतरह बेचैन करतीं हैं मुझे

स्त्रीत्व और मानवता यहीं मरती हैं

कैसे बचाएं खुद को इस झंझावात से

किसी के पास जबाव हो तो….?

  • लता प्रासर

आषाढ़ और आद्रा लगाते बैठा है बदला

सिढ़ियां केवल चढ़ाती ही नहीं उतारती भी हैं एक वक्त के बाद

मुश्किल है सही सीढ़ी का चुनाव शायद मिले उथल-पुथल के बाद

कहां तय होता जिंदगी की मंजिल लड़खड़ाते हैं लोग जिंदगी भर

ज़रा सम्हलते ही नये दृश्य का आगाज होता इन लम्हों के बाद!

  • लता प्रासर

आषाढ़ का बादल आता है शरमाता है बरसाता है

हमारे सभी शब्द आहुति है संवेदना के कुंड में

हमेशा अच्छे बुरे शब्द टकराते रहते हैं झुंड में

वाचाल हूं क्योंकि बेरुखी का आलम हावी रहा

शब्द बिखेरना ही होगा साथ-साथ वक्त के हुंड में!

  • लता प्रासर

श्यामली रजनी की संवाद सुनो

कविता की आग में संवेदनाएं पकतीं हैं

आस-पास झुलसते प्यार को ढकतीं हैं

पहले गहो फिर कहो तुम्हें कविता क्यों चाहिए

क्या तुम्हारे भीतर आदमियता पलतीं हैं!

  • लता प्रासर

क्यारी क्यारी वारि वारि कृषक ने दिल हारा

वक्त की नज़ाकत को वो सलाम करते हैं

अपनी नफासत को वो सरेआम करते हैं

सराफत मरे या जिये उन्हें इससे क्या

मजलूमों की विरासत को वो तमाम करते हैं

रियासत रहे ना रहे कितना गुमान करते हैं

लब्बोलुआब का ही एहतराम करते हैं

कायम था कायम रहेगी इंसानियत यहां

ये इलहाम है ‘लता’ इसे यहीं कयाम करते हैं!

  • लता प्रासर

मौसमी तपिश में पिघलते रहिए

पुस्तक के मायने अलग हैं

विचार के मायने अलग

पर सोचिए जरा ठहर कर

विचार पुस्तक है या

पुस्तक ही विचार

…………?

  • लता प्रासर

आषाढ़ का बादल  उमड़-घुमड़ मंडराता

कौन बोलेगा किसको बोलेगा क्या बोलेगा

बोलो बोलो बोलने की जुगत कौन लगाएगा

इसका बोलना उसके बोलने से कठिन है

कहते रहे लोग बोलने को तो क्या बोल पाएगा!

  • लता प्रासर

कभी धूप कभी छांव मौसमी ऊष्मा का पुख्ता है ठांव

बहर में कहर शहर शहर घूमा

शब्दों ने भावनाओं को चूमा

मूक हैं वे बोलें किस क़दर

स्रोत की सत्ता पर बैठे हैं भूमा!

  • लता प्रासर

जिनकी सोच नासूर बन चुभे उनको दूर ही रखें

नज़र हमनज़र हुईं हैं जबसे

नज़रिया बदल गया तब से

अब तक नज़ारे नसीहत रहे

उनकी नज़र हमारी हैं अब से!

  • लता प्रासर

ठप्पा ठठोल का अदृश्य होने लगा

ठग ठग कर ठगिया ठाट बाट ठहराया

ऊंची ठांव टटोल कर परचम लहराया

बंटता केवल ठगमूरी रहा वक्त ठगा सा

ठनना ठठक तोड़ अपने लिए ठैनि बनाया!

  • लता प्रासर

सुख के सपने दुख के सपने अपनापन जतला जाते

सहसा स्वप्न में आकर मन को झकझोर दिया किसने

डर की ग्रंथि जाग गई हिम्मत को तोड़ दिया किसने

शिक्षा के ऊंचे शिखरों से भय का बादल छंट जाता है

सोये मन की चिंगारी को हवा की डोर दिया किसने!

  • लता प्रासर

पुनर्वसु नक्षत्र का स्वागत

इम्तहान सब्र की वो लेते हैं बार बार

मुस्कुराकर जबाव देती हूं हर बार

डर लगता है सब्र की इन्तहा न हो जाए

यही समझाने कोशिश रहती है बार बार!

  • लता प्रासर

पुनर्वसु नक्षत्र में तपती धूप का स्वागत

हर मुस्कान उन्हीं पर वार दिया

जब जिसने जहां प्रहार किया

वो डिगा सकें फितरत उनकी

हम अडिग रहे ऐतवार किया

हर आफत को अंकवार लिया

जब जब समय ने वार किया

ये कहती है दिल की धड़कन

मुसीबत से ही तो प्यार किया!

  • लता प्रासर

बरसाती उमस का बहुत बड़ा बहुत स्वागत

कोई धूर्तता की खोल ओढ़े कितना सुकून पायेगा

धूर्तता की शर्त पर अफलातून नहीं बन पायेगा

जमाना जागकर यहां सोया रहता है हुजूर

एक दिन वही धूर्तता की पतलून उतार पायेगा!

  • लता प्रासर

अतिशय तपिश तपाता मन को

उथल-पुथल हर ओर है दिखता

संशय का कांटा क्यों न रुकता

एक भरोसा ईश्वर है सबका

हिम्मतवाला कभी न झुकता!

  • लता प्रासर

बरसात में चांद तारों की लुका-छिपी मुबारक

वक्त को भी थोड़ा शऊर होना चाहिए

सारे मगरूर को चकनाचूर होना चाहिए

बदस्तूर जारी रही विचारों का आवागमन

ज़माने में बेकसूर को मशहूर होना चाहिए

मजबूर नहीं मजदूर को कोहिनूर होना चाहिए!

  • लता प्रासर

बूंदों की अनहद झनकार सावन का आमंत्रण है

ज़ेहन में जबरन जज़्बात पैदा नहीं होते

हर नज़र से मिलकर नज़र शैदा नहीं होते

ख़ास वो नहीं जो ख़ास की फ़िराक में हो

मर्ज बढ़ा दे कोई उससे ख़ास भैदा नहीं होते

विचारों से उड़ान भर आओ परिंदा बन जाए

विचारों पर कर प्रहार कोई चरिंदा बन जाए

प्रवाह निरंतर बनी रहे विचार की नदियों में

सोचो अगर आज यहीं यह इब्तिदा बन जाए!

  • लता प्रासर

तारों की बारात ले आसमान धरती से मिले

चांद एकटक देख रहा है

थोड़ा नाराज़ थोड़ा शीतल

चांदनी का स्पर्श पाकर

पिघल रहा चांद भीतर तक

पूरा वितान इनको देखता

बादल भी दूर कहीं चले गए

चांदनी कभी धरती कभी चांद

को छूकर इतराती इठलाती

चांद…………………!

  • लता प्रासर

चांद तारों की साझेदारी में रोशनी मुस्कुराती रही

कौन समझेगा

दौर-ए-मुश्किल से

गुजरना मेरी

चेहरे की मुस्कुराहट

हमेशा प्रगाढ़ रही

नज़र में उनकी थी

सिर्फ शक्ल मेरी

रिश्ते सामान्य से

प्रगाढ़ होते नहीं यूं ही

लहू में रची-बसी

बोलती नस्ल मेरी!

  • लता प्रासर

पसीजते हुए संवेदनाओं को सलाम

वो लूटता है

वो पीटता है

वो हंसता है

वो रूलाता है

वो मज़े में है

वो सजा देता है

बोलना किसे है

वो बाबू साहब है

वो निखट्टू है

बनाता टट्टू है

वो सबकुछ खाता है

भूखा बिलबिलाता है

बोलना किसे है

वो बाबू साहब है!

  • लता प्रासर

हवा नगमें गाती रहे सावन को बुलाती रहे

खोया खोया वक्त का पैमाना लग रहा है

कितना उथल-पुथल ज़माना लग रहा है

छोटी छोटी खुशियों की तलाश में हर कोई

हर पल की मुस्कान जैसे नज़राना लग रहा है!

  • लता प्रासर

पढ़ना लिखना बहुत जरूरी तभी मिटेगी मजबूरी

वक्त-ए-परिंदा उड़ी उड़ी जाय रे

बेख्याल नयना गड़ी गड़ी जाय रे

अपनी खबर नहीं किस इंतजार में

बोल हिय की घड़ी घड़ी जाय रे!

  • लता प्रासर

सऊंसे अकास बदरा थिरकय जयसे मोर

सावन के अंगना में शुभरात्रि

सावन भोरे अइलो दुआर

मन के भीतर परलो फुहार

नय सूझय धरती अकास

पपिहा करय साजन पुकार!

  • लता प्रासर

सावन की अलसाई बदली बरसो बरसो

टीकाकरण पर आकर ठहर गई हैं जिंदगी

एक गहरी उदासी लिए पसर गई है जिंदगी

बच्चों के संग बड़ों को भी लगने लगा टीका

अच्छी भली थी जाने कैसे सिहर गई जिंदगी!

  • लता प्रासर

भीगा भीगा बादल मंडराये हाय किसी की याद दिलाये

दुखते रग पर हाथ न फेरो

पिघल पिघल जाता मन

काहे कुरेदा मन के घाव

देख रहा वो अपना दांव

बीती जीती रीति-रिवाज

मूक हुआ सारा आवाज!

  • लता प्रासर

बूंद-बूंद खेतों में भरता हरियाली

पुलिंदा शिकायतों की खोलेगा कौन

सितमगर से जब तक बोलेगा मौन

चाहता बहुत शिकवा शिकस्त ही रहे

जिरह प्यार का आकर घोलेगा पौन!

  • लता प्रासर

मिट्टी से सड़क तक किसान भीगा

दरवाजे पर

सावन आया

द्रुम शिखर पर

बूंद नचाया

मन का तार

यूं झनझनाया

झूम हवा संग

सावन आया

यादों उनकी

मन तड़पाया

छनन छनन छन

सावन छाया!

  • लता प्रासर

  • कवयित्री लता प्रासर

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