लुप्त होते रिवाज

रस्में-रिवाज, परम्पराएं, रीतियाँ कभी जीवन का ज़रूरी हिस्सा होती थीं लेकिन अब क़िस्से कहानियों की बात हो गई है। त्योहार-उत्सव हो या कोई मांगलिक आयोजन, आज के दौर में अक्सर ये सुनाई देगा या ख़ुद हम ही कह रहे होंगे कि ”भई ज़माने के साथ चलना चाहिए, अब कहाँ ये सब रस्में होती हैं!”दादी नानी या माँ जब तर्क देती हैं कि “रीत के गीत तो गाने ही पड़ते हैं या रस्म है निभानी तो पड़ेगी” तो छोटे ये कहकर समझाते हैं कि पुरानी सड़ी – गली परम्पराएँ छोड़ो। इस ज्ञान के सामने सारे तर्क कमज़ोर पड़ जाते हैं।चलिये आज देखा जाये कि क्या वाक़ई ये रस्में बेमतलब की थीं जो अब लुप्त हो रही हैं? घड़ोली भरना, कंगना खेलना, सेहरा व सिखिया पढ़ना, दोहे, तमाशे और सिठनियां गाना जैसी तमाम रस्में अब शायद ही कोई जानता हो। पूर्वांचल में विवाह के आरंभ में तिलकोत्सव पर धान का आदान-प्रदान कर दो परिवारों के एक होने की भावना होती थी। गोद भराई की रस्म या सोहर गाने का रिवाज़ शहरों में कहीं दिखाई नही देता। जलपूजा या कुआँ पूजन की परंपरा थी, अब घर घर नल आ गए, धरती में समाये जल तत्व को सहेजने की भावना से जुड़ी थी। वैवाहिक कार्यक्रमों में मागर माटी का विशेष महत्व होता था। मागर माटी में गांव की महिलाएं गाजे-बाजे के साथ मिट्टी को खोदकर लाती थीं, उसी मिट्टी से मड़वे के पास चूल्हा बनता था। इसी चूल्हे में विवाह के एक दिन पहले रौ छौंकने की रस्म निभाई जाती थी। लावा परोसने की रस्म निभाने के लिए इन्हीं चूल्हों में लावा भूंजने की रस्म भी निभाई जाती थी।इसी तरह घृतढारी, तनी कढ़ाई हो या पूजा-मटकोर; शांति पूजन, पित्र न्योतना और सिल पोहन जैसी रस्में हों, ये सभी विवाह की बड़ी महत्वपूर्ण रस्में मानी जाती थीं। किसी रस्म में खोदी गई मिट्टी लाकर मंडप तैयार किया जाता था, तो किसी रस्म में पितरों का पूजन कर उनका आशीर्वाद लिया जाता था। मंडप पर गुड़हत्थी, सिंदूरदान, कन्यादान ये सभी संवेदनाओं की भाव-भूमि से जुड़े महत्वपूर्ण क्षण होते और विशेष रूप से वधू पक्ष के लिए बेहद भावुक करने वाले ये पल कहीं न कहीं हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का कार्य करते। बड़हार नाम की एक अन्य बड़ी ही महत्वपूर्ण प्रथा बदलते समय के साथ लुप्त होती जा रही है। इसे ही ‘समधी के भात’ नाम से भी जाना जाता रहा है। विवाह के समय गालियां सुनाने की परंपरा का भी अपने आप में काफी महत्व रहा है। सीता स्वयम्बर में जनकपुरी की नारियां बारातियों को ग़ाली दे रही हैं, उपहास कर रही हैं। बाराती भी आनंद ले रहे हैं। लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों को बोली जाने वाली मिट्टी गालियों की रस्म श्रीराम विवाह व गुरु नानक जी के विवाह के अवसर पर भी मिलती हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है – “फीकी पे नीकी लगे जो बोले समझ विचारि। सबका मन हर्षित करे, ज्यों विवाह में गारि।।“ विवाह का अवसर संस्कार का भी होता था और उत्सव का भी। कम समय में सामाजिक समभाव स्थापित करना, इसके पीछे का भाव था। लेकिन यह रस्में अब डीजे के शोर के पीछे छिप गई हैं।कन्यादान के बाद कोहबर की प्रथा वर-वधू के आने वाले जीवन को हरा-भरा और वंश को आगे बढ़ाने का संदेश देती है। फिर विदाई होती तो पहले पड़ोस-मुहल्ले के लोग बिना बुलाए भी बेटी को विदा करने आ जाते थे, लेकिन अब जुड़ाव कम होने लगा है।बहू के सर्वप्रथम ससुराल पहुंचने पर लोढ़े से परिछन के बाद एक-एक पांव डलिया में रखते हुए वर-वधू का घर में प्रवेश कराया जाता। धीरे-धीरे परिछन का स्थान अब आरती ने ले लिया है। कहीं कहीं तरल कुमकुम में पांव रखकर वधू का लोटे में रखे चावल को पैर की ठोकर से गिराकर घर में प्रवेश को गृहलक्ष्मी के प्रवेश के समान ही महत्वपूर्ण माना जाता है।ऐसे ही एक परम्परा थी ‘नहछू नहावन’ जिसमें पीली साड़ी पहने परदे में छिपी वधू जब नहान के पानी से स्नान कराई जाती, तो इसका मतलब उसे यह समझाना होता था कि उसको नए रस-भावों, दायित्वों का भार अब इस नए घर के अनुसार धारण करना होगा। आजकल अक्सर वधू पक्ष के लोग विवाह के कुछ दिन पूर्व बेटी को वर पक्ष के गांव, शहर या कस्बे में ले जाते हैं और विवाह की तमाम रस्में वहीं संपन्न कराई जाती हैं। इससे भी कई रिवाज नहीं हो पाते हैं। ऐसे विवाह से वास्तविक समाज का जुड़ाव कम हो जाता है, सखी-सहेलियों की भूमिका ख़त्म हो जाती है। कई रीति-रिवाज़ परंपराओं का अपरिहार्य हिस्सा थे, वे अब लोगों की सुविधानुसार स्वरूप लेने लगे हैं। समाज मे वैकल्पिक सुविधाएं मिली तो टट्टू गायब, घोड़ा गायब, ऊंट गायब, बैल गायब। परंपरा से ये सभी मनुष्य के साथ थे।पिठ्ठू, सतोलिया, गुल्ली डण्डा, हर समंदर गोपी चंदर, कोड़ा जमाल खाये, शेर-बकरी जैसे पारंपरिक खेल ग़ायब हो गये। पहले भाट, चारण, नट, विरदावली गायक, क़िस्सा गो सामाजिक परम्पराओं के अच्छे जानकार होते थे। लेकिन अब ये जानकार समाज के आधुनिकीकरण के कारण इरले-विरले ही मिलेंगे।लोकसंगीत में बारामासा, फाग, चैती, कजरी, विरहा, झोड़ा, छपेली, थड़िया, नाटी, लोहड़ी, बाउल गीत के पारंपरिक लोक कलाकार लुप्त हो रहे हैं। लोकनाट्य परंपरा जो गांवों में थी सिसकती हुई दम तोड़ रही है।प्राचीन समय में जब सिंचाई के साधन नही थे तब लोग अक्सर गांव के समीप के ऊंचे खेतो में चने, मटर, अलसी और मसूर की खेती करते थे जिनमें कटीली झाड़ियों की बाड़ लगानी पड़ती थी और यह होली के पहले पक जाते थे। बाड़ के कांटे गर्मी के आँधी बगड़ूर में उड़कर रास्ते मे न आएं और लोगों के परेशानी का सबब बनें, अस्तु उन्हें होलिका के बहाने फागुन में ही जला दिया जाता था।आज से पचास साल पहले यही परम्परा थी। यदि एक भी वृक्ष काटा जाता था तो पहले एक वृक्ष लगा कर काटा जाता था। बाग़ लगाने के साथ पौधों को सींचने के लिए कुंआ बनाना आवश्यक होता था, फिर कुएं और बाग़ का ब्याह होता था। सारे गाँव में भोज होता था और कुछ वर्षों बाद जब आम में बौर और फल लगते थे तब उसे घर के लोग नहीं खाते थे। पहले वर्ष का फल गांव के लोगों का होता था, जनता का होता था।खेत और बाग़ के भीतर फल या फल का रस नहीं बिकता था। मटर की फलिया अकेले खेत में खायें तो कोई नहीं बोलता था। ये कुछ ऐसे रिवाज़ थे, जो प्रकृति के साथ ही परोपकार और सेवा भाव से जुड़े थे।भारत में पंच तत्वों के महत्व को बहुत समझा गया। इसलिए पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की स्वच्छता, निर्मलता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा गया। यह भारत की परंपरा रही है। सुबह पृथ्वी पर पांव रखने से पहले पृथ्वी को नमन करना, जल को प्रदूषित न करना, अग्नि को सम्मान देना, तुलसी, पीपल आदि को जल चढ़ाने जैसी परम्पराएं प्रकृति के सम्मान से जुड़ी हैं।

लेखिका राजुल

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