कविता

जले  जब पांव अपने  तब कहीं जाकर समझ आया – डॉ अनिल त्रिपाठी

ग़ज़ल जले  जब पांव अपने  तब कहीं जाकर समझ आया जले  जब पांव अपने  तब कहीं जाकर समझ आया घने ...

जड़ें गावों में थीं लेकिन शहर में आबोदाना था – डॉ अनिल त्रिपाठी

जड़ें गावों में थीं लेकिन शहर में आबोदाना था जड़ें गावों में थीं लेकिन शहर में आबोदाना था उन्ही कच्चे...

रेशीम गाठ –  श्रद्धा थत्ते

रेशीम गाठ!!   हे बंध तुझे - माझे.... असे नाही सुटायचे नाते अपुल्या मधले.... कधी नाही तुटायचे ही आहे रेशीम...

तुम्हारे बिन है ज़िन्दगी ऐसे – राजुल

  तुम्हारे बिन है ज़िन्दगी ऐसे   तुम्हारे बिन है ज़िन्दगी ऐसे कोई सीलन भरा हो घर जैसे जहाँ न...

तुझमें साँस लेती हूँ मैं

तुझमें साँस लेती हूँ मैं तुझसे बिछुड़कर भी तुझमें साँस लेती हूँ मैं होंठों पर तेरा नाम बार बार लेती...

ममता की देहरी पर जाने क्यों पहरे – प्रमिला भारती

ममता की देहरी पर जाने क्यों पहरे     ममता की देहरी पर जाने क्यों पहरे, सहमे सिसके हम बस...

मैं बरस-बरस बरसूं रोज़-रोज़ : आशा चंपानेरी

मैं बरस-बरस बरसूं रोज़-रोज़   मैं बरस-बरस बरसूं रोज़-रोज़ नित नवीन रंग-ढंग से तुम पर हर रोज़ आसमां से ......

सत्य या भ्रम : रत्ना बापूली

सत्य या भ्रम अर्ध सुप्त सी लिए अवस्था, कब तक जागृति भान करोगे? चन्द घरों को बना व्यवस्थित, कब तक...