करवट बदलती सदी:आमची मुंबई-संतोष श्रीवास्तव

करवट बदलती सदी : आमची मुंबई

न जाने क्या  कशिश है बम्बई तेरे शबिस्तां में

कि हम शामे-अवध, सुबहे बनारस छोड़ आये हैं

  • अली सरदार ज़ाफ़री

मुंबई का प्रवेश द्वार – गेटवे ऑफ़ इंडिया

करवट बदलती सदी :

आमची मुम्बई

संतोष श्रीवास्तव

न जाने क्या  कशिश है बम्बई तेरे शबिस्तां में

कि हम शामे-अवध, सुबहे बनारस छोड़ आये हैं

अली सरदार ज़ाफ़री

मुम्बई का प्रवेश द्वार – गेटवे ऑफ़ इंडिया

मेरे बचपन की यादों में जिस तरह अलीबाबा, सिंदबाद, अलादीन, पंचतंत्र की कहानियाँ और अलिफ़ लैला के संग शहर बगदाद आज भी ज़िंदा  है उसी प्रकार पिछले  सैंतीस  वर्षों से मुम्बई  मेरे खून में रच बस गया है| जब मैं यहाँ आई थी तो यह बम्बई था| अब बम्बई को मुम्बई कहती हूँ तो लगता है एक अजनबी डोर मेरे हाथ में थमा दी गई है जिसका सिरा मुझे कहीं दिखलाई नहीं देता| शहरों के नाम जो अनपढ़ गँवार, बूढ़े, बच्चे सबकी ज़बान से चिपक गये हों….. केवल मुम्बई ही नहीं पूरे भारत का हर शहर, हर गाँव बम्बई नाम में अपने सपने खोजता है क्योंकि यह शहर सपनों के सौदागर का है| आप सपने खरीदिए वह बेचेगा….. एक से बढ़कर एक लाजवाब सपने….. रुपहले, चमकीले, सुनहले और जादुई…..

मैं भी सपने देखने की उम्र में मुम्बई आई थी| लेकिन मेरे सपने चूँकि लेखन और पत्रकारिता से जुड़े थे इसलिए मेरे पैरों के नीचे फूल नहीं बल्कि यथार्थ  की  ठोस ज़मीन थी| मुम्बई रोशनियों का शहर है और यहाँ रोज़ी रोटी के जुगाड़ के लिए हर  संभव सपना देखा जा सकता है|

भारत के पश्चिमी तट पर बसा मुम्बई महानगर लावे से बने सात द्वीपों से बना है| इसमें प्रमुख द्वीप हैं कोलाबा, मझगाँव, वडाला, माहिम,परेल, माटुंगा और सायन|ये सभी द्वीप विभिन्न हिन्दू शासकों के साम्राज्य का अंग थे| लेकिन अब यहाँ उस समय के कोई अवशेष नहीं हैं| बस, माहिम स्थित मस्जिद गुजरात के मुस्लिम शासकों की दास्तां सुनाती है| मुम्बई का स्वरुप अपने हर शासक के अनुसार बदलता रहा| इस निर्जन द्वीप समूह में सबसे पहले कोली मछुआरों की बस्तियाँ आबाद हुईं| इसलिए कोली यहाँ के मूल निवासी माने जाते हैं| मगध साम्राज्यकाल में बौद्ध भिक्षुओं ने यहाँ अपनी एक चौकी कायम की| इसलिए यहाँ आरंभिक वर्षों में बौद्ध संस्कृति का प्रभाव भीरहा| जिसके जीते जागते चिहन एलिफेंटा, कन्हेरी, जोगेश्वरी, महाकाली और मंडपेश्वर गुफ़ाओं में देखने को मिलते हैं|जब पुर्तगालियों का यहाँ शासन था तो उन्होंने पुर्तगाली चर्चों का निर्माण कराया| इनमें से सेंट एंड्रयूज़ चर्च पुर्तगाली वास्तु कला को बयां करता है| पुर्तगाली इसे बॉम्ब-बेइया कहते थे| फिर जब अंग्रेज़ी शासन हुआ तो यह बॉम्बे हो गया| उसके भी पहले यह महानगर माम्हे, मनबे, मेम्बू, बो-बेम आदि नामों से गुज़रा और अब यह यहाँ के मूल निवासी कोलियों की अधिष्ठात्री मुम्बा देवी के नाम से मुम्बई हो गया|

सात द्वीपों वाली इस नगरी में जो आकर्षण उस वक्त था वो आज भी है|इस नगर को पाने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने न जाने कितने पापड़ बेले थे| उस वक़्त यहाँ पुर्तगाली शासन था| १६६१ में इंग्लैंड के किंग चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीनडे ब्रिगेंज़ा से शादी की थी| कैथरीन और चार्ल्स को बम्बई दहेज में मिला था| ईस्ट इंडिया कम्पनी के अनुरोध पर चार्ल्स ने इसे दस पाउंड सालाना की लीज़ पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया| उस समय यहाँ नारियल, सीताफल जैसे फल और धान की खेती रोज़ी रोटी का ज़रिया था| मझगाँव के अंजीरवाड़ी में आज भी एक कुआँ है जिससे तब खेतों,बागबगीचों की सिंचाई होती थी| आज के दौर में सात हज़ार करोड़ रुपए सालाना बजट वाली मुम्बई महानगर पालिका की मुख्य आय का स्रोत ऑक्ट्रॉय है लेकिन तब मुम्बई में इतना टैक्स भी नहीं इकट्ठा हो पाता था जितना  इसकी सुरक्षा में तब ख़र्च होता था इसलिए इसे लीज़ पर रखना पड़ा और तब इंग्लैंड से समुद्री जहाज का सफर तय कर गेटवे ऑफ़ इंडिया के शानदार गेट से मुम्बई में प्रवेश किया इंग्लैंड की क्वीन मैरी और किंग जॉर्ज ने| वह १९११ का साल था और यह क्वीन और किंग के पहली बार मुम्बई में आने के बतौर जश्न बनाया गया था|वैसे यह  पूरी तरह बना १९२४ में| इक्कीस लाख रुपए की लागत से बना यह गेट इंडो सरसेनिक और गुजराती स्टाइल से बना है जिसका डिज़ाइन आर्किटेक्ट जॉर्ज विटेट की कला का अंजाम है| २६ मीटर की ऊँचाई वाला यह भव्य गेट पर्यटकों को लुभाता है| मानो थल से जल की ओर आमंत्रण दे रहा हो….. या जल से थल की ओर| यह गेटवे ऑफ़ इंडिया गवाह है हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ों  के पैर पसारने का, उनकी कूटनीतिक चालों का, २६ नवंबर २००८ के आतंकी हमले का|  निश्चय ही अपनी आँखों से ताजमहल कांटिनेंटल की सजधज प्रतिदिन देखता  यह उस दिन ज़ार-ज़ार रोया होगा| मैं गेटवे ऑफ़ इंडिया के समुद्र तट पे नबी पत्थर की मज़बूत रेलिंग पर कुहनियाँ टिकाए अरब सागर की उठती गिरती  लहरों पर सवार स्टीमरों, नावों, जहाजों को देख रही हूँ| न जाने कितनी सदियों का इतिहास समेटे है यह सागर….. समँदर के उस पार हैं एलीफ़ेंटा की गुफ़ाएँ….. वहाँ तक पहुँचने का दस किलोमीटर का रास्ता जो समुद्र पर से होकर जाता है स्टीमर या नौकाओं से तय करना पड़ता है| वहाँ पहुँचते ही पर्यटक दंग  रह जाते हैं| सहज यकीन नहीं होता कि इन  गुफ़ाओं  को मानव हाथ रच सकते हैं| प्रत्येक पर्यटक के लिए एक घंटे का समुद्री सफर तय करते ही लगभग ढाई किलोमीटर लम्बे द्वीप पर क़दम रखना बेहद रोमांचक है|सामने पाँच सौ फुट ऊँचे पहाड़ों की दो चोटियाँ बरबस ध्यान खींचती हैं| द्वीप के मुख्य पश्चिमी भाग की गुफ़ाओं में पाँच हिन्दू देवताओं की  गुफ़ाएँ हैं| लम्बे चौड़े अहाते में फैली मुख्य  गुफ़ा में त्रिमूर्ति के साथ शैव मत की मूर्तियाँ भी हैं जो बसाल्ट चट्टानों से निर्मित हैं| सोलह फुट ऊँची अर्धनारीश्वर, नटराज योगीश्वर, गंधर्व आदि की मूर्तियाँ विभिन्न भाव मुद्राओं में अद्भुत शिल्प का नमूना हैं| क्या गज़ब की कला रही होगी उन हाथों की कि सदियाँ गुज़र जाने के बावजूद आज भी ये कुछ कहती प्रतीत होती हैं| गुफ़ा के पूर्वी भाग में स्तूप हिल पहाड़ पर  ईंटों का स्तूप और दो बुद्ध गुफाएँ हैं|एक गुफ़ा अधूरी सी लगती है| यहाँ सातवीं शताब्दी के दौरान चालुक्य शासकों द्वारा निर्मित भव्य गुफ़ा मंदिर है| वैसे इसका इतिहास समय  की रहस्यमय पर्तों में दबा है| यहाँ के मूल निवासी इसे बाणासुर या पाँडवों द्वारा बनाया हुआ मानते हैं| लेकिन इतिहासकारों के अनुसार ये पाँचवीं से आठवीं सदी तक की मानी जाती हैं|इस क्षेत्र की खुदाई में जो सिक्के मिले उन्हें पुरातत्ववेत्ताओं ने चौथी सदी का बताया| इतिहास के अनुसार ६३५ ईस्वी में चालुक्य सम्राट पुलकेशी ने कोंकण के हिंदू मौर्य शासकों को हराया| उस वक्त उनकी राजधानी धारापुरी थी| वैसे इतिहासकारों के भी अलग-अलग मत हैं| इस द्वीप पर कई बौद्धस्तूप तो तीसरी शताब्दी पूर्व के हैं| लेकिन यहाँ का मुख्य आकर्षण गुफ़ा मंदिर का निर्माण चालुक्य वंश के राजकुमार पुलकेशिन द्वितीय ने अपने आराध्य देव भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए सातवीं शताब्दी में कराया| कालांतर में इस द्वीप को पुरी और फिर धारापुरी के नाम से जाना जाता रहा|तब पुर्तगाली आए तो उन्होंने गुफ़ा मंदिरों के बाहर पत्थर के तराशे हुए हाथी को देखकर इस द्वीप का नाम “ए इल्हा दो एलीफेंटा” अर्थात  हाथी का द्वीप रख दिया| उन्होंने जलदस्युओं के आक्रमण से द्वीप को सुरक्षित करने के लिए भी किला बनवाया| मंदिर पहाड़ी पर विशाल शिला खण्ड को तराश  कर बनाया गया है| गुफ़ा क्या है मानो  साक्षात शिव का वास….. अँधेरे, गतिशील और सृजन में रत शिव के विभिन्न रूपों की अलग-अलग गुफ़ाएँ जिन्हें पैनल एक से नौ क्रमांक दिये गयेहैं| एक में लंकापति रावण कैलाश उठाए हैं|  दो में शिव का उमा-महेश्वर रूप, तीन में अर्धनारीश्वर, चार में शिवजी  की महेशमूर्ति तराशी गई है| शिवजी के तीन व्यक्तित्व सौम्य, ध्यानमग्न, तत्पुरुष| एक ही मूर्ति में समाहित इन तीन व्यक्तियों को श्रृंगार, रौद्र और शांत रसों का समागम भी कहते हैं| पाँच और छै: में सदाशिव रूप, सात  में  अंधासुर  का वध करते हुए शिव, आठ में नटराज और नौ में योगेश्वररूप तराशे गये हैं| नज़दीक की पहाड़ी पर एक तोप भी रखी है|

बफ़र ज़ोन वाले द्वीप के तीन गाँवों सेतबंदर, राजबंदर और मोरबंदर के वनवासियों का जीवन यहाँ के जंगलों से चलता है| आम, इमली, ताड़ और करंज के छतनारे पेड़ इनकी जीविका चलाते हैं| कहीं-कहीं धान की खेती भी होती है| गेटवे ऑफ़ इंडिया से एलीफेंटा के लिए दिन भर स्टीमर नौकाएँ चलती हैं| लेकिन एक कड़ा नियम ये भी है कि शाम पाँच बजे तक गेटवे ऑफ़ इंडिया लौट जाना होता है| समुद्री यातायात बंद हो जाता है| सोमवार को एलीफेंटा पर्यटकों के लिए बंद रहती है|शिवरात्रि यहाँ धूमधाम से मनाई जाती है| मुम्बई का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव एलीफेंटा फेस्टिवल है जो पिछले २५ वर्षों से मुम्बईकरों और विदेशी पर्यटकों के  आकर्षण का केन्द्र है|इस उत्सव में कलाजगत के दिग्गजों का जमावड़ा होता है|पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, तेजस्विनी लोणार, कविता सेठ, प्राची शाह, राजा काले, जॉर्ज ब्रुक्स, जिनीश वेंटिग, हेमा मालिनी जैसे संगीत, नृत्य क्षेत्र के दिग्गज और कोई प्रवेश शुल्क नहीं| उत्सव का विशेष आकर्षण यही कलाकार हैं| पेंटिंग, शिल्प निर्माण की प्रतिस्पर्धाएँ, सोविनियर शॉप्स, मछुआरा नृत्य, एथिनिक फूड और हेरिटेज वॉक जो  उत्सव में चार  चाँद लगा देते हैं|

गोथिक कला की खूबसूरत इमारत….. ताजमहल कॉन्टिनेंटल होटल…..

गेटवे ऑफ़ इंडिया सेलगा हुआ है ताज महल कॉन्टिनेंटल होटल| किसी महल सा भ्रम देता राजसी होटल| गोथिक  कला के खूबसूरत नमूने से बेहद आकर्षक दिखता यह होटल एक सौ चार साल पुराना है| इस, पाँच सितारा होटल को यानी ताजमहल पैलेस एंड टॉवर को एशिया के प्रमुख होटल  का दर्ज़ा दिया गया है| बेहद रोचक है इसके निर्माण की कहानी| सिनेमा के जनक लुमायर भाईयों ने अपनी पहली फिल्म मुम्बई के आलीशान होटल बोटसन  में ७ जुलाई १८९६ को प्रदर्शित की| इसके शो में केवल अंग्रेज़ों का ही प्रवेश था|होटल के बाहर तख़्ती लगी थी कि ‘भारतीय  और कुत्ते’ अंदर प्रवेश नहीं कर सकते| जमशेदजी टाटा को यह फिल्म देखना थी लेकिन प्रवेश निषेध था| रंगभेद की इस घृणित नीति के ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठाने के बरक़्स दो साल के अंदर बोटसन की आभा को धूमिल करता ताज का निर्माण शुरू किया जो १९०३ में बनकर पूरा हुआ|जब इसका उद्घाटन हुआ तो अंग्रेज़ों का प्रवेश निषेध था और इसके गेट पर तख़्ती लगी थी कि “ब्रिटिश और बिल्ली अंदर नहीं आ सकते|”

ताजमहल होटल में ५६५ कमरे हैं और ४४ सुइट्स हैं| कई रेस्टोरेंट, बार, कॉफ़ी शॉप, नाइट क्लब, पेस्ट्री शॉप, बुक शॉप, शॉपिंगसेंटर, पार्किंग, स्विमिंग पूल, हेल्थ क्लब, गोल्फ़, बेबीसिटिंग, ब्यूटी सैलून, लाँड्री, डॉक्टर ऑन कॉल, अटेच्ड बाथ, गर्मपानी, टी. वी. आदि की सुविधाओं से पूर्ण ये होटल विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा आरामगाह है|इसके राजसी ठाट बाट के पथ पर सजी धजी विक्टोरिया जब पर्यटकों को घुमाती है तो लगता है हम किसी शाही मेहमान से कम नहीं|

इसी ताजमहल के कमरे रक्तरंजित हो उठे थे जब २६ नवंबर २००८ को यहाँ दस आतंकवादियों ने हमला किया था| इसकी दीवारें और खंभे गोलियों  से छलनी हो उठे थे| विस्फोट से उठी आग की लपटें और धुआँ खिड़कियों के शीशे चटख़ाता बाहर उबला पड़ रहा था|….. १६४ लोगों की मौत, ३०८ घायल….. उफ़….. ६० घंटे तक आतंकी गोलियाँ दिल दहलाती रही थीं | फिर  एन एस जी कमांडो  ने खोजी कुत्तों के संग सर्च ऑपरेशन कर आतंकियों को खोज निकाला था| इसमें उनके साथ थे रेपिडेक्शनफोर्स, पोलीस और मरीन कमांडो| नौ आतंकियों को ख़त्म कर कसाब को ज़िन्दा पकड़ लिया था|

अब ताजमहल पूरी सजधज से फिर सँवार दिया गया है और सुरक्षा भी तगड़ी कर दी गई है|

किसी भी जगह की पहचान हैं वहाँ के मूल निवासी, आदिवासी…..

मैं  मुम्बई के अतीत की गलियों से गुज़र रही हूँ….. यहाँ गेटवे ऑफ़ इन्डिया और ताज महल की भव्यता और सजधज नहीं है| फिर आँखें चकित क्यों हैं? कहाँ है मेरी मुम्बई| ये तो हरे भरे जंगलों, खेतों और आदिवासियों से भरी कोई अनजानी जगह है| यहाँ की दो जनजातियों से मैं रूबरू होती हूँ| कोली और अगरिया| जो ईसा पूर्व से यहाँ रहती आई हैं| इनके वंशज मछुआरों और नमक बनाने वाले मज़दूरों के रूप में जाने जाते हैं| यह वंश परम्परा आज भी कायम है| कोली  मस्त मलंग जनजाति है जो सारे दिन खटने के बावजूद रात को अपने खेमे में नशा करके नाचते गाते हैं| इनके नृत्य को कोली नृत्य कहते हैं| ये मछली पकड़ने का व्यवसाय करते हैं| अगरिया जनजाति यहाँ की दूसरी प्रमुख आदिवासी जाति है जो नमक उत्पादन से रोज़ी रोटी कमाती है|

मीरारोड   के पश्चिम में नमक के खेत ही खेत हैं जो अपनी शुभ्रता के कारण बर्फीला इलाक़ा  नज़र आते हैं| मैं जब मीरा रोड में रहती थी तो कॉलेज आते जाते रोज़ इन आदिवासी औरत मर्दों को नमक के खेतों में काम करते देखती थी| घुटनों तक प्लास्टिक बाँधे रबर की चप्पलें पहने ये दिन रात नमक की ढुलाई करते हैं|  नायगाँव इगतपुरी नासिक रोड के आसपास इन दोनों जनजातियों की बस्तियाँ हैं| दोनों आदिवासी समुदाय की आराध्य देवी मुम्बा देवी ही हैं| अपने पर्वों को ये धूमधाम से मनाते हैं| समुद्र इनका देवता  है क्योंकि समुद्र ही इन्हें नमक और मछली देता है| नारियल पूर्णिमा  के दिन कोली मछुआरे अपनी नौकाओं को रंगबिरंगे कपड़ों और झण्डियों से सजाते हैं और नाचते गाते समुद्र देवता को नारियल की भेंट चढ़ाते हैं| इस  दिन न तो ये समुद्र के अंदर जाते हैं और न ही मछलियाँ पकड़ते हैं|  लोकनृत्यों के संग गाये जाने वाले गीतों में मुम्बा देवी एवम् इनका इतिहास समाहित नज़र आता है| वैसे आदिवासियों की एक और जनजाति यहाँ कतकारी के रूप में जानी जाती है| कतकारी बनजारे हैं जो भ्रमण करते हुए मिट्टी, बाँस एवम् जंगली पेड़ पौधों से खिलौने, मूर्तियाँ तैयार कर बेचते हैं और अपनी आजीविका चलातेहैं| बनजारों की परम्परा के अनुसार ये भी पंद्रह दिन से ज़्यादा एक जगह नहीं टिकते| चूँकि गाँवों में रहना इनकी परम्परा के विरुद्ध है अतः ये गाँव की सीमा से बाहर बनी मुख्य सड़क के किनारे अपने तम्बू लगाते हैं|ज़िन्दग़ी के हर पल को जीना कोई इनसे सीखे| भविष्य के प्रति लापरवाह वर्तमान को जीते ये बन्जारे अपनी रातें देसी दारू, नाच गाने से रंगीन कर लेते हैं|

आदिवासियों की ज़िन्दग़ी से अनेक दिलचस्प पहलू जुड़े हुए हैं| इनके पाड़ों के नामों के पीछे भी कोई न कोई दिलचस्प इतिहास जुड़ा हुआ है| यानि आरे कॉलोनी का केल्टी पाड़ा| जहाँ यह पाड़ा है वहाँ आज से सदियों पहले बंदरों के झुंड रहा करते थे| ऐसा ही इतिहास है फुट क्या तड़ीचा पाड़ा|बरसों पहले यहाँ का तालाब फूट गया था| इसे ठीक करने जो मज़दूर आये वे यहीं रहने लगे और बाद में नाम पड़ गया फुटक्या तड़ी चा पाड़ा यानी टूटा फूटा तालाब| इसी तरह इमली के पेड़ों की भरमार होने की वजह से नेशनल पार्क में बना चिंचपाड़ा| चिंच यानी इमली| ऐसा ही नवपाड़ा है जो नया बसा था| तब से यही नाम प्रचलित हो गया| तुमनी पाड़ा, रावण पाड़ा, प्रजाकुरपाड़ा आदि नाम भी संभवतः इसी तरह की घटनाओं की वजह से रखे गये हैं| मुम्बई में मुख्यतः वारणी, कोंकणा, कारतरी, कोली, मल्हार, धोड़ी, दुबड़े आदि आदिवासी जातियाँ हैं| नृत्य इनके जीवन का अभिन्न अंग है| साथ ही यह भी कि स्त्री, पुरुष दोनों नाचते हैं, अगर पुरुष अकेले नाचते हैं तो वह नृत्य पूरा नहीं माना जाता| नृत्य में पैरों की थापों का सबसे ज़्यादा महत्व होता है| नृत्य के समय कमर में हाथ डालकर या कंधे पर हाथ रखकर नाचा जाता है| नृत्यांगनाएँ बालों में जंगली फूल, गजरे,पत्तियाँ आदि लगाती हैं| तारपा, तूर, गवरी, कांबड़ी आदि इनके मुख्य नृत्य हैं| त्यौहार ये बहुत उत्साह से मनाते हैं| बारिश का मौसम इनके पाड़ों में त्यौहारों का मौसम होता है| महिला, पुरुष दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर करते हैं| महिलाएँ परिवार के लिए सूखी लकड़ियाँ बीनने और शहरी लोगों के घरों में जाकर बर्तन भांडे माँजने, साफ सफाई आदि काम करती हैं| इनकी झुग्गियाँ बाँस पर मिट्टी की परत चढ़ाकर बनाई जाती है| आँगन को गोबर से लीपा जाता है|

आदिवासी समुदाय जिन देवताओं को पूजता है उनके नाम हैं हिमय, नारण, वाघाय| शादी के वक़्त दहेज लड़की अले नहीं बल्कि लड़के वाले देते हैं| वैसे तो इनकी जीवनचर्या में शहरी जीवन को देखकर काफी कुछ बदलाव आया है लेकिन फिर भी अभी तक इनकी लोक संस्कृति शादी ब्याह के तौर तरीके आदि वही पुराने ढर्रे पर चले आ रहे हैं| लेकिन नये ज़माने के बिल्डरों ने इनकी ज़मीनें हड़पने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी| इन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि हमेशा आर्थिक तँगी में जीने वाले इन आदिवासियों की ज़मीनें बिल्डरों के हाथ में आते ही इतनी महँगी कैसे हो गईं| ये भोले भाले आदिवासी नहीं जानते कि बिल्डरों ने इनकी ज़मीने हड़पकर या औने पौने दामों में ख़रीदकर उस पर कुकुरमुत्तों की तरह शॉपिंग मॉल खड़े कर लिये हैं, बिग बाज़ार बना लिए हैं और शॉपिंग सेंटर खोल लिये हैं|जहाँ की सजधज,ऑर्केस्ट्रा और विद्युत चालित सीढ़ियाँ ख़रीददारों को सीधे मंज़िल दर मंज़िल पहुँचा कर तमाम देशी विदेशी वस्तुओं का ज़खीरा उनकी नज़रों के सामने खोलती हैं| कई शॉपिंग मॉल मल्टीप्लेक्स  थियेटरों के संग बने हैं जहाँ एक ही समय में तीन चार फ़िल्में प्रदर्शित की जाती हैं| बिल्डरों ने पूरी तरह मुम्बई को विकसित देशों की तर्ज़ पर बनाने की कोशिश में एक ओर तो महानगर को बदल कर रख दिया है वहीं दूसरी ओर आदिवासी जो कि हर देश-प्रदेश की धरोहर होते हैं और जो जंगलों में अपने कबीलों के संग पुरातन परम्परा को बरकरार रखे हैं उन्हें महानगरीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है और यही वजह है कि वे आधुनिक जीवन को  अपना  नहीं पा रहे हैं और उनकी संख्या  दिनोंदिन  कम होती जा रही है|

कोलियों का कर्मक्षेत्र ससून डॉक…..

अतीत  पीछे छूट गया और मैं आ पहुँची कोलियों के कर्मक्षेत्र  ससून डॉक में जो कोलाबा में स्थित है| ब्रह्ममुहूर्त में सूरज के उदय होने का संकेत देता सुरमई उजाला….. इसी उजाले के  साथ जाग उठता है ससून डॉक| कोली मछुआरों की चहल-पहल….. सिर पर मछली का टोकरा लादे भागती मछुआरिनें, केयरटेकर्स, मछलियों को छाँटते और बड़ी-बड़ी टोकरियों व प्लास्टिक की थैलियों में भरते दिहाड़ी मज़दूर, बर्फ़ व डीज़ल की  हाथ गाड़ियों और रपटीली-सँकरी सड़कों पर फैले मछली मारने के जालों के जंजाल से भरी सुबह रौनक से लबरेज हो उठती है| मछुआरों के लिए जून और जुलाई के महीने समुद्र में मछली पकड़ने जाने के लिए प्रतिबंधित हैं| इन महीनों में वे पंढरपुर  और  शिरडी की सालाना तीर्थयात्रा में निकल पड़ते हैं|नावों की साफ़ सफाई, रंगाई व मरम्मत करते हैं| जाल बनाना, ऑइलिंग करना, इंजन की ओवर हॉलिंग करना आदि काम निपटाकर वापिस समँदर की राह पर जहाँ ये कुशल एथलीट की तरह दो छोरों पर गैप बनाकर लंगर डाली सफेद पताकाएँ फहराती छोटी और बड़ी नौकाओं से चालीस-चालीस किलो वज़न की झरियाँ फेंकते हैं, कैच  करते हैं| अद्भुत नज़ारा…..

बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट का यह ‘सागर उपवन’ ससूनडॉक से दो हाथ की दूरी पर है| यहीं है कोलाबा का वह पॉश इलाका जहाँ रहने वाले लोग मछली की तीखी गंध से परेशान हैं क्योंकि गेट के बाहर ही रीटेल मच्छी बाज़ार है| सुबह के सात बजते ही कोलाहल शुरू हो जाता है| मच्छी बाज़ार में मोल भाव भी होता है तो लगता है झगड़ा हो रहा है| मछलियों के थोक व्यापारी टेंपो, ट्रक, ऑटो और टैक्सियों में मछलियों के टोकरे लादकर थोक और फुटकर बाज़ारों तक पहुँचाते हैं|

तीन हेक्टेयर क्षेत्र में फैला ६४५ फुट लम्बा और २९२ फुट चौड़ा यह विशाल डॉक सवा सौ वर्ष पहले की टेक्नोलॉजी के हिसाब से इंजीनियरिंग का चमत्कार है| मुम्बई ही नहीं, पूरे पश्चिमी भारत में हफ़्ते के सातों दिन और चौबीस घंटे काम करने वाला यह अकेला वेट डॉक ८ जून १८७५ को समुद्र पाटकर बनाया गया| बगदाद(इराक) से आए डेविड ससून ने ससून डॉक के निर्माण की शुरुआत तो की, पर उसे पूरा नहीं करा सके| यह काम किया उनके पुत्र अल्बर्ट अब्दुल्ला ससून ने|  ससून परिवार ने इसे डॉक कपास के कारोबार के लिहाज से बनवाया था| मुम्बई में आज यह अकेला डॉक है जहाँ आम जनता को आने जाने की आज़ादी  है|

ससून डॉक वेट हार्बर डॉक है मुम्बई का सबसे बड़ा फिश मार्केट जहाँ रोज़ाना दो करोड़ रुपए मूल्य की तीन सौ टन मछलियों का कारोबार होता है| एक करोड़ मछलियों का अन्य देशों में निर्यात होता है| करीब डेढ़ लाख लोग अपनी रोज़ी रोटी के लिए इस पर निर्भर हैं जिनमें बहुतायत मुम्बई के मूल बाशिंदे कोली समुदाय के हैं| ससून डॉक की १४० साल पुरानी घड़ी अपने आप में करिश्मा है| अपनी बनावट और कारीगरी में बेमिसाल ये घड़ी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है|

मुम्बई का टाइम्स स्क्वायर…..

लंदन में मैंने टफ़ालगर स्क्वेयर   देखा था जहाँ नेल्सन की प्रतिमा हैं| प्रतिमा के चारों ओर चार बब्बर शेर काले पत्थर से बने हैं| इस पूरे कॉलम को नेल्सन कॉलम कहते  हैं| अब देखिये कुछ इसी तरह का बल्कि इससे भी खूबसूरत मुम्बई का टाइम्स स्क्वेयर मुझे आवाज़ दे रहा है कि“आओ, हमें देखो, हममें छुपे इतिहास की परतें खोलो….. उसमें तुम मुझे पाओगी और खुद को भी|” हाँ सच ही है….. अँग्रेज़ों के शासन काल में बनी  टाइम्स  स्क्वायर  की  तमाम  इमारतें….. अब  मुम्बई  की  धरोहर  मानी  जाती  हैं|

ससून  डॉक  सेरीगल  थियेटर तक और उससे भी आगे  की सड़क  काफ़ी  लम्बाई  तक मीना बाज़ार कहलाती  है| मुग़लों के समय का मीना बाज़ार फुटपाथ से लेकर दुकानों तक उतर आता   है।   स्टेंड सिनेमा के पीछे आर. टी. व्ही. सी. यानी रेडियो एंड टी व्ही कमर्शियल का बहुचर्चित ऑफ़िस अभिनय और आवाज़ की दुनिया के कलाकारों का जमघट लगाए रहता है| यहाँ मेरे बड़े भाई स्व. विजय वर्मा आठवें दशक में आवाज़ की दुनिया में अपनी पहचान बना चुके थे| जब मैं मुम्बई आई तो मैं भी वहाँ कॉपी राईटिंग के लिए जाती थी| वो दुनिया ही अद्भुत थी| तबस्सुम विजय गोविल, फारुक़ शेख़, बृजभूषण जैसे जाने माने कलाकारों के संग काम करने का अपना ही लुत्फ़ था| उन दिनों रेडियो पर विजय वर्मा का लिखा रामायण  धारावाहिक प्रसारित होता था| पत्थर बोल उठे, लाल किले की कहानी उसकी ज़ुबानी, एवरेडी के हमसफ़र आदि एक से एक लाजवाब, रेडियो धारावाहिक विजय भाई के पास थे|  लिंटाज़ में अमीन सयानी जी को देखते ही रेडियो सीलोन याद आ जाता था और सीलोन याद आता तो बिनाका गीतमाला भी याद आता और इत्तिफाक ऐसा कि अमीन सायानी जी के अंडर काम करते हुए मुझे पहले टूथपेस्ट का ही जिंगल लिखने को मिला|

नेल्सन कॉलम में प्रेमी प्रेमिका के जोड़े मैंने बैठे देखे थे लेकिन टाइम्स स्क्वायर तो मानो कला नगरी है| चित्रकार, शिल्पकार, गायक, लेखक, रंगकर्मी, नृत्य कला में पारंगत सबसे मुलाकात हो सकती है| जहाँ  टाइम्स स्क्वायर कला नगरी है तो उसकी राजधानी है ‘काला घोड़ा’ या यूँ कह लें कि मुम्बई की शिक्षा, कला और संस्कृति की राजधानी है काला घोड़ा| विलिंगटन फाउंटेन से रीगल सर्कल तक यूँ तो बड़ी व्यस्तता नज़र आती है| विदेशी पर्यटकों का जमघट लगा रहता है, लगता है जैसे हम विदेश यात्रा पर हों| गेटवे ऑफ़ इंडिया की वजह से यह व्यस्तता और बढ़ गई है|गुलमोहर, अमलतास के झरे फूलों से भरे फुटपाथ पर कहीं से अचानक प्रगट हो फोटोग्राफ़र  दबोच लेता है, तो  शॉपिंग  के लिए आवाज़ देने लगता है कोलाबा कॉज़वे |कोलाबा कॉज़वे में जितनी भी इमारतें हैं सब की सब अलग अलग स्थापत्य की|

पहले काला घोड़ा में किंग एडवर्ड सप्तम की तेरह फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा जो श्यामवर्णी थी और काले पत्थर से बने घोड़े पर आसीन थी यहाँ लगाई गई थी| उसी की वजह से इस जगह का नाम काला घोड़ा पड़ा| यह प्रतिमा १८७५ में किंग एडवर्ड सप्तम की भारत यात्रा की स्मृति में बनाई गई थी और जिसे अल्बर्ट ससून ने भेंट किया था| इस प्रतिमा की कीमत उस ज़माने में १२५०० पौंड थी जिसे सर एडगर बोकेम ने आकार दिया था  लेकिन यह प्रतिमा १९६५ के आंदोलन में तोड़ फोड़ दी गई थी| लिहाज़ा उसे भायखला स्थित चिड़िया घर भेज दिया गया| लेकिन इससे काला घोड़ा की रौनक में ज़रा भी आँच नहीं आई| काला घोड़ा फेस्टिवल हो या प्रतिदिन की आवाजाही, मूर्ति से ख़ाली हुई जगह पार्किंग के उपयोग में आने लगी| काला घोड़ा फेस्टिवल के तो क्या कहने| नाटक से लेकर पेंटिंग और नृत्य से लेकर कठपुतली का खेल तक….. क्या नहीं देखने मिलता यहाँ ?कारों का जमावड़ा तब यहाँ नहीं होता| पार्किंग काफ़ी दूर करनी पड़ती है और वहाँ तक सजी धजी बच्चों से लदी विक्टोरिया घोड़ा गाड़ी या खुली छत वाली दो मंज़िली बस पर सवार होकर की जाने वाली हेरिटेज वॉक मानो नये युग की सैर करा देती है| दिन के समय प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूज़ियम जिसे अब छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय कहते हैं के बगीचे में बच्चों के लिए बाँस से बैग बनाने की कला या स्टोन ग्लास पेंटिंग का डिमांस्ट्रेशन होता है तो रात के समय क्रॉस मैदान में केरल का नृत्य मोहिनीअट्टम देखा जा सकता है| हाईकोर्ट के पास से रीगल सिनेमा, एशियाटिक लाइब्रेरी,हार्निमन सर्कल, रेम्पोर्ट रो, डेविड ससून लाइब्रेरी और क्रॉस मैदान तक चक्कर लगाकर पॉटरी वर्कशॉप से लेकर मैक्समूलर भवन में फिल्मों का मज़ा लेते हुए मुम्बईकर जम कर काला घोड़ा फेस्टिवल मनाते हैं|

कोलकाता टैगोर मय है तो मुम्बई शिवाजी मय| शायद ऐसे ही इतिहास रचा जाता है| ऐतिहासिक साक्ष्यों को समेटे प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूज़ियम यानी छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय राजसी ठाट बाट, खूबसूरत उपवन के बीच है| संग्रहालय में न केवल भारतीय बल्कि तिब्बती और नेपाली ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद हैं और इजिप्ट की ४५० वर्ष  पुरानी ममी भी| इमारत मूरिश और गोथिक कला का बेहतरीन नमूना है| उन्नीसवीं सदी में मुम्बई में ऐसी इमारतों का निर्माण हुआ था जो वास्तु की दृष्टि से इस शहर को दूसरे शहरों से अलग बनाती हैं| उस दौरान बनी इमारतों में वास्तुकला को विशिष्ट स्थान दिया गया| संग्रहालय के निर्माण में भी वास्तुकला के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है| मुस्लिम बनावट की जाली, अर्धखुले बरामदे और राजस्थान के महलों जैसे झरोखे बरबस ध्यान खींचते हैं| इस  इमारत का जब निर्माण हो रहा था तो इसके निर्माण से जुड़े जॉर्ज विटीट  ने बीजापुर के गोलकुंडा किले का बारीकी से अध्ययन किया और इस तीन मंज़िला इमारत में उसी किले से मिलते जुलते गुम्बद का निर्माण किया|  संग्रहालय के अंदर भारतीय चित्रकला, शिल्पकला के साथ भारत की प्राचीन संस्कृति के दर्शन होते हैं| संग्रहालय न केवल इतिहास बयां करता है बल्कि यहाँ जीव जन्तुओं और प्राणी विज्ञान का भी सेक्शन है| इमारत में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर नेचुरल हिस्ट्री सेक्शन है|  दूसरी मंज़िल पर लघु चित्रकला (मिनिएचर पेंटिंग) को प्रदर्शित किया गया है| इसी मंज़िल को डेकोरेटिव आर्ट से सजाया गया है| बायीं तरफ तीसरी मंज़िल पर जाने की सीढ़ियाँ हैं| यहाँ पर तिब्बती और नेपाली कला के दर्शन होते हैं| इसके अलावा यहाँ पर यूरोपियन पेंटिंग, अस्त्र शस्त्र और प्राचीन वस्त्रकला को प्रदर्शित किया गया है|

संग्रहालय की दूसरी मंज़िल पर प्रदर्शित वस्तुओं को मुम्बई के कला प्रेमियों ने उपहार में दिया है| सर रतन टाटा और दोरब टाटा ने पोर्सिलिन और शीशे की वस्तुओं को यहाँ भेंट किया है| पचास हज़ार से ज़्यादा कला संग्रहों को समेटे एक सौ एक वर्ष पुराने इस संग्रहालय का शिलान्यास ११ नवम्बर १९०५ में प्रिंस ऑफ़ वेल्स ने किया था और दर्शकों का प्रवेश १९२२ से आरंभ हुआ| वैसे प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए  सैनिकों  के लिए यह अस्पताल के रूप में भी इस्तेमाल होता था|

मैं जहाँगीर आर्ट गैलरी के लिए प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूज़ियम के कंपाउंड से गुज़र रही हूँ, देख रही हूँ मालाड स्टोन से निर्मित गैलरी की कलात्मक इमारत जो एक ऐसा दीपघर है जहाँ पहुँचकर चित्र जगमगा उठते हैं| पचास के दशक में दुर्गा वाजपेयी और वाणूभूता द्वारा इसे डिज़ाइन किया गया था और इसके चार प्रदर्शनी कक्षों में स्थान पाया हर चित्र बहुमूल्य माना जाने लगा|  यह मुम्बई की पहली स्थाई कला दीर्घा है जो सांस्कृतिक व शैक्षिक गतिविधियों का केन्द्र है| सर जहाँगीर कावस कला के संरक्षक थे उनकी याद में निर्मित है यह कला वीथिका| यहीं मेरे बाबूजी गणेश प्रसाद वर्मा ने चित्रकला सीखी थी हालाँकि तब वे बनारस में बनारस  हिन्दू यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे| वह ज़माना था छात्रों की लगन और जुनून का| यहाँ अंदर जो समोवार कैफ़े था वह अब बंद हो गया है|  वह कोई सामान्य कैफ़े नहीं था| वह हमारे आधुनिक कला परिदृश्य और इतिहास का बेहद जीवन्त और जनतांत्रिक गवाह था| जापानी स्त्रियाँ हाथ में जैसा पँखा रखती हैं उसी आकार के प्रवेश द्वार से जब कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मैंने गैलरी में प्रवेश किया तो चित्र  संसार सिनेमा की रील की तरह खुलने लगा|

पीछे लायन गेट है और गेट पार करते ही समुद्र के विशाल हृदय पर तमाम जहाज खड़े नज़र आये| कुछ छूटने की तैयारी में कुछ आने की तैयारी में| यह एक बड़ा डॉकयार्ड है जहाँ सबसे पहला एयर क्राफ़्ट केरीअर आई. एन. एस. विक्रांत का अब तैरता संग्रहालय है जो इंडियन म्यूज़ियम शिप विक्रांत के नाम से प्रसिद्ध है| यह संग्रहालय अद्भुत मरीन वस्तुओं का संग्रह है|

टाइम्स स्क्वेयर में छै: रास्ते कुछ इस ढंग से आपस में जुड़े हैं जिनके एकदम बीच में अद्भुत एवम् अलग-अलग प्रकार की इमारतें इन रास्तों को लेकर अलग-अलग दिशाओं में खुलती हैं|उत्तर में हुतात्मा चौक (फ्लोरा फाउंटेन) है| १८६४ में रोमन देवी फ्लोरा के नाम से फ्लोरा फाउंटेन कहलाया| यहाँ देवी फ्लोरा की मूर्ति दूर से ही आकर्षित करती है| रात की रोशनी में फव्वारे का पानी झिलमिलाताहै| मुम्बई का यह बेहद व्यस्त इलाका है| सस्ते दामों में अँग्रेज़ी की किताबें यहाँ के फुटपाथों पर मिल जाएँगी| तमाम बैंक, बड़ी बड़ी एजेंसियों के दफ़्तर यहाँ की शान हैं|

दक्षिण में रीगल सिनेमाघर है, पूर्व में मुम्बई बंदरगाह तथा पश्चिम में ओवल मैदान है| इन सभी छै: रास्तों में मानो मुम्बई का इतिहास, कला, संस्कृति, शिक्षा एकजुट होकर दिखाई देती है| यहीं कैथेड्रल का भ्रम देती दुनिया भर की पुस्तकों से और पुस्तक प्रेमियों से खचाखच भरी डेविड ससून लाइब्रेरी बुद्धिजीवियों को आमंत्रण देती सी प्रतीत होती है| क्या कोई यकीन करेगा कि विश्व के ४७ क्लासिकल पुस्तकालयों में से एक डेविड ससून लाइब्रेरी की इमारत का निर्माण १८७० में डेविड ससून के द्वारा दान में दिये गये साठ हज़ार रुपियों से हुआ? इसकी चौड़ाई में बनी बड़ी बड़ी सीढ़ियाँ और उद्यान इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं|

रीगल सिनेमा के सामने अँग्रेज़ों के ज़माने का महाराष्ट्र स्टेट पोलीस हेडक्वार्टर है| यह पहले नेवल ‘रॉयल’ अल्फ्रेड सेलर्स का घर था| यहीं विलिंगटन फाउंटेन है| १८६५ में ड्यूक ऑफ़ विलिंग्टन जब मुम्बई आया था तब यह फाउंटेन बना था| एलफिंस्टन कॉलेज, रॉयल इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस, कावसजी जहाँगीर हॉल, मैक्समूलर भवन, के आर. कामा ओरियंटल इंस्टिट्यूट, हार्नबिल  हाउस,आर्मी और नेवी की बिल्डिंग, सेंट एंड्रूज़ चर्च, कोलेबाज़ चर्च, दि ग्रेट वेस्टर्न बिल्डिंग ओल्ड  कस्टम हाउस, मैजेस्टिक होस्टेल, वाटरलू  मेंशन और राइटर्स बिल्डिंग| टाइम्स स्क्वेयर चकरा देता है कि  पर्यटक क्या-क्या देखे| इन सभी बेहद खूबसूरत इमारतों-फव्वारों, हरे  भरे विशाल दरख़्तों से घिरी सड़कों पर टहलते हुए ऐसा लगता है जैसे हम अंग्रेज़ों के ज़माने की सैर कर रहे हों| इस जीवंत इतिहास को और भी जीवंत बनाती हैं यहाँ की गोथिक कला की  इमारतें| पुरातत्व  विभाग  इनका  संरक्षक  है| जब  रात की जगमगाती रोशनियों में मुम्बई अपना हुस्न बिखेरती हैं तो इन तमाम इमारतों की ख़ास-ख़ास गोथिक कला की जगहों पर पीली रोशनियाँ फूटकर निकलती हैं| मुम्बई के इस रूप सौंदर्य की कोई बराबरी नहीं|

टाइम्स स्क्वायर में इमारतों के अतिरिक्त सहज मिल जायेंगे रेस्तरां, कैफ़े, किताबें  और म्यूज़िक की दुकानें|  बूटीक्स और हस्तकला के अद्भुत नमूनों से भरी दुकानें|  दोपहर हो, शाम हो या रात हो….. यहाँ जमघट रहता है महानगर के कलाकारों, पत्रकारों, साहित्यकारों, प्रकाशकों, वैज्ञानिकों, संगीत प्रेमियों और मूर्तिकारों का|  ज़रूरी नहीं है कि वे एक दूसरे से परिचित हों| उन्हें उनकी कला जोड़ती है और एक कप कॉफ़ी या चाय उन्हें अंतरंग  बना देती है| यहीं से मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा और हुसैन ने चित्रकला का आंदोलन छेड़ा था और यहीं से जमशेदजी टाटा, लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और दादाभाई नौरौज़ी आज़ादी की लड़ाई में कूदे थे| यहीं भारत  के प्रथम संविधान निर्माता डॉ. बी. आर. अंबेडकर और देश को परमाणु शक्ति देने वाले होमी जे.भाभा ने अपनी कीर्ति पूरी दुनिया में फैलाई थी| इन सब महान विभूतियों ने और इनके अतिरिक्त महादेव गोविंद रानाडे, बदरुद्दीन तैयबजी, दिनशावाच्छा, भूलाभाई देसाई  और  के. आर. कामा  जैसे दिग्गजों ने  जहाँ  शिक्षा  पाई वो एलफिंस्टन कॉलेज मुम्बई की शान है| विक्टोरियन नियो और गोथिक शैली में इस कॉलेज की इमारत दो मंज़िला है| विशाल  अहाता है| इसकी जो बीच की और आख़िरी बुर्जियाँ हैं वहाँ और भी मंज़िलें हैं| इमारत के अग्रभाग में मुम्बई के शिक्षा प्रेमी गवर्नर रे माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन का चेहरा दूर से दिखाई दे जाता है| इमारत का सबसे बड़ा आकर्षण है महाराष्ट्र स्टेट आर्काइव और एक लाख से ज़्यादा दुर्लभ पुस्तकों वाला पुस्तकालय| इसे २००४ में यूनेस्को का एशिया पैसिफिक हेरिटेज अवार्ड मिल चुका है| टाइम्स स्क्वेयर घूमते हुए मैं अभिभूत हूँ….. राजा रवि वर्मा के बनाए चित्र ने मेरे उपन्यास ‘मालवगढ़ की मालविका’ को मूल्यवान बना दिया है क्योंकि उसका मुखपृष्ठ उन्हीं के बनाए चित्र से सुशोभित है| वैसे चित्रकारों के लिए काशी कही जाने वाली देश विदेश के चित्रकारों की प्रदर्शनियाँ इस जगह को और मूल्यवान बना देती हैं| चित्रकार महीनों इंतज़ार करते हैं कि कब आर्ट गैलरी में उन्हें अपने चित्र प्रदर्शित करने का मौका मिले क्योंकि आसानी से गैलरी की बुकिंग ही नहीं मिलती|

१९वीं सदी के आख़िरी वर्षों में बनी एलफिंस्टन बिल्डिंग बहुरंगी पत्थरों से बनी है| यह बिल्डिंग इतनी खूबसूरत है कि प्रवेश द्वार और विशाल मेहराबों को देख मन इसकी ओर खिंचता चला जाता है| सड़क के उस पारबलुई पत्थरों से बने इंडो सारसेनिक शैली के रैडीमनी मैंशन की ख़ासियत उसके घुमावदार छज्जे और झरोखे हैं जो जयपुर की हवेलियों की याद दिलाते हैं| एलफिंस्टन बिल्डिंग के बाजू में ब्रैडी हाउस जो पहले रॉयल इंश्योरेंस बिल्डिंग के नाम से जाना जाता था| पश्चिम रेल वाली ‘बॉम्बे बड़ौदा ऐंड सेंट्रल इंडिया रेलवे’ तथा‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के कार्यालय भी यहीं थे| नियो क्लासिकल शैली में बनी इसी से लगी हुई इमारत ‘ब्रिटिश बैंक ऑफ़ दि मिडिल ईस्ट’ है|दो मंज़िल की वाडिया बिल्डिंग पोत निर्माता वाडिया परिवार की विरासत है|

ब्रिटिश बैंक बिल्डिंग के बाद कावसजी पटेल स्ट्रीट पर १९वीं शताब्दी के वास्तुशिल्प वाली कुछ और आकर्षक इमारतें हैं|जैसे मेरवान बेकरी पारखी व्यापारी बानाजी लिमजी द्वारा बनवाई अगियारी है| महात्मा गाँधी रोड पर गोथिक शैली की तिमंज़िली ओरियंटल इंश्योरेंस बिल्डिंग है|पहले इस बिल्डिंग में जॉन कैनन स्कूल हुआ करता था| दादाभाई नौरोज़ी की १९२५ में बनवाई गई प्रतिमा इस बिल्डिंग के बाहर लगी है जो फ्लोरा फाउंटेन के ठीक सामने है|

कास्ट आयरन बिल्डिंग एस्प्लेनेड हाउस इस इलाके की ही नहीं बल्कि भारत की सबसे पुरानी इमारत है और अगर कहें कि आज की गगनचुम्बी इमारतें इसी निर्माण १८६० से ६३ के बीच हुआ| यह मुम्बई का सबसे ग्लैमरस होटल यानी वोटसन का ठिकाना रहा है जहाँ ल्यूमरे ब्रदर्स ने अपनी पहली फिल्म प्रदर्शित की थी|

बीसवीं सदी के पहले दशक में बनी आर्मी एन्ड नेव्ही  बिल्डिंग नियोक्लासिकल शैली का बेहतरीन नमूना है| टाटा ग्रुप और कला मैग्ज़ीन  मार्ग  के  कार्यालयों  को  समेटे  यह  भव्य  इमारत  अतीत  की  सैर करा  देती  है|

टाइम्स  स्क्वायर  सदियों के स्थापत्य का इतिहास समेटे है| अब  यहाँ स्थित रीगल सिनेमाघर को ही ले लीजिए! अद्भुत….. याद  आ  रहा  है  इसी  रीगल  के  सामने  मेरी  मुलाकात  फिल्म  अभिनेत्री निम्मी से हुई थी| उनका शो था यहाँ….. उनके साथ निर्माता निदेशक भी रहे होंगे पर मैं तो उनकी सुन्दरता देखती रह गई थी| रीगल उन सबकी स्मृति सँजोये बरकरार है| ….. भारत की पहली अंडरग्राउंड कार पार्किंग यहीं  है| यहीं है बॉम्बे हाउस| कालाघोड़ा और फ्लोरा फाउंटेन के नज़दीक है बॉम्बे हाउस जो प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा यानी टाटा घराने का मुख्यालय है| इसे जॉर्ज विलेट ने आकार दिया | स्थापत्य मालाड पत्थरों का है | चार मंज़िला यह इमारत अपनी भव्यता की वजह से दूर से ही देखी जा सकती है| यहीं १९३२ में भारतीय एयरलाइन की संकल्पना की गई थी|

जमशेदजी टाटा गुजरात के नवसारी में नौशेरवानी टाटा के घर जन्मे उनके एकमात्र पुत्र थे| जिन्होंने मुम्बई के चिंचपोकली इलाके में १८६९ में एक जर्जर और दिवालिया मिल को खरीद कर टाटा साम्राज्य की नींव रखी थी| टाटा पहला औद्योगिक समूह है जिसके मुख्यालय का नाम ‘बॉम्बेहाउस’ है| अंग्रेज़ों के शासन काल में उन्हें भारतीय होने के कारण वोटसन होटल में प्रवेश नहीं मिला था जिसे चुनौती मान उन्होंने ताजमहल होटल का निर्माण किया| उस ज़माने में बिजली का उपयोग करने वाला यह पहला होटल था|

जनरल पोस्ट ऑफ़िस यानी जी. पी. ओ. अंग्रेज़ी शासनकाल में १९१३ में निर्मित हुआ था |११००० वर्गमीटर में फैला यह मुख्य डाक घर अंग्रेज़ों ने १९लाख रुपयों में इस उद्देश्य से बनवाया था ताकि भारत के दूरदराज़ के इलाके संपर्क कायम रख सकें| बीजापुर के गोल गुम्बद से मिलता ६५ फीट की परिधि में फैला विशालतम गुंबद, ऊँची सीलिंग वाले बड़े बड़े कमरे, १०१ काउंटरों वाला,१२० फुट ऊँचा विशाल गोलाकार सेंट्रलहॉल, १२००० वर्गमीटर का बाइसेंटेनरी हॉल, लम्बे-लम्बे गलियारे, गोल सीढ़ियाँ, लम्बा चौड़ा बेसमेंट, दोनों ओर से खुली लिफ्टें ….. जब मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह में पत्रकार थी तो अपने डाक टिकट संग्रह के शौक की वजह से फर्स्ट-डे-कव्हर और नई डाक टिकटों को ख़रीदने पहुँच जाती थी वहाँ| न जाने कितनी डाक टिकटें आज मेरे डाक टिकट अल्बम की शान हैं| जिसमें मुझे सबसे प्रिय है प्रथम चंद्रयात्री नील आर्मस्ट्रांग द्वारा चाँद से पृथ्वी का खूबसूरत चित्र जो उन्होंने चाँद पर ही बनाया था| जी. पी. ओ. का फिलैटलीसेक्शन मेरा यह शौक पूरा करने में अहम भूमिका निभाता था|

जी. पी. ओ. इमारत इंडो अरब शैली की है| काले और पीले पत्थरों तथा सफ़ेद धारंग धरा पत्थरोंसे बनी यह इमारत जहाँ मौजूद है वह मुम्बई का व्यापारिक क्षेत्र है| इसके अधीन एक ब्रांच और सत्रह सब पोस्ट ऑफ़िस हैं जो साढ़े चार किलोमीटर के इलाके में अपनी सेवाएँ पहुँचाते हैं| सुबह छै: बजे से रात दस बजे तक काम चलता है और लगभग ग्यारह हज़ार कर्मचारी काम करते हैं| अक्टूबर २०१० में इमारत के सामने वाले बगीचे में २०० साल पुराना एक तहख़ाना जब मिला तो मुम्बई महानगर चौंक पड़ा था| १८वीं सदी में जब फ्राँस में नेपोलियन बोनापार्ट दुनिया में नई ऊँचाईयाँ छू रहा था तो अंग्रेज़ों ने इस डर से कि कहीं फ्राँसीसी सेना यहाँ भी न आ धमके, भागने के लिए एक चोर सुरंग अपोलो बंदर से मुम्बई हाई कोर्ट और सेंट जॉर्ज फोर्ट तक बनाई थी|इस इमारत में मुन्ना भाई एम बी बी एस, रब ने बना दी जोड़ी, फरारी की सवारी, वंस अपॉन ए  टाइम  इन  मुम्बई, अब तक छप्पन नामक फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है| टीवी  सिनेमा  पर  हिट  मशहूर  विज्ञापनों  में  कई  ऐसे  हैं जो यहीं  फिल्माए  गये  हैं|

साहित्यकारों  का  जमावड़ा  रहता  था  फोर्ट  में…..

मुम्बई  का फोर्ट इलाका बेहद मशहूर इमारतों के लिए जाना जाता है| यहाँ की डी. एन. रोड(दादाभाई नौरोजी रोड) के नाम से टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सामने की सड़क पहचानी जाती है| यह सड़क और विक्टोरिया टर्मिनस तीस पैंतीस साल पहले साहित्यकारों के आकर्षण का केंद्र था क्योंकि तब टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप से हिंदी, अंग्रेज़ी की बेहतरीन साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक पत्रिकाएँ निकलती थीं| धर्मयुग, सारिका, माधुरी, नंदन, ऑनलुकर, इलस्ट्रेटेड वीकली जैसी बड़े सर्कुलेशन की पत्रिकाएँ यहाँ से निकलती थीं और भारत के हर शहर के पाठक वर्ग तक हाथों हाथ पहुँच जातीं| डॉ. धर्मवीर भारती, खुशवंत सिंह, कुर्रतुल एन हैदर, अवधनारायण मुद्गल, कमलेश्वर, कन्हैयालाल नंदन, जैसे संपादकों से मिलना हर नये लेखक के लिए सफलता की सीढ़ी हुआ करता था|मैं भी भारती जी से उसी दौरान मिली थी| वह मिलना मेरी पत्रकारिता और लेखन की इब्तिदा की तारीख़ों का था जब भारतीजी ने मेरी कुल जमा तीन कहानियों को धर्मयुग में प्रकाशित कर मुझे पहचान लिया था कि मैं ही वो लेखिका हूँ जो जबलपुर से पत्रकार बनने आई हूँ| दो महीने बाद ही मुझे लिखने के लिए उन्होंने धर्मयुग में स्तंभ दिया ‘अंतरंग’ जो तीन साल मैंने लिखा और बेहद चर्चित भी हुआ|

वह बीसवीं सदी का आठवाँ दशक रहा होगा जब फिल्मों में गीत और संवाद लिखने के लिए बाक़ायदा नामी गिरामी हस्तियाँ जुटी हुई थीं| साहित्यकारों, शायरों और कवियों का बोलबाला था यहाँ| साहिर लुधियानवी, जांनिसार अख़्तर, शैलेन्द्र, कैफी आज़मी,मजरूह सुल्तानपुरी, प्रदीप तब अपने पूरे निखार पर थे|यहाँ तक कि तब इनके गीतों और साहित्यिक रचनाओं में फर्क करना मुश्किल हो जाता था| ये सारे गीतकार प्रगतिशील आंदोलन और इप्टा से जुड़े थे और तब ट्रेड यूनियन आंदोलन अपने चरम पर था|

तमाम बेहतरीन इमारतों से समृद्ध फोर्ट इलाके का भ्रमण इतिहास के पन्नों को पलटने जैसा है| मराठी पत्रकार संघ की इमारत के सामने हाईकोर्ट बिल्डिंग है जिसकी स्थापना हुए एक सौ छत्तीस वर्ष हो चुके हैं| १४अगस्त १८७८ में निर्मित बॉम्बे हाईकोर्ट आज जहाँ है वहाँ कभी मैदान हुआ करता था| रेम्पोर्ट रिमूवल कमेटी के जेम्स टरवशे ने इस मैदान के लिए एक मास्टर प्लान बनाया जिसके अनुसार आज़ाद मैदान और क्रॉस मैदान उत्तर दिशा में, केन्द्रीय हिस्सा ओवल मैदान की तरफ़ और दक्षिण की तरफ़ कूपरेज मैदान| इसके निर्माण के लिए हैदराबाद निज़ाम के यहाँ से तेलुगू कमाठी कामगारों को मुम्बई लाया गया| १८वीं सदी में इन कामगारों द्वारा कई खूबसूरत इमारतों का निर्माण करने में जिनमें यूनिवर्सिटी बिल्डिंग, सेक्रेटेरियट और हाईकोर्ट की इमारत शामिल है योगदान रहा| इस इमारत के निर्माण में २,६६८ रुपए ख़र्च हुए जो तयशुदा रक़म से काफ़ी कम थे| गोथिक शैली में बनी इस इमारत की ऊँचाई ५६२ फुट है और यह ८१ हज़ार वर्गफुटमें फैली हुई है| इमारत का भीतरी हिस्सा लाइम प्लास्टर पत्थर से तैयार किया गयाहै और बाहरी हिस्सा ब्लूशिवरी स्टोन से बना है| इमारत की मुख्य दीवार की सीढ़ियों के पास एक संगमरमर की शिला पर ‘वी’ और‘आर’ लिखा हुआ था पर स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इसे हटाकर यहाँ पर अशोक स्तंभ के चिह्न को स्थापित किया गया| हाईकोर्ट के मुख्य द्वार के सामने दो प्रतिमाएँ हैं जिनमें से एक न्याय की देवी है|इसके एक हाथ में तराजू और तलवार है और दूसरी प्रतिमा क्षमा दया की देवी है जिसने अपने हाथ सोचने की मुद्रा में जोड़े हुए हैं|इमारत में जानवरों मगरमच्छ, कुत्ते, साँप, बंदर, लोमड़ी को शिल्पकार ने कई जगहों पर कोर्ट की मुद्राओं से जोड़ा है| एक बंदर ने अपनी आँख पर पट्टी बाँधी है और हाथ में न्याय का तराजू और तलवार है| एक लोमड़ी को गले में एडवोकेट वाला बैंड पहने दिखाया गया है| खूबसूरत  नक्काशियों और शिल्प में पंचतंत्र और जातक कथाओं के अलावा एडशॉप की कहानियों को भी चित्रित किया गया है| इसके अलावा दो और प्रतिमाएँ हैं जो स्त्रियों की हैं| दोनों साड़ी पहने, सिर पर पल्लू लिए हैं| उनकी वहाँ उपस्थिति का पता लगाना कठिन है|

१९७७ में मुम्बई आई थी मैं पत्रकार बनने और पूरी तरह से बसने तब फोर्ट, बलॉर्ड एस्टेट घूमते हुए यह अनुभूति नही हुई जैसी अब हो रही है| लंदन से लौटकर यहाँ घूमते हुए मुझे लग रहा है जैसे मैं लंदन में ही हूँ| बलॉर्ड एस्टेट को यूरोपीय पुनर्जागरण काल की एडवर्डियन नियोक्लासिकल  शैली की सुंदर, आकर्षक और महँगी इमारतों से भरा मुम्बई का आधुनिक रूप से नियोजित पहला कारोबारी परिसर होने का श्रेय हासिल है| यहाँ का हरी भरी और छतनारे दरख़्तों से घिरी चौड़ी चिकनी सड़कों के किनारे एक जैसे रंग, रूप, आकार, शैली और ऊँचाई की इमारतों को देख बरबस मन हो आता है कि काश, हम भी इसमें रहते|  यह इलाका  समुद्र को पाट  कर  बनाया गया है| यहाँ  कई  पेड़ तो सौ साल से भी ज़्यादा पुराने हैं| २२एकड़ में फैले इस इलाके में स्थित इंदिरा डॉक की खुदाई में निकली मिट्टी और पत्थरों से  इसका निर्माण किया गया| जॉर्ज विटेट ने इसे पूरा लंदन की तर्ज़ का रूप दिया और इसका नाम मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के संस्थापक कर्नल जे. ए. बलॉर्ड के नाम पर बलॉर्ड एस्टेट रखा गया|

कॉस्ट आइरन के पोर्च, पोर्टिको, प्रशस्त  लॉबीज़, ऊँची खिड़कियाँ, छज्जे, घुमावदार  कोर्निस यहाँ की इमारतों की विशेषता है| इनमें से कई इमारतें ‘हेरिटेज’ श्रेणी में आती  हैं| यह इलाका महान विभूतियों की स्मृति में रखे गये  सड़कों के नामों से ही परिचित है|कई जानी मानी कंपनियों के मुख्यालय यहीं हैं| रिलायंस सेंटर, अनिल अंबानी ग्रुप का मुख्यालय यहीं है जिसे मूल रूप से हवेरो ट्रेडिंग कंपनी ने डिज़ाइन किया था|मुम्बई के सबसे पुराने दैनिक अख़बारों में‘जाम-ए-जमशेद’ यहीं से प्रकशित होता है|

यहाँ कामयाबी की बहुत सारी कहानियाँ बिखरी हुई हैं| बलॉर्ड एस्टेट ने कईयों को फर्श से अर्श तक पहुँचाया है| मुम्बई गोदी बंदरगाह के बिल्कुल क़रीब होने के कारण बलॉर्ड इस्टेट में एक ओर शिपिंग कम्पनियों की भरमार है तो ओरियंट लांगमैन जैसे प्रकाशकों के बिलिंग हाउस और बुक पॉइंट, बुक शॉप जैसी किताबों की दुकानें भी हैं| पत्थरकी ऊँची दीवार और ‘इंदिरा डॉक’ का प्रवेशद्वार‘ग्रे गेट’ ‘डेड एंड’ है|

पोर्ट ट्रस्ट बिल्डिंग पत्थर से बनी है| पहली मंज़िल पर दो खूबसूरत जहाजों के शिल्प नौवहन में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं| मिंट, न्यू कस्टम हाउस, टाउन हॉल और रिज़र्व बैंक की शानदार इमारतें इसकी पड़ोसी हैं|बलॉर्ड बंदर गेस्ट हाउस ग्रेड वन की हेरिटेज इमारत आज नेवी का मरीटाइम म्यूज़ियम है|बहुत शानदार दिनों का गवाह है बलॉर्ड पियर|१९४४ में बंद होने के पहले बलॉर्डपेयर मालवाहक जहाजों और सैनिकों की आवाजाही का मुख्य केन्द्र था| यूरोप और पश्चिमी देशों से आने वाले जहाजी मुसाफिर भी यहीं उतरा करते थे| १९३१ में लंदन की गोल मेज कॉन्फ्रेंसमें भाग लेने के बाद महात्मा गाँधी भी यहीं उतरे थे|आज यह मुम्बई आने वाले क्रूज़ पैसेंजरों का टर्मिनल है| यह पोर्ट ट्रस्ट रेलवे का भी गौरवपूर्ण हिस्सा है|बीस और तीस के दशक में पेशावर के लिए फ्रंटियर मेलऔर पंजाब मेल जैसी मशहूर ट्रेनों का यह ठिकाना रहा है और आज भी देश का सबसे बड़ा कंटेनर ट्रैफिक स्टेशन है|

मोदी बे पर बनने वाली पहली इमारत मार्शल बिल्डिंग चार मंज़िला है| ट्रेक्टर, रोड रोलर और कृषि औजार बनाने वाली मेसर्स मार्शलसंस एंड कम्पनी के भारत स्थित मुख्यालय का                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      आकर्षण अस्त्र शस्त्र और शिरस्त्राण धारी ब्रिटेनिया की प्रतिमा|पहली मंज़िल पर कम्पनी को मिले मेडल और पुरस्कारों की ट्रॉफ़ियाँ रखी हैं|सड़क के दूसरे छोर पर सामने है ग्रेशम बिल्डिंग और ग्रैंड होटल| ग्रैंड होटल की ड्योढ़ी के तो कहने ही क्या|

गुज़रे ज़माने में रोज़गार की गतिविधियों की वजह से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के सामने घनी आबादी वाले इलाके को बाज़ार गेट के नाम से जाना जाता था| लेकिन अब सिर्फ़ बाज़ार ही रह गया है| कोठारी कबूतरखाना और वहाँ स्थित प्याऊ….. ग्रे स्टोन से बना बाज़ार गेट पुलिस स्टेशन और ब्लैक स्टोन से बना ब्लैकी हाउस पुराने ज़माने की कहानी कहते नज़र आते हैं|कुछ इमारतें आज भी मौजूद हैं| जिनके अगवाड़े, मंगलूर टाइल वाली छतों, लकड़ी और कास्ट आयरन के बारीक काम वाले छज्जों, बरामदे और ओटलों में पुरानेपन की छाप अब भी मौजूद है| ज़्यादातर पारसी कारोबारियों के गौरवपूर्ण अतीत से यह इलाका जुड़ा है| हालाँकि रेडीमेड कपड़े, पोशाकें डिज़ाइन करना और सीना आदि का काम पारसी आज भी यहाँ कर रहे हैं और पारसी परम्परा को सहेजे हुए हैं|

बाज़ार गेट में ऐसी इमारतें भी हैं जिनकी उपयोगिता अब बदल गई है| मसलन, यूरोपियन जनरल हॉस्पिटल अब सर जमशेदजी स्कूल हो गया है|पुलिस कोर्ट लेन में अब पुलिस नहीं है|बोमनजी होरसोमजी वाडिया फाउंटेन और क्लॉक टॉवरपर पारसियों के लिए पवित्र मानी जाने वाली अग्नि के चिह्नबने हैं|भीतर पारसी संत की प्रतिमा है जिनकी स्मृति में ये बनाया गया|बाज़ार गेट लक्ष्मी वेंकटेश मंदिर, कोट शांतिनाथ जैन देरासर, गोदावरा गमाडिया अगियारी, मानेकजी नौरोजी सेठ अगियारी, मोदी स्ट्रीट मस्जिद जैसे धार्मिक स्थानों और ‘जन्मभूमि प्रवासी’, ‘जामे जमशेद’, ‘समाचारदर्पण’ जैसे अखबारों के कार्यालयों और स्ट्रेंड बुक स्टोर व बॉम्बे स्टोर जैसी दुकानों के लिए भी जाना जाता है|पारसीवाडे यहाँ की ख़ास पहचान थे| यहाँ के ईरानी होटल आईडियल रेस्त्रां की चाय, बन मस्का और पुडिंग खाने के शौकीनों की ज़बान पर आज भी बसी है|खूबसूरत सजे धजे पैनलों वाले यूनाइटेड इंडिया और बॉम्बे म्यूचुअल लाइफ़ जैसी इमारतें यहाँ की शान हैं| तीस के दशक में बनी यहाँ की ज़्यादातर कारोबारी इमारतों का स्थापत्य आर्ट डेकोऔर भारतीय शैलियों का मिश्रण है| लक्ष्मी बिल्डिंग को विशेष बनाता है देवी लक्ष्मी की प्रतिमा वाला शानदार क्लॉक टॉवर|बहुत आकर्षित करता है हाथियों वाला प्रस्तर शिल्प भी|

बाज़ार गेट की चक्करदार गलियों और सड़कों में तकरीबन सभी से कोई न कोई दिलचस्प कहानी जुड़ी है और लगभग सभी का नाम उनमें रहने वाले बहुसंख्यक समुदाय के नाम पर है|

फोर्ट में एक अद्भुत इमारत है सेंट जॉर्ज़ लॉज़| एंटीक फर्नीचर, पूर्व ग्रैंडमास्टर्स के सुंदर फोटोफ्रेमों व संगमरमरी शिलापटों से भरे सुंदर कमरों, अहातों, सीढ़ियों, बरामदों और काली सफेद टाइल्स वाले कार्पेट से गुज़रो तो सब कुछ बड़ा रहस्यमय लगता है| अंदर यानी भीतरी हिस्सों में गीता, बाइबिल, कुरान जैसे धर्मग्रंथों के साथ मेजों पर रखे हथौड़ों की घन-घन, कुर्सियों पर बांकी भूषा में सजे लोगों के कानों से टकराकर लॉज की दीवारों को टकोरती सी लगती है|यह इमारत है ही रहस्यमयी संस्था फ्रीमैसंस का कार्यालय| संस्था की तह तक जाकर बखान करना मेरे लिखने का उद्देश्य नहीं पर जो कुछ देखा, समझा उससे यही जाना कि जाति-पांति और धर्म के बंधनों से मुक्त, भाईचारे पर आधारित यह संस्था सबसे पुरानी वैश्विक सेकुलर सोसाइटी है जिसके विश्व भर में ४५ लाख सदस्य हैं और भारत में २२ हज़ार| इसका उद्देश्य है जनता में फैली ग़लतफहमियों को दूर करना|

ग़लतफहमियाँ, अँधविश्वास, धार्मिक उन्माद कभी किसी काल में न तो कम हुए हैं, न दूर हुए हैं और न होंगे |यह सब मनुष्य की सोच और मानसिकता पर निर्भर  है| मुम्बई में प्रतिदिन हज़ारों किलो हरी मिर्च और नीबू इसी अंधविश्वास पर बरबाद होते हैं|मुम्बई की हर दुकान, टैक्सी, बस, कार, ऑटो में सात मिर्च और एक नीबू का गुच्छा ज़रूर लटकता नज़र आयेगा जिसे नज़र न लगने के प्रतीक या टोटके के रूप में इस्तेमाल किया जाता है|

आईरिश पत्रकार बेंजामिन ज्यू  हार्निमन जिन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध भारतीयों का साथ दिया और आज़ादी के लिए आवाज़ बुलंद की, उनके नाम पर एलफिंस्टन सर्कल का नाम बदलकर हार्निमन सर्कल रख दिया गया| हार्निमन सर्कल बनने के पहले टाउन हॉल के ठीक सामने के गोलाकार चक्कर ने बॉम्बे ग्रीन,सेंट्रल ग्रीन सर्कल और एलफिंस्टन सर्कलजैसे स्थान होने के कारण शहर की महत्वपूर्ण घोषणाओं की मुनादी और अहम अवसरों पर फौजी कवायद (परेड) यहीं होती थी| नज़दीक ही बाज़ार गेट है जहाँ से तोपों की सलामी के साथ ये परेड होती थी| अगियारी और चर्च पास होने से पारसी और ईसाई समुदायों की सामाजिक गतिविधियों का यह सबसे प्रमुख अड्डा था|

हार्निमन सर्कल १८६० में बना था| इसके खूबसूरत बगीचे में नायाब क्रोटन और दुर्लभ पेड़ पौधे हैं| फूलों से ये बगीचा महमहाता रहता है|यहीं सेंट थॉमस कैथेड्रल है| सन १८३८ में बने गोथिक कला के इस कैथेड्रल की तारीख़ों का कुछ ऐसा करिश्मा है कि २५ दिसंबर क्रिसमस के ही दिन यहाँ पहली प्रार्थना की गई|चैपल १८६० में बना| प्रवेश द्वार पर गोथिक कला का फव्वारा है जिसका डिज़ाइन इंग्लैंड में सर गिल्बर्ट स्कॉट ने तैयार किया|

१९वीं सदी में जब कपास और कपड़ा मिलों के व्यापार की जड़ें गहरी हुईं तो बॉम्बे ग्रीन की चहल पहल और बढ़ी और सुहानी शामें बैंडकी आवाज़ से मुखर हो उठीं| उन दिनों यहाँ एक इमली का छतनारा पेड़ हुआ करता था जिसके नीचे छोटा सा बाज़ार लगता था| यह जगह टेमरिंड लेन के नाम से मशहूर थी| इसके पश्चिम में एक बरगद का पेड़ था| वहीं कुएँ प्याऊ और जानवरों को पानी पिलाने के हौज आज भी खण्डहर के रूप में मौजूद हैं|

देश के सबसे पुराने अखबारों में से एक १९३ साल पुराना “बॉम्बे समाचार” १९३५ से यहाँ स्थित रेड हाउस से प्रकाशित हो रहा है जो सचमुच रेड हाउस है क्योंकि उसकी दीवारें लाल ईंटों की हैं| हार्निमन सर्कल की अपोलो स्ट्रीट ‘बॉम्बे समाचार’ मार्ग के नाम से जानी जाती है| इसी से लगी बैंक ऑफ़ इंडिया की बिल्डिंग अपनी गुंबद के कारण खूबसूरत लगती है तो यूनियन बैंक की बिल्डिंग आर्टडेकोकलेवरके कारण और इलाहाबाद बैंक का आकर्षण है उसका सुंदर काष्ठवर्क|स्टेट बैंक की बिल्डिंग पत्थर से बनी है| बैंक ऑफ़ बड़ौदा भी खूबसूरत बिल्डिंग में सिमटा है|

जेम्स मैकेंटॉश द्वारा २६ नवम्बर सन १८०४ में स्थापित एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ इंडिया आज भी पूरे फोर्ट इलाके में एक बड़े लैंडमार्क के रूप में प्रख्यात है|यह प्रमुख रूप से उच्च शिक्षित नागरिकों की आवाजाही चहल पहल से आबाद रहता है| यहाँ भारत की आज़ादी की कई योजनाएँ बनीं जिन्हें साकार रूप दिया गया| इसइमारत में सम्राट कुमारगुप्त के समय के सोने के सिक्के और छत्रपति शिवाजी महाराज द्वाराचलाए गये सिक्कों समेत कुल ११८२९ अनमोल सिक्कों का संग्रह है| इसके अलावा देश की कई बेशकीमती पाँडुलिपियाँ सहेज कर रखी गई हैं और हज़ारों दुर्लभ किताबों का संग्रह किया गया है जिनमें से पंद्रह हज़ार किताबों को अति दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है|

फोर्ट एरिया में सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ लॉ है, जे. एन. पेटिट लाइब्रेरी है, दावूडी बोहरा एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफ़िस और खादी भंडार है| डी. एन. रोड स्थित खादी भंडार का ‘भारतीय बनो, भारतीय वस्तुएँ ख़रीदो’ का नारा बुलंद करने में बहुत बड़ा हाथ था| अंग्रेज़ी कपड़ों का बहिष्कार करते हुए भारतीयों ने देशी कपास और देशी चरखे से खुद के बनाए धागों और उन धागों से खादी के कपड़ों को बनाकर इस्तेमाल किया था और खादी भंडार में उसकी बिक्री शुरू हुई थी| उस समय खादी से बने कपड़े और सफेद….. गाँधी टोपी देश में पहले असहयोग आंदोलन का माध्यम बनी थी| बाद में गाँधी टोपी आज़ादी का प्रतीक बन गई | पंडित जवाहरलाल नेहरु जब जेल में थे तब उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा की शादी के लिए गुलाबी रंग की खादी की साड़ी यहीं से ख़रीदी थी|आज भी खादी भंडार में प्रवेश करते ही इतिहास मानो साकार हो उठता है| कभी इस विशाल भंडार में आज़ादी के मतवालों और स्वदेशियों का जमघट लगा रहता था लगता है मानो हम भी उस जमघट का एक हिस्सा थे|

फोर्ट स्थित क्रेफ़र्ड मार्केट मुम्बई का बेहद व्यस्त रहने वाला बाज़ार है| जिसे अब महात्मा ज्योतिबा फुले मार्केट कहते हैं|७२००० स्क्वेयर यार्ड्समें फैले इस बाज़ार का डिज़ाइन विलियम एमर्सन ने तैयार किया| १८६९ में यह लोगों के लिए खोला गया| इसका लम्बा चौड़ा इतिहास है| मुख्य बात यहाँ की यह है कि दुनिया की कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो यहाँ न मिलती हो|बाज़ार में दो खूबसूरत फव्वारे हैं जो आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना हैं| इसी के सामने १८९६ में बना गोथिक कला का मुम्बई पोलीस कमिश्नर ऑफ़िस है| फिर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुम्बई की बिल्डिंग है|

सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में भारतीय इतिहास, संस्कृति का संग्रहालय भी है जोइसके प्राँगण में है| इसे बॉम्बे लोकल हिस्ट्री सोसाइटी कहते हैं| यहाँ एस्ट्रॉनॉमी एसोसिएशन है जो संस्था के सदस्यों और विद्यार्थियों के लिए है| बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी शहीद भगतसिंह रोड पर एक ऐसा ग़ैर सरकारी संसथान है जो वन्यजीवों की रक्षा के लिए कार्य करता है| इसका हेडक्वार्टर हार्नबिल है| इसी की एक शाखा कनवरसेशन एजुकेशन सेंटर है जहाँ ऑडियो विज़ुअल शो होते हैं|

मिंट रोड पर मुल्लाजी जेठा फाउंडेशन है जो १८९२-९३ में बना |वैसे तो अब खंडहर ही शेष रह गये हैं इसके पर फिर भी देखने लायक हैं- ‘खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलंद थी|’

बलार्ड गेट म्यूज़ियम में मरीन यानी समुद्री सेना (नेव्ही) से सम्बन्धित तस्वीरें और एयरक्राफ्ट्स(हवाई जहाज) हैं| नेवी के अपने हेलिकॉप्टर्स और हवाई जहाज का बेहतरीन संग्रह है|इस म्यूज़ियम के सामने प्रथम विश्वयुद्ध शहीद स्मारक है| साथ ही एक ब्रिटानिया रेस्टॉरेंट है जो सिर्फ लंच के लिए खुलता है और करी पुलाव तथा पारसी व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध है|

ओल्डटाउन हॉल और सेंट्रल लाइब्रेरी १९३० में बनकर तैयार हुई थी|इस ग्रीस रोमन शैली की खूबसूरत इमारत में आठ डोरिक कॉलम्सहैं| पत्थरों से बनी कुल तीस सीढ़ियाँ हैं| सेंट्रल लाइब्रेरी में दाते डिवाइन कॉमेडी की दो मूल पांडुलिपियाँ हैं| पाँच बड़े-बड़े कंटेनर्स में मुम्बई के पास सोपर्ड में मिली बौद्धकालीन दुर्लभ वस्तुएँ संग्रहित हैं|

पुर्तगालियों के शासनकाल मेंबैरक के लिए बनाई गई विशाल इमारत जो पूरी तरहपत्थरों से बनी है| १६५६ मेंईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में यह आई|अबयह इमारत ओल्ड कस्टम हाउस के नाम से जानी जाती है| अब यहाँ कलेक्टर्स ऑफ़िस और लैंड रिकॉर्ड्स ऑफ़िस है| पत्थरों से बनी होने के कारण यह इमारत गर्मियों में भी ठंडक देती है|

कावसजी जहाँगीर हॉल को अब नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट कहते हैं|यहाँ अलग-अलग प्रकार की चित्र प्रदर्शनियाँ होती हैं और प्रदर्शनी के लिए एडमिशन फीस भी लगती है|

डेविडससून ने ‘नेस्ट एलियाहू सायनागौंग’ बनवाया| हालाँकि उस वक़्त तक यहाँ कम संख्या में ही ज्यू थे लेकिन किसी समय उनकी संख्या अधिक होने के कारण यह पूजा घर और मकबरे बनवाए गये|सरडेविड ससून ने बगदादी यहूदियों के लिए भायखला और चिंचपोकली के बीच रेल पटरियों से सटी कब्रगाह बनवाई हैं| कब्रिस्तान के बीच दो छोटी सफेद गुम्बदनुमा इमारतें हैं डेविड ससून और उनकी पत्नी लेड राशेल के मकबरे| उनके पुत्र सर अल्बर्ट ससून थोड़ी ही दूर एक अन्य कब्र में चिरनिद्रा में सोए हैं|

बगदादी शासकों के अत्याचारों से त्रस्त होकर इराक से भागे सर डेविड ससून को मुम्बई ने शरण दी थी| इसे वे भूले नहीं और मुम्बई में महज़ ३२ वर्ष के अपने प्रवासकाल में बैंकिंग से लेकर अफीम व कालीनों की तिजारत, तेल व कपड़ों की मिलें और दूसरे उद्योगों से देश विदेश में जो अकूत दौलत उन्होंने कमाई उसका एक बड़ा हिस्सा मुम्बई वासियों के कल्याण के  ख़र्च किया| फोर्ट, कोलाबा, भायखला और दूसरी जगहों पर उनके बनाए स्कूल, अस्पताल, प्रार्थनास्थल, अनाथालय, संग्रहालय, महल, उद्यान, लाइब्रेरी और गोदियों ने उनकी यशगाथा को अमर कर दिया| गेटवे ऑफ़ इंडिया, प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूज़ियम, डेविड ससून लाइब्रेरी, रानीबाग उद्यान, डॉ. भाउजी लॉड म्यूज़ियम, मसीना अस्पताल, उनकी ही भेंट है| इनमें से कुछ को अब रखरखाव की ज़रुरत है| वर्ल्ड मोन्यूमेंट्स फंड ने इसकी मरम्मत के लिए ६० लाख रुपए दान में दिए हैं बाकी ६० लाख यहूदियों ने तथा अन्य दानवीरों ने चंदा कर इकट्ठा किये हैं| मरम्मत के अभाव में हेरिटेज ग्रेट-२ केनेथ इलियाहू जैसे कुछ सिनेगॉग को शीघ्र ही सँवारना होगा|

उर्दू शायरों की पनाहगाह भिंडी बाज़ार

भिंडी बाज़ार मुम्बई का मुस्लिम बहुल आबादी वाला वो हिस्सा है जहाँ हर वक़्तजनसमूह उमड़ा नज़र आता है| भिंडी बाज़ार ने अपने नाम के लफ़्ज़ के सफ़र में तीन परतों को पार किया है| इस जगह में दरख़्त के नीचे आसपास के गाँवों के हाट लगा करते थे इसलिए इसका नाम भिंडी बाज़ार पड़ा| यहीं कहीं बर्तन भीबना करते थे| बर्तन को मराठी में भांडी कहते हैं एक वजह यह भी है| तीसरी वजह है कि फोर्ट में स्थित क्रेफ़र्ड मार्केट के पीछे बसा होने के कारण इसे बिहाइंड मार्केट कहते थे जो बाद में बिहाइंड का भिंडी हो गया है| वैसे अब यह क्षेत्र बहुत विस्तार ले चुका है| यहाँबंगाली मोहल्ला, सुरती मोहल्ला, छीपा(राजस्थान) मोहल्ला है|पहले यहाँ काबुली, पठान, बलूची, ईरानी, मकरानी और अरब समुदाय भी रहता था| अब धीरे-धीरे इनकी आबादी कम हो गई| जब मैं मुम्बई आई तो कुछ ख़ास इलाकों को देखने की चाहत लिए भिंडी बाज़ार भी आई….. बाज़ार ऐसा मिला जुलाकिमोहल्ले भी वहाँ, स्कूल भी वहाँ, मस्जिदभी वहाँ, नल बाज़ार, चोर बाज़ार….. उफ़ कितना सघन इलाका| फुटपाथों पर सजी सजाई हर वास्तु की दुकानें, जो चाहे ख़रीद लो|आज आपका कोई सामान चोरी हुआ है, कल वह चोर बाज़ार में बिकता नज़र आ जाएगा|दिन भर ठेला गाड़ियों में थोक का सामान भर कर मज़दूर यहाँ से वहाँ पहुँचाते हैं….. रात को फुटपाथ पर बिकते भोजन से पेट भर कर ठेला गाड़ी में ही सो जाते हैं| देश के कोने-कोने से आए हज़ारों मज़दूरों ने भिंडी बाज़ार में सूनी ज़िन्दग़ी गुज़ारकर मुम्बई को चौबीस घंटे रोशन किया है|

भिंडीबाज़ार में उर्दू के कई शायरों, लेखकों, संगीतकारों ने भी संघर्ष के दिनों में पनाह पाई है| उर्दू की क्लासिकल शायरी के दौर में भिंडी बाज़ार में मज़रूह सुल्तानपुरी, आरज़ू लखनवी, जोश मलीहावादी,सज्ज़ाद ज़हीर (जिन्हें बन्ने भैया के सम्बोधन से सब बुलाते थे), मुंशी प्रेमचन्द, मुल्कराज आनंद की कर्मभूमि मुम्बई ही थी हालाँकि प्रगतिशील लेखक संघ की नींव लंदन में मुल्कराज आनंद, सज्ज़ाद ज़हीर, मुंशी प्रेमचंद के प्रयासों से सन १९३२ में पड़ चुकी थी लेकिन मुम्बई जैसे इन भविष्य के नगीनों को पुकार रही थी|आरज़ू लखनवी, जोश साहब आदि जब मुम्बई आते थे भिंडी बाज़ार में हकीम मिर्ज़ा हैदर बैग के दवाखाने में ठहरते थे जो दवाखाना कम इन शायरों की पनाहगाह ज़रूर था| उसी ज़माने में जिगर मुरादाबादी के इसरार पे मजरूह सुल्तानपुरी जो हकीम थे लेकिन उसमें उनका मन नहीं लगता था, मुम्बई आ गये और भिंडी बाज़ार में साबूसिती कॉलेज के ग्राउंड में सारी रात चले मुशायरे में उन्होंने अपना कलाम पढ़ा-

मुझे सहल हो गई मंज़िलें कि हवा के रुख भी बदल गये

तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गये

उस वक़्त श्रोताओं में बैठे प्रोड्यूसर डायरेक्टर ए आर कारदार ने उन्हें अपनी फिल्म ‘शाहजहाँ’ में लिखने की दावत दी जो वे के एल सहगल को लेकर बना रहे थे| मजरूह सुल्तानपुरी का पहला गाना था- ग़म दिए मुस्तकिल/ कितना नाज़ुक है दिल/ ये न जाना/ हाय-हाय ये ज़ालिम ज़माना|

उसी दौर में कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, प्रेम धवन, शैलेंद्र, अली सरदार ज़ाफ़री आदि ने भी मुम्बई का रुख़ किया| और उनके संघर्ष के दिनों में भिंडी बाज़ार ने उन्हें सहारा दिया| उस वक़्त हुनरकी इतनी क़ीमत थी कि साधारण सा चाय वाला, पाव वाला उनके चाय, पानी का प्रबंध कर देता था| एक तरह का लेखन का जुनून सब अपने-अपने तरीक़े से आगे बढ़ा रहे थे| एडल्फ़ी हाउस में सआदत हसन मंटो रहते थे| उनके घर के पास वो बाग़ आज भी है जहाँ वे शाम को बैठा करते थे|वो सादवी होटल अभी भी है जहाँ वे चाय पीते थे|नज़दीक ही रेड लाइट एरिया है जहाँ मंटो की कहानियाँ खोल दो, ठंडा गोश्त, काली सलवार आदि के पात्र मानो जीते जागते उनकी कहानियों में चले आये थे| वह १९२० से २२ के बीच का ज़माना था|

आज से पाँच छै: साल पहले मराठी के मशहूर      शायर        नारायण सुर्वेजी से मुलाकात के दौरान मुझे पता चला कि कैफ़ी आज़मी वग़ैरह के साथ नारायण सुर्वे भी भिंडी बाज़ार में अपने पसंदीदा मुर्ग़ मुसल्लम, सींक कबाब खाने जाया करते थे|

बीसवीं सदी की शुरुआत में मुरादाबाद से नज़ीर ख़ान, छज्जूख़ान तथा उनके भाई मुम्बई आये और उन्होंने भिंडी बाज़ार में शास्त्रीय संगीत के घराने भिंडी बाज़ार घराने की नींव डाली जिसमें इंदौर से आए उस्ताद अमान अली ख़ान की बहुत बड़ी भूमिका है| उस्तादअमान अली ख़ान लता मंगेशकर के भी उस्ताद थे|लता मंगेशकर, मन्नाडे, महेंद्र कपूर, डॉ. सुहासिनी किरोड़कर और जाने माने संगीतकारों ने ‘भिंडी बाज़ार घराने’ की संगीत प्रणाली को अपनाया|भिंडी बाज़ार मोहम्मदअली रोड, जे.जे. अस्पताल, नागपाड़ा, क्रेफर्डमार्केट से लेकर इन सब जगहों को समेटता मदनपुरामें जाकर ख़त्म होता है|इन जगहों ने एक से एक चमकते सितारे मुम्बई की सरज़मीं को दिये| नागपाड़े में मशहूर फिल्म अभिनेत्री नादिरा रहती थीं जो यहूदी थीं| यहूदी मोहल्ले में उनका घर था| हालाँकि उनका परिवार तो इज़राइल चला गया पर वे अंत तक हिन्दी सिनेमा में अभिनय करती रहीं| क्रेफ़र्ड मार्केट में दिलीप कुमार की सूखे मेवे की दुकान थी| मेवे बेचते हुए ही वे अभिनय की दुनिया में आए और अभिनय के पुरोधा बन गये|क्रेफ़र्ड मार्केटसे मदनपुरा तक का इलाका म्युनिसिपल लिमिट का नाम नहीं है बल्कि साहित्यिक और संगीत की सोच और ज़ुबान का नाम है जो भिंडी बाज़ार कहलाता है|

उसी दौर में भिंडी बाज़ार में पूर्वी उत्तरप्रदेश से अलाउद्दीन साबिर आये जो पूर्वी भाषा में गज़लें लिखते थे| वे वहाँ चबूतरे पर बैठ कर पतँग का माँझा बनाकर पेट पालते थे| रात को शराब का पौआ चढ़ाकर शायरी करते थे| एक दिन शकील बदायूंनी वहाँ से शाम के समय गुज़र रहे थे| तब वे गंगा जमुना फिल्म बना रहे थे|साबिर साहब का गीत सुनकर रुके| वो उनका रुकना मानो साबिर साहब के अच्छे दिनों के शुरू होने की वजह बन गए|साबिर साहब ने गंगा जमुना का सुपरहिट गीत लिखा नैन लड़ जई हैं तो मनवा माकसक हुइबे करी|१९४७ के आसपास मोहम्मद रफ़ी भी किस्मत आजमाने मुम्बई आये और भिंडी बाज़ार के वज़ीर होटल के कोठरीनुमा कमरे में एक के बाद एक हिटगीत गाने लगे|उस समय हिन्दुस्तान पकिस्तान विभाजन का माहौल था| हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को देखते ही मार डालते थे| ऐसे कठिन वक़्त में महेन्द्र कपूर मोहम्मद रफ़ी से मिलने भिंडी बाज़ार आये और वज़ीर होटल में उनसे मिले|वज़ीर होटल के पास ही हाजी होटल है जहाँ का मुर्ग मुसल्लम बहुत प्रसिद्ध है|इस होटलमें अपने संघर्ष के दिनों में कमाल अमरोही और उनके दोस्त आगा जानी कश्मीरी आया करते थे| एक दिन दोनों ने जमकर खाया, बिल बना १२ रुपिए| जेब में फूटी कौड़ीनहीं| आगा साहब ने काउंटर पे जाकर कहा- “ज़रा, आठ रुपिए तो दीजिए| अबटोटल मेरे ऊपर आपकी उधारी रही बीस रुपिए|”

होटल वाले ने हाथ जोड़े- “कोई बात नहीं|” क्या ज़माना था| हुनर की ऐसी इज्ज़त| बड़े-बड़े फिल्मकारों, गायकों, साहित्यकारों को आगे बढ़ाने में इन होटलों की कितनी अहम भूमिका है| बड़ा रोमांचक दौर था वो|

भिंडी बाज़ार केवल एक बाज़ार ही नहीं बल्कि मुम्बई की मिली जुली संस्कृति यानी गंगा जमुनी संस्कृति का रोशन सितारा भी है| इस परम्परा को आगे बढ़ा रहा है उर्दू मरक़ज़ जो समय समय पर मुशायरे, सूफ़ी संगीत, नाटक और तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों को भिंडी बाज़ार में आयोजित करता है|

वर्ष २०१४ में उर्दू मरक़ज़ ने वी टी स्थित अंजुमन इस्लाम के साथ मिलकर एक सेमिनार आयोजित किया था| अंजुमन इस्लाम की करीमी लाइब्रेरी में हनुमान चालीसा, रामायण, महाभारत, गीता, वेद, उपनिषद और कुरान की पांडुलिपियाँ हैं जिनके पीले पड़ चुके जर्जर पन्नों की बाउंडिंग कराके दुनिया को परिचित कराया| देखने वाली बात ये थी कि इन सबका अनुवादउर्दू में हुआ था और कुरान का हिंदी में| मैंने इस सेमिनार में शामिल होकर बड़े से प्रोजेक्टर पर इन सभी ग्रंथों के उर्दू अनुवाद देखे और विभिन्न समाचार चैनलों द्वारा पूरी दुनिया ने|

मुम्बई जहाँ मैं रहती हूँ और जहाँ मैंने अपनी उम्र के खूबसूरत लम्हों को जिया है| मुम्बई मेरे दिल की किताब में उस फूल की तरह दबी है जिसे हम अपनी कच्ची उम्र की भावुकता में किताब में या डायरी में रख देते थे लेकिन वो डायरी, वो किताब और उसमें दबा वो फूल जो अपने उसी आकार में दबकर सूख जाता है ज़िन्दग़ी भर हमें सहलाता, पुचकारता है….. फ़ैज़ ने लिखा है जो मैं मुम्बई के लिए सोचा करती हूँ- तुझपे मुश्तरका हैं अहसान ग़मे उल्फ़त के/ इतने अहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ|

वी.टी. यानी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस…..

सवा सौ बरसों से भी अधिक पुरानी विश्व की सबसे खूबसूरत रेलवे स्टेशन कहलाने वाली इमारत अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस कहलाती है|शॉर्ट में सीएसटी….. यह भारत का पहला रेलवे स्टेशन और एशिया की पहली ट्रेन के चलने का गौरव भी प्राप्त कर चुका है| दूर से भव्यता का एहसास कराती और नज़दीक से अपनी खूबसूरती से आकर्षित करती इस इमारत का स्थापत्य विक्टोरियन नियो, गोथिक शैली का है| इसके ३३०फीट ऊँचे बुर्ज, कंगूरेदार खंभे, नुकीली मेहराब व मीनारें, घेरेदार सीढ़ियाँ, अर्धवृत्ताकार तोरण, कलश, गोलगुंबद, पच्चीकारी कला की फूल पत्तियाँ सहज आकर्षित करती हैं|लगता है जैसे रेलवे स्टेशन नहीं किसी शहंशाह का बेशकीमती महल हो |सवा सौ साल के इतिहास को समेटे यह इमारत मानो कुछ कहती नज़र आती है कि ‘देखो, मेरे सुंदर गुम्बदों पर मौजूद एग्रीकल्चर, शिपिंग एंड कॉमर्स, इंजीनियरिंग एंड साइंस जैसी प्रतिमाएँ…..’ बीच वाले सबसे ऊँचे गुंबद पर यह जो एक हाथ में मशाल और दूसरे में पहिया थामे १४ फुट ऊँची प्रतिमा है वह प्रोग्रेस है यानी पहिया जो गति का प्रतीक है और मशाल पथ प्रदर्शन का| येदोनों ही अर्थ रेलवे को चरितार्थ करते हैं| यहाँ ६० वर्ष पहले महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा भी हुआ करती थी लेकिन उसे उपनिवेशवाद का प्रतीक मानकर हटा दिया गया| और भी प्रतीकात्मक चिह्न उत्कीर्ण हैं यहाँ| जैसे सिंह….. अंग्रेज़ों के शासन का और चीता भारत का | साउथ विंग में पोस्टऑफ़िस का लोगो और शेरों की मूर्तियाँ हैं | इमारत की भीतरी और बाहरी सजावट जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स के लॉकवुड किपलिंग और उनके विद्यार्थियों की देन है|

विक्टोरिया टर्मिनस नाम के पहले इसे ‘बॉम्बे पैसेंजर’ कहते थे|तब यह उत्तर की ओर थोड़ा हटकर हुआ करता था| आज हर मिनट पर यहाँ से तकरीबन बीस लाख पैसेंजर उपनगरों की यात्रा करते हैं| यह तो लोकल का गणित है| मुम्बई से अन्य शहरों की ओर जाने वाली गाड़ियाँ १८ प्लेटफार्मों से जाती हैं| यह महानगर का सबसे बड़ा सबवे स्टेशन है|

एक ज़माना था जब सी एस टी में कोई प्लेटफार्म नहीं था| लकड़ी से बने झोपड़ीनुमा दफ़्तर के नज़दीक समँदर हहराता था|नावों से, ट्रामों से और घोड़ा गाड़ी से उतरने वाले समृद्ध यात्रियों को यहाँ से ट्रेन पकड़ने में शर्म महसूस होती थी तो वे भायखला से ट्रेन पकड़ते थे|भायखला स्टेशन का इतिहास भी रोमांचक है| १६ अप्रैल १८५३ को वी.टी. से चली एशिया की पहली ट्रेन ‘आग गाड़ी’ कहलाती थी|उसे ठाणे तक की क़रीब ३२ कि.मी. की दूरी नापने में क़रीब ५७ मिनट लगे थे|वह दिन मानो शाही दिन था| दोपहर ३.३० बजे सेंट जॉर्ज स्थित तोपखाने से २१ तोपों ने शाही सलामी दी|गवर्नर के बैंड ने इंग्लैंड की राष्ट्रीय धुन जैसे ही बजानी शुरू की उपस्थित जन समुदाय रोमांचित हो उठा|फूल, माला से सजे धजे डिब्बों को भाप के तीन चमचमाते इंजिन सुल्तान,साहिब और सिंध ने खींचा|वी.टी. से ठाणे रेलवे स्टेशन तक भारत ही नहीं एशिया की यह पहली ट्रेन थी|जब यह ठाणे पहुँची तो वहाँ दरबार शामियाने में ४०० लोगों के लिए दावत का इंतज़ाम था| वी.टी. से ठाणे के बीच सिर्फ भायखला में स्टॉप था|सामान्य यात्रियों के लिए आग गाड़ी को हरी झंडीमिली१८ अप्रैल १८५३ से| चारडिब्बों की इस गाड़ी में तृतीय श्रेणी का किराया ५ आने, द्वितीय श्रेणी का एक रूपया और प्रथम श्रेणी का दो रुपिया था| तृतीय श्रेणी के डिब्बों में न तो सीट होती थी न छत, उसे बकरा गाड़ी कहते थे|

बॉम्बे बैकवे की पहली उपनगरीय ट्रेन…..

गुज़रे ज़माने में कोलाबा पश्चिम रेलवे का टर्मिनस हुआ करता था| बॉम्बे बैकवे की पहली उपनगरीय ट्रेन ग्रांट रोड और बसीन रोड के बीच १ नवंबर १८६५ में चली| उपनगरीय इलाक़े जहाँ समुद्री खाड़ियाँ थीं, खाड़ियों को पाटकर समतल कर रेलवे ट्रेक बनायेगये| ३०जून १८७३ में बम्बई सरकार ने जब चर्चगेट और कोलाबा के पास पैसेंज रस्टेशन की डिज़ाइन को मंजूरी दी तो ससून डॉक के निकट समुद्र पाट कर कोलाबा स्टेशन खोला गया| कोलाबा से ही सबसे अधिक मछली की टोकरियाँ ट्रेनों में लादकर बाज़ार भेजी जाती थीं|३१ दिसंबर १९३० के दिन कोलाबा से आख़िरी ट्रेन चली और कोलाबा स्टेशन बंद कर दिया  गया|

मुम्बई के बाँद्रा उपनगर का रेलवे स्टेशन एकमात्र ऐसा स्टेशन है जिसका ढाँचा लंदन में बना और जहाज से लाकर १८६९ में यहाँ स्थापित किया गया| उस ज़माने की इसकी लोकप्रियता आजका यह आधुनिक ज़माना आज की लोकप्रियता सहित यहाँ दिनब दिन आने वाले पर्यटकों के द्वारा कहता नज़र आता है| पटरियों में कामआनेवाले लोहे के पुराने खंभों परटिकी मेहराबों में १८८८ का वर्ष झाँकता नज़र आता है| तब बांद्रा को उपनगरों की रानी की उपमा से नवाज़ा गया था| बांद्रा में ईसाई धर्मावलम्बियों का निवास ज़्यादा था| अंग्रेज़ों ने बांद्रा स्टेशन को बेहतरीन बनाने, सजाने सँवारने और अधिक सुविधाएँप्रदान करने की ओर विशेषपहल की|पहली तेज़गति की लोकल और पहला महिला प्रतीक्षालय भी यहीं बना|स्टेशन की साफ़ सफाई इतनी कि ‘नो स्मोकिंग’ की चेतावनी केबावजूद सिगरेट पीते पकड़े गये तो २० रु. जुर्माना| स्टेशन के बाहर पोर्च पर विक्टोरिया गाड़ियाँ खड़ी या चलती नज़र आती थीं|मुख्य द्वार के पोर्टिको के ऊपर वॉच टॉवर था| जैसे ही अँग्रेज़ साहबों की कोई ट्रेन आती थी, पोर्टर उस पर लगी बेल को बजाते और बाहर इंतज़ार करते कर्मचारी भागे आते| पिरामिड के आकार जैसी दिखती इसकी छतें, चौड़े लम्बे बरामदे, टाइलदार रूफ़ टॉवर वाला बांद्रा स्टेशन आज भी शहर के सबसे खूबसूरत साफ़ सुथरे स्टेशनों में से एक है| गोथिकऔर कालोनियल वर्नाकुलम इसकी सबसे बड़ी खूबी है जो इसे विशेष बनाती है शायद इसीलिए यह भारत की सोलह धरोहर इमारतों में से एक है|

पश्चिमरेलवे का टर्मिनस है मुम्बई सेंट्रल| यह १८ दिसंबर १९३० को मुम्बई के गवर्नर फेड्रिक साइक्स के हाथों लोकार्पित हुआ था|उस समय यह भारत का सबसे बड़ा स्टेशन था| बोलासिस रोड जो अब जहाँगीर बोमानी मार्ग कहलाती है पर बने इस विशाल टर्मिनस का डिज़ाइन क्लाउड बेटली ने तैयार किया था|यह तीन मंज़िली इमारत बगीचे के परिदृश्य में मुख्य सड़क से दूर है और इसका प्रवेश द्वार स्टेशन की ओर से आने वाली एक वीथिका के सिरे पर बनाया गया है जिसके दोनों तरफ़ बगीचा है|पार्श्व खंडों से बनी चतुष्कोणी इमारत रेल वास्तुकला का अप्रतिम नमूना है| पोर्टिको का डिज़ाइन परंपरागत है जबकि नींव मुग़लकालीन तर्ज़ पर रखी गई है|मुम्बई सेंट्रल की इमारत बेलासिस पुल के उत्तर की तरफ़ स्थित थी और लेमिंग्टन रोड की तरफ़ से इसका मुख्य प्रवेश मार्ग था| फिर लम्बा चौड़ा रास्ता केवल पदयात्रियों के लिए जिसके एक तरफ़ प्लेटफॉर्म और दूसरी तरफ़ प्रथम व द्वितीय श्रेणी यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय, भोजनालय और अल्पाहार कक्ष है| यही सारी सुविधाएँ अन्य मंज़िलों पर भी हैं| इस भव्य स्टेशन की नींव के पत्थरों के नीचे राई अथवा कुंजनुमा स्थान में एक पीतल का सिलिंडर रखा गया था जिसमें इस कार्य से सम्बन्धित अधिकारियों के नाम तथा एक रूपया, अठन्नी, चवन्नी, दुअन्नीऔर इकन्नी तथा एक पैसे के नये सिक्के रखे गये| इमारत के निर्माण कार्य में १५.६ मिलियन रुपयों का ख़र्च आया| स्टेशनपरिसर में आज भी पूर्व की तरफ बगीचे में ‘लिटिल रेड हॉर्स’ नामक पुराने इंजन को देखा जा सकता है|

१९वीं सदी की शुरुआत तक मुम्बई में यात्रा के मुख्य साधन थे- रेकला यानी बैलगाड़ी, शिकरम्, इक्का यानी घोड़ागाड़ी और पालकी| कोलाबा, अपोलो बंदर, बी एम सी, पोर्चुगीज़ चर्च (पुर्तगाली चर्च) और लालबाग सहित२५ स्थानों पर इन गाड़ियों के स्टैंड थे| बैलगाड़ियों में तो सामान ढोया जाता था| एक किलोमीटर की बैलगाड़ी से यात्रा करनी हो तो तीन आने किराया लगता था|घोड़ागाड़ी का चार आने लगता ‘बॉम्बे कुरियर’ ने फोर्ट से सायन तक हॉर्स कोच सर्विस चलाने की घोषणा की| विक्टोरिया का ज़माना आया १८९२ में|

कोलाबा से परेल के बीच ९ मई १८७४ को पहली ट्रॉम चली जिसे छहसे आठ घोड़े खींच रहे थे| बहुत आश्चर्यजनक लगता है ट्राम में घोड़े जुते होना| हॉर्सट्रॉम सेवा १ अगस्त १९०५ को समाप्त कर दी गई और ट्रॉम बिजली से चलने लगी|७ मई १९०७ को शाम साढ़े पाँच बजे सजी धजी पहली विद्युत ट्रॉम म्युनिसिपल ऑफ़िस से निकली और क्रॉफ़र्ड मार्केट तक चली| गति, आराम और किफ़ायती किराए के रूप में मुम्बई वासियों को मिली ट्रॉम| उनकी पहली सुखद यात्रा|फिर १९२० में डबल डेकर ट्रॉम चली जो बेहद लोकप्रिय हुई| १९६४मुम्बईमें ट्रॉम का आख़िरी साल था जब ३१ मार्च को ट्रॉम बोरीबंदर से दादर की अपनी अंतिम यात्रा पर रवाना हुई और मुम्बई के आम आदमी ने सड़कों पर क़तार लगाकर उसे अंतिम विदाई दी| १९११ में मुम्बई में मोटर टैक्सियाँ चलनी आरंभ हुईं|

१५जुलाई १९२६ को चली पहली ओमनी बस ने मुम्बई के ट्रांसपोर्ट को नए युग में पहुँचा दिया| बॉम्बे ट्रॉमवेकम्पनी ने अफगान चर्च से क्रॉफ़र्ड मार्केट तक इस सेवा की शुरुआत चार बसों के बेड़े से की| ट्रॉली बस सेवा, ओमनी सिंगल बस, डबल डेकर, लिमिटेडसर्विस, पॉइंटटु पॉइंट सर्विस, मिनी बस, लेडीज़स्पेशल, ओपन रूफ़ टूरिस्ट बस, एयर कंडीशंड सर्विस आदि बेस्ट की ऐसी सेवाएँ हैं जिन्होंने मुम्बई को गति दी और अलसाया शहर दौड़ के लिए तैयार होने लगा| बेस्ट की ऑल स्टैंडी बस, आर्टिकुलेटेड बस और कोच सर्विस ने अधिक से अधिक यात्रियों को मंज़िल तक पहुँचाने का ज़िम्मा लिया|‘आर्टिकुलेटेडबस’ में इंजन बस से अलग होता था| १९६७  में ऐसी बस चलाने वाली बेस्ट देश की पहली परिवहन संस्था थी|

बेस्टका एक ट्रांसपोर्ट विंग भी है| सन् १९८१ से यह मार्वे से मनोरी के बीच एक फेरीबस सर्विस चला रही है| कभी कोंकण का और गोवा तक का समुद्री सफ़र बड़ी-बड़ी मोटर बोट्स से कराने वाला मझगाँव स्थित भाऊचा धक्का आज अपने सुनहले अतीत को बयाँ करता नज़र आता है| १९८०से इसे न्यू फेरी व्हार्फ केरूप में जाना जाता है| मछलियों के कारोबार के साथ छोटी बोट्स से मोरा और रेवस जैसी जगहों पर जाने के लिए यह आज भी लोकप्रिय है| गेटवे ऑफ़ इंडिया से एलिफेंटा की समुद्री सैर कराने के लिए आज भीमशहूर है यह|

आज मुम्बई मेट्रो युग में प्रवेश कर चुकी है| शानदार रेलवे स्टेशनों पर दौड़ती मेट्रो ने मुम्बईवासियों को पँख दे दिए हैं| अब जब रेलवे के शुरूआती दौर को देखती हूँ यानी अतीत में झाँकती हूँ तो लगता है यहाँ सदी ने करवट बदली है|उस वक्त बग़ैर बैलों या घोड़ों के भाप इंजनों द्वारा लम्बी-लम्बी गाड़ियों को खींचा जाता था तो मुम्बईवासियों को लगता था कि गोरे साहब ने किसी जिन्न को वश में कर लिया है| भाप के इस अग्निवाहन को चलता देख वे उसे प्रणाम करते थे, इंजन की धुआँ उगलती चिमनी पर लाल तिलक लगाते थे और पायदान प रप्रसाद व पैसे चढ़ाकर पटरियों की पूजा करते थे| मुम्बई में पहली ट्रेन के आगमन पर बहुत समय तक लोगों में यह डर फैला रहा कि ‘गाय भैंसें’ दूध देना बंद कर देंगी, बाज़ार नष्ट हो जाएँगे,कारोबार चौपट हो जाएगा| महामारियों का प्रकोप बढ़ जाएगा|

मुम्बई की शाही घोड़ागाड़ी-विक्टोरिया…..

जब मेट्रो चलने लगी है तो विक्टोरिया अलविदा कह रही है| इस शाही  घोड़ा गाड़ी का सफ़र अब ख़तम होने जा रहा है| पेटा और एनिमल एंड बर्ड चेरिटेबल ट्रस्ट  बहुत तनाव में था कि इस पर बैन लगाया जाए क्योंकि यह घोड़ों के हित में नहीं है| उसने मुम्बई हाईकोर्ट में इस पर रोक लगाने की अपील की थी | हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली और ढलते सूरज के सुरमई अँधेरे ने जुहू सागर तट पर तिलिस्म सा रचती विक्टोरिया का रोमेंटिक सफ़र ख़तम हुआ| पर्यटक इस पर मरीन ड्राइव, नरीमन पॉइंट, गेटवे ऑफ़ इंडिया और दादा भाई नौरोजी रोड पर घूमकर शाही मज़ा लेते थे| पर अब…..?? विक्टोरिया घोड़ा गाड़ी का इतिहास बड़ा रोचक है| इसे आम तौर पर अँग्रेज़ों की सवारी माना जाता है| लेकिन सच तो ये है कि मूलतः यह एक फ्रेंचगाड़ी है| जिसे कोलकाता में अंग्रेज़ों के समय चलने वाली फिटन गाड़ी के आधार पर बनाया गया था| १८६९में प्रिंस ऑफ़ वेल्स ने १८४४ वाले मॉडल की एक बग्घी आयात की थी|उस वक्त यह धनाढ्य वर्ग में खूब पसंद की जाती थी| इसका आकार नीचाई की ओर था और सामने की ओर यह दो सीटों वाली होती थी| चालक की सीट लोहे के फ्रेम पर टिकी कुछ ऊँची हुआ करती थी| आम तौर पर इसे एक या दो घोड़े खींचते थे|शुरुआत में धनी परिवारों की महिलाएँ इन पर पार्कों में, बाग बगीचों में घूमती थीं| मुम्बई में १८८० में विक्टोरिया का आगमन हुआ| तब गाड़ियाँ बहुत कम थीं और सड़कों पर घोड़ा गाड़ियाँ आराम से दौड़ती थीं| देखते-देखते विक्टोरिया दक्षिण मुम्बई की शान बन गई|उस समय इसके बाक़ायदा स्टैंड बने होते थेजहाँ लाइन से सारी विक्टोरिया अपनी सवारी का इंतज़ार करती थीं| जैसे-जैसे मोटर गाड़ियाँ बढ़ीं, विक्टोरिया का चलन कम होने लगा|फिर भी यह पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रही….. क्या कहने इसकी शान बान के| चार पहिए….. आगे के पहिए छोटे….. कोचवान की सीट सवारी सीट से ऊँची|कोचवान हमेशा ख़ाकी वर्दी में होता था| फिल्मों में भी विक्टोरिया खूब चली| अशोक कुमार की विक्टोरिया नं २०३ गुज़रे ज़माने की यादों में दर्ज़ है| अब यह म्यूज़ियम तक ही सीमित रहेगी| ‘तांगे वाला’ ‘मर्द’ जैसी कई फ़िल्मों में विक्टोरिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है| और इस पर सवारी करते हीरो हीरोइन के द्वारा गाये गीत आज भी सदाबहार गीतों में शामिल हैं|माँग के साथ तुम्हारा, ये क्या कर डाला तूने आदि नग़मे भुलाए नहीं भूलते| इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की शान में उनके नाम से ही चर्चित विक्टोरिया सचमुच शाही बग्घी ही है| कभी आवागमन का मुख्य साधन रही यह बग्घी तीस वर्षों में दरअसल पूरी तरह तफ़रीह और मनोरंजन का साधन बनकर रह गई| पर्यटकों को जिस पर सवारी करते हुए समुद्री तटों से सूर्यास्त और सूर्योदय देखना बहुत पसंद है| ऐतिहासिक इमारतों के चक्कर पर यह बग्घी उन्हें बखूबी लगवा देती है| लेकिन जब से हाईकोर्ट का निर्णय आया है इनकी तादाद कम हो गई है| कभी मरीन ड्राइव, चौपाटी और गेटवे ऑफ़ इंडिया पर लाइन से सजी धजी खड़ी ये शाही बग्घी अब ढूँढनी पड़ती है|किसी ज़माने में जहाँ दो हज़ार विक्टोरिया थीं वहीं १९७३ में नए विक्टोरिया के लिए लाइसेंस बंद किये जाते समय इनकी संख्या ८०० ही रह गई और अब तो बस १३० ही बची हैं| इतना होने के बावजूद न तो विक्टोरिया के मालिकों ने, न चालकों ने ही उम्मीद छोड़ी है और न शौकीन शहसवारों, पर्यटकों ने|

मुम्बई की आर्थिक प्रगति का सूत्रधार पारसी समुदाय…..

जिस समय अंग्रेज़ों ने मुम्बई में पदार्पण किया था घाटियों के बाहुल्य के साथ ही धनी घरानों की तादाद भी यहाँ बढ़ने लगी थी| पर्शिया से पारसी भी आकर मुम्बई में बसने लगे| वे जोरोस्ट्रियन यानी जरथ्रुस्ट धर्म के थे और पवित्र अग्नि ईरान शाह के उपासक| वैसे दीव में बसे पारसियों को अंग्रेज़ों ने मुम्बई में ‘टॉवर ऑफ़ साइलेन्स’ बनाने के लिए आमंत्रित किया |मुम्बई आने वाला पहला पारसी युवक दोराबजी नानभॉय था जो १६४० में यहाँ आया था| १७३५ में लाड जी नौ शेरवान जी वाडिया को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मुम्बई में शिपयार्ड बनाने के लिये जगह दी| फिर तो ब्रिटिश नेवी ने वाडिया से फौड्रोयांट(१८१७ में बना विश्व का एकमात्र पोत जो अभी तक कार्यशील है) जैसे पोत बनवाए| यहीं बने पोत ‘मिंडन’ पर फ्रांसिस स्कॉट ने अमेरिकी राष्ट्रगान लिखा| आज छत्रपति शिवाजी टर्मिनस और चर्चगेट सहित मुम्बई की तकरीबन हर धरोहर इमारत पर पारसी आर्किटेक्ट्स की छाप है| शहर के बहुत से कॉजवे, सड़कें और इमारतें जीजीभॉय और रेडीमनी परिवारों के दान से बनी हैं| आधुनिक मुम्बई के मुख्य निर्माता कावसजी जहाँगीर पारसी हैं और आर्किटेक्ट्स में सबसे मशहूर नाम हफ़ीज़ भी पारसी हैं|

पारसी समुदाय मुम्बई की आर्थिक प्रगति का सूत्रधार रहा है| वैसेपूरे देश में पहली कपड़ा मिल की स्थापना दिनशा मानेक जी पेटिट ने की| टाटा घराना, जमशेदजी जीजीभॉय घराना, ससून घराना, पेटिटघराना, गोदरेज घराना, वाडिया घराना| और भी अन्य घरानों ने समाज सेवा के कार्य और सरोकारों के लिये थैलियाँ ख़ाली करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| मुम्बई में समृद्ध समाज की स्थापना करने में सबसे आगे हैं| ‘पारसी डेरी’ मुम्बई का सबसे पुराना अखबार ‘बॉम्बे समाचार’ पारसियों की ही देन है|

साफ सुथरी चौड़ी सड़कों और हरे भरे रमणीक बगीचों केलिए दादर की पारसी कॉलोनी मशहूरहै|जिसकी संकल्पना ९२ साल पहले युवा इंजीनियर मंचेरजी जोशी ने की थी| तय हुआ था कि कॉलोनी की कोई सीलिंग नहीं होगी और इमारतें दो मंज़िल से ज़्यादा नहीं होंगी| नौरोज बाग़ और खुसरो बाग भी दर्शनीय हैं|मुम्बई में पारसियों की देन है मशहूर तफरीहगाह नरीमन पॉइंट जो खुर्शीद फ्रामजी नरीमन के नाम पर है और टाटा कैंसर हॉस्पिटल जो जमशेदजी टाटा के नाम पर है|यहाँ की ‘बॉम्बे पारसी पंचायत’ कई तरह की वेलफयेर स्कीम चलाती है जिसमें ग़रीबों का इलाज़, शिक्षा, विवाह आदि के लिए अनुदान दिया जाता है|

इस वक़्त मुम्बई में पारसियों की संख्या ४० हज़ार से ज़्यादा है| मलाबार हिल पर पारसी समाज के पास ५४ एकड़ ज़मीन है जिस पर उनका मुख्य मंदिर अग्नि मंदिर बना है| वहीं पर उनकी तीन ऊँची ऊँची दख़्म यानी शोक मीनारें बनी हैं जहाँ पर अन्तिम संस्कार किया जाता है| जिसे दोखमेनाशिनी कहा जाता है जहाँ गिद्ध, चील, कौवे मृत शरीर का भक्षण करते हैं|

मुम्बई में आरंभ में पारसियों की पहचान बेकरी और थियेटर से हुई| पारसी अपने साथ अद्भुत पाक शैली लेकर आये जिसमें यहाँ की पाकशैली का समावेश कर पारसी डिशेज़ तैयार कीं| इनका मशहूर व्यंजन धानशाक(धनशक) है जो बहुत सारे अनाज और सब्ज़ियों से तैयार होता है| गुजराती प्रभाव के कारण पारसी महिलाओं ने सीधे पल्ले की साड़ी अपनाई और अपनी भाषा में गुजराती भाषा को स्वीकार किया|

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा को बनाने और उसे जर्मनी में फहराने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी मादाम भीकाजी कामा को है जो मुम्बई के पारसी सोराबजी फ्राम जी की बेटी थीं| १८ अगस्त १९०७ में जर्मनी के स्टुटगर्ट में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनमें सभी देशों के झंडे फहराते देख मादाम भीकाजी कामा ने तीन रंगों का तिरंगा बनाकर फहराया| इसमें हरे रंग की पट्टी में आठ कमल भारत के तत्कालीन आठ राज्यों के प्रतीक थे, नारंगी पट्टी पर देवनागरी में वन्दे मातरम लिखा था और सफ़ेद पट्टी पर सूर्य और अर्धचन्द्र बना था|

युद्ध स्मारक….. वीर सैनिकों को श्रृद्धांजलि…..

प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए भारतीय वीर सैनिकों को श्रृद्धांजलि देते हुए उनकी याद में तीन स्मारक बनाए गये| पी डिमेलो रोड ठाना स्ट्रीट स्थित इंडियन सेलर्स होम स्थित बॉम्बे मेमोरियल (१९१४-१९१८) जो २२०७ भारतीय अदनी और पूर्वी अफ़्रीकी मरींस शहीदों के नाम समर्पित है| स्मारक के हॉल में आठ पैनलों में इन शहीदों के नाम दर्ज़ हैं| गेटवे ऑफ़ इंडिया जा रही इसी सड़क पर शूरजी वल्लभदास मार्ग,स्प्रोटरोड और नरोत्तम मोरारजी मार्ग के जंक्शन पर न्यू कस्टम हाउस के सामने कांसे से बना सुनहले किनारे वाला एक और युद्ध स्मारक है जो बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट के इन शहीदों को श्रृद्धांजलि स्वरुप है| इसकेफलक पर युद्ध का विस्तार और ८७ हज़ार सैनिकों का बंदरगाह से रवाना होने का वर्णनलिखा है| प्रख्यात सेंट थॉमस कैथेड्रल के एक मेमोरियल(स्मारक) पर भी युद्ध में शहीद रॉयल इंडियन मरींस के ऑफ़ीसर व अन्य वारंट ऑफ़ीसर के नाम दर्ज़ हैं| ढाई सौ साल पुराना देश का सबसे पुराना कमान हॉस्पिटल नौसेना का ‘आई एन एस अश्विनी’ मुम्बई में इन शहादतों की बोलती मिसाल है|

छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के कॉर्नर पर व्ही शेप में गोथिक कला की म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बिल्डिंग है जिसकी नींव १८८४ में लॉर्ड रिपन ने रखी थी| यह १८७३ में बनकर तैयार हुई| इसकी ऊँचाई २३५ फीट है|

लंदन के स्थापत्य का आभास कराता चर्चगेट

मुम्बईका दूसरा बड़ा स्टेशन है चर्चगेट जो पश्चिम रेलवे टर्मिनस है| इसकी इमारत भी अँग्रेज़ी स्थापत्य की है|बल्कि चर्चगेट से मंत्रालय, नरीमनपॉइन्ट, युनिवर्सिटी रोड में जितने भी स्थापत्य हैं, उन्हें देखकर लगता है जैसे हम लंदन आ गये हों| चर्चगेट से मंत्रालय तक की खूबसूरत सड़क पर किनारे लगे वृक्षों से मौसम के फूल झरा करते हैं और सड़क पर गुलमोहर, अमलतास के फूलों का कालीन सा बिछा रहता है|वही सड़क जब बायें मुड़ती है तो आता है आकाशवाणी केन्द्र जहाँ १७ वर्ष की आयु से अब तक मेरी कहानियाँ, परिचर्चाएँ, नाटक आदि प्रसारित होते रहते हैं| शुरू के दिनों में हेमाँगिनी रानाडे‘नारीजगत’ कार्यक्रम की प्रमुख थीं| तब आज की तरह प्रोग्राम रिकॉर्ड नहीं किये जाते थे बल्कि लाइव होते थे| प्रोग्राम के दिन साँताक्रुज से चर्चगेट तक सुबह ग्यारह बजे की ख़चाखच भरी लोकल ट्रेन से आने में अक्सर लेट हो जाती थी| कार्यक्रम की समाप्ति पर हेमाँगिनी जी की प्यार भरी डाँट, पीठ पर एक दो मुक्के और फिर चाय….. उनके रिटायरमेंट के बाद न वैसी आत्मीयता मिली न माहौल…..

चर्चगेट की शानदार इमारत, खूबसूरत बुर्जियाँ गोथिक शैली की हैं| चर्चगेट से मंत्रालय, नरीमन पॉइंट, युनिवर्सिटी रोड की तमाम इमारतोंपर अँग्रेज़ी स्थापत्य की मोहर लगी है|वानखेड़े स्टेडियम जहाँ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच होते हैं विशाल दीर्घा वाला है| चर्चगेट स्टेशन के दाहिने तरफ़ के गेट सेबाहर निकलने पर छोटे-छोटे कई रास्ते समंदर से लगी मुख्य सड़क पर जाकर खुलते हैं| इन रास्तों को नंबर से पहचाना जाता है| पहली गली, दूसरी गली…..| यहीं सिंड्रहम कॉलेज है, पोस्ट ऑफ़िस है, इंडियन मर्चेंट चैंबर है जहाँ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक कला एवं बिज़नेस गोष्ठियाँ होती हैं बल्कि बिज़नेस मीटिंगका तो यह केन्द्र ही है|यूनिवर्सिटी क्लब भी यहीं है| इन सारी जगहों पर साहित्यिक आयोजन होते हैं| मेरे पहले कथा संग्रह ‘बहकेबसंत तुम’ पर मुझे महाराष्ट्र साहित्य अक़ादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार सिंघम कॉलेज में ही मिला था| इंडियन मर्चेंट चैम्बर और यूनिवर्सिटी क्लब में हमने हेमंत फाउंडेशन के पुरस्कार समारोह भी आयोजित किये हैं| वहीं यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस भी है जहाँ समारोह में बाहर से आये साहित्यकारों की हम ठहरने की व्यवस्था भी करते थे| इंडियन मर्चेंट चैम्बर में मुझे भव्य समारोह में ‘प्रियदर्शिनी साहित्य अकादमी’ पुरस्कार महाराष्ट्र के वित्त मंत्री जयंत पाटिल के हाथों प्रदान किया गया था|

समँदर की ओर खुलने वाली गलियों में एक आवास इस्मत चुग़ताई का था| इस्मत आपा का घर लेखकों का अड्डा था जहाँ वे अपने शानदार सफेद बालों वाले भव्य व्यक्तित्व के कारण आपा नाम से पुकारी जाती थीं| उन दिनों मुम्बईकी हवाओं में कला और साहित्य का नशा था| निश्चय ही वह साहित्य का मुम्बई के लिए स्वर्ण युग था|

चर्चगेट से नरीमन पॉइंट की ओर जाने पर सचिवालय, जिमखाना, वर्ल्डट्रेड सेंटर, बेक बे, होरिजन व्यू(क्षितिज) महिला विकास मंडल, टाटा मेडिकल रिसर्च सेंटर, इंडियन कैंसर सोसाइटी आदि महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं| चर्चगेट से बस एक सड़क की दूरी पर एशियाटिक शॉपिंग सेंटर है जो ख़ासकर धनाढ्यवर्ग की महँगी पसंद का केन्द्र है| सामने ही ईरोज़ आर्ट डेको शैली की खूबसूरत इमारत वाला सिनेमागृह है|मंत्रालय की ओर जाने वाली सड़क अपनी तमाम सहसड़कों पर खूबसूरत इमारतों कोलिए राह दिखाती है| के. सी. कॉलेज, बॉम्बे कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज़्म, के. सी. लॉ कॉलेज, मैनेजमेंट स्टडी कॉलेज, राम महल, मोतीमहल, मंत्रालय, आकाशवाणी, आमदार निवास, एम एल ए क्वार्टर्स आदि….. और इन सबके बीच भागती दौड़ती मुम्बई की ज़िन्दग़ी| मुम्बई वर्किंग क्लास का शहर माना जाता है| अपनी तमाम मुश्किलों को झेलते फुटपाथ पर सोते, जागते आख़िर हर तबके का आदमी इसमें समा ही जाता है| लंच का समय होते ही चर्चगेट से मंत्रालय तक की सड़कों पर जहाँ एक ओर रसना और सम्राट जैसे महँगे होटलों में एक कुर्सी तक ख़ाली नहीं मिलती वहीं केले की टोकरियाँ मिनटों में ख़ाली हो जाती हैं| यहाँ केले बेचने वाले लखपति होते देखे गए हैं|

बीसवीं सदी में दक्षिण मुम्बई के क्षितिज पर राजाबाई क्लॉक टॉवर अपनी विशेष अहमियत रखता था| जैसे ही कोई हार्बर में प्रवेश करता उसे दूर से ही इस टॉवर (घंटाघर) से निकलती आवाज़ सुनाई देती| पास जाने पर वह स्पष्ट हो जाती तब सुनाई पड़ता ब्रिटिश कालीन…..| रूल ब्रिटेनिया, गॉड सेव द किंग, होम! स्वीट होम और ए हंडला सिम्फ़नी का तीव्र नाद| हर चार घंटे पर टॉवर से नई ट्यूनसुनाई देती थी| आज हर पंद्रह मिनट में नई ट्यून बजाने वाले लंदन के प्रख्यात बिगबेन ही इसके जनक थे| हूबहू लंदन के बिगबेन क्लॉक टॉवर जैसा यह राजाबाई क्लॉक टॉवर चर्चगेट के ऐन सामने है जिसे ब्रिटिश सर स्कॉट ने १८७४ से ७८ के बीच तैयार किया|यह यहाँ का लैंडमार्क है| बिगबेनने १६ तरह की ट्यून इसमें रिकॉर्ड की थीं जो हर चार घंटे में बजती थीं|

राजाबाई टॉवर २८० फीट ऊँचा है| मुम्बई विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी और रीडिंग रूम को समेटे राजाबाई टॉवर सुरम्य विश्रांत सौंदर्य का मालिक है| पहली मंज़िल से १५ फुट की ऊँचाई और उससे भी ऊँचे टॉवर के स्तंभों में पोरबंदर पत्थरों में उत्कीर्ण पश्चिमी भारत के विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों की आठ फुट ऊँची प्रतिमाएँ और परफेक्ट वेंटिलेशन, पश्चिमी छोर के उत्तर-दक्षिणी ओरियंटेशन की खूबसूरती देखते ही बनती है| इसके रखरखाव में इतनी एहतियात बरती जाती है मानो ये कल ही बनकर तैयार हुआ है| सीढ़ियों पर चढ़ते हुए इमारत की धड़कनें सुनाई देती हैं जो उसकी जीवंतता का साक्ष्य है| मानो वह हर भागते दौड़ते मुसाफ़िर से पूछ रहा हो….. ‘तुम्हारी साँसों में तूफ़ान सा क्यों है? और तुम इतने परेशान से क्यों हो?’

विशाल प्रांगण में स्थापित मुम्बई विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर अब कालीना चला गया है| अब यहाँ लाइब्रेरी, दीक्षान्त सभागृह और प्रशासकीय कार्यालय है| मुम्बई विश्वविद्यालय इमारत १८५७ में निर्मित हुई थी|यह भारत के तीन महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक है| यहाँ २२ हज़ार वर्गमीटर में विभिन्न शालाएँ हैं और ८४ हज़ार वर्गमीटर में प्रयोगशालाएँ हैं| दो पोस्ट ग्रेजुएट सेंटर, ३५४ एफिलेटेड कॉलेज और ३६ डिपार्टमेंट हैं| कई प्रोफेशनल कोर्स यहाँ चलाए जाते हैं| सुंदर लैंड स्केप वाले उद्यान जिनमें ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत दरख़्त, फूल, क्रोटन….. मानो खुशबू का साम्राज्य हो और सर कावसजी जहाँगीर और दिग्गज इंजीनियर थॉमस ऑरमिस्टन की प्रतिमाएँ भी वहाँ स्थापित हैं| लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर चढ़ते ही बेंचमार्क दिखेगा| तल मंज़िल में सेंट्रल हॉल, एक तरफ़ दो कमरे और वेस्टिब्यूल टाइप की सीढियाँ हैं| घुमावदार सीढ़ियों की खिड़कियों पर मनमोहक स्टेंड ग्लास लगे हैं जिनसे छनकर आती रोशनी अध्ययन का माहौल रचती हैं| और इस माहौल को एकरस बनाती है सर जॉर्ज बर्डवुड, सर बार्टल फ्रेरे, जेम्स गिब्स, डॉजॉन विल्सन, होमर और शेक्सपीयर की प्रतिमाएँ| लाइब्रेरी के इंटीरियर पत्थर के मेहराबदार बरामदे, टीकवुड(शीशम) कीलम्बी-लम्बी रीडिंग टेबुलें और बर्मी टीकवुड की सीलिंग को देखकर पर्यटक ठगे से रह जाते हैं| लाइब्रेरीमें संस्कृत, मराठी, अरबी और फ़ारसी की पांडुलिपियाँ और दुर्लभ पुस्तकों का भंडार है| संदर्भग्रंथों और शोध सामग्रियों का भी अच्छा संग्रह है|

दीक्षांत सभागृह में क़दम रखते ही मुझे याद आ गया जब मैंने बी. एड. किया था तो इसी सभागृह में मुझे डिग्री प्रदान की गई थी| १३वीं सदी की फ्रेंच शैली की सजावट, भव्य स्थापत्य, उत्तरी छोर परजोडियॉक के १२ प्रतीक चिह्न, गोलाकार खिड़कियाँ जो स्टैंड ग्लास से मढ़ी हैं….. तीनओर शानदार गैलरियाँ, १०४ फुट लम्बा और ६३ फुट ऊँचा सभागृह भव्यता का एहसास कराता है कि हम जिन परीक्षाओं से गुज़रकर आए हैं उसका मूल्यांकन यहीं होगा|

राजाबाई टॉवर के इस नामकरण की मातृभक्ति से भरी अद्भुत दास्तान है| पहला भारतीय स्टॉक ब्रोकर कहलाने वाले उस ज़माने के रईस प्रेमचंद्र रायचंद्रने इसकी नींव १ मार्च १८६९ को यह सोचकर रखी थी कि जैन धर्मावलंबी नेत्रहीन उनकी माँ का सूर्यास्त से पहले ही भोजन कर लेने का नियम खंडित न हो जाए| वे जब तक जीवित रहीं उन्हें राजाबाई टॉवर सूर्यास्त होने का अलार्म देता रहा और उन्हें वक़्त पूछने के लिए किसी की मदद नहीं लेनी पड़ी|

चर्चगेट से मुम्बई विश्वविद्यालय जाने के लिए शॉर्टकट के रूप में जाना जाता है ओवल मैदान| एक ओर १९वीं सदी की विक्टोरियन गोथिक स्थापत्य की सम्मोहक कलात्मकता, दूसरी ओर मरीन ड्राइव तक फैली १९३० के दशक की रॉट आयरन बालकनियों वालीसुंदर‘आर्ट डेको’ इमारतों का विस्तार लिये ओवल मैदान परिसर मियामी के बाद विश्व में अकेला स्थान है जो इन दुर्लभ इमारतों से सुसज्जित है| १८६०में एस्प्लेनेडेडको आज़ाद मैदान, क्रॉस मैदान, कूपरेज़ मैदान और ओवल मैदान में बाँट दिया गया था|ओवल मैदान अंग्रेज़ ऑफ़ीसरोंके क्रिकेट खेलने का पसंदीदा स्थान हुआ करता था| उस समय भी यान हर उम्र के लोग चहलक़दमी करने आते थे और अब तो हर रविवार को पाँच हज़ार से ज़्यादा लोग यहाँ आते हैं| २२ एकड़ ज़मीन पर बीचोंबीच चीड़ के छायादार पेड़ों पटा मख़मली ओवल और इसके दोनों ओर फ्लोर फाउंटेन, सी टी ओ, राजाबाई टॉवर, मुम्बई विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी, विश्वविद्यालय परिसर, पब्लिक वर्क्स ऑफ़िसेज़, भीखाजी बहरामवेल, पश्चिम रेल का मुख्यालय, ओल्ड एडमिरलिटी, आर्क बिशप हाउस, ओल्ड सेक्रेटेरिएट, होली नेम चर्च, बॉम्बे हाईकोर्ट, कोर्ट कॉम्प्लेक्स,मैजेस्टिक होटल जैसी विक्टोरियन गोथिक स्थापत्य की शाही इमारतें तथा होरमुसजी दिनशा, गोपालकृष्ण गोखले, डी. ई. वाच्छा, महादेव, गोविंद रॉनाडे, सरजे. जीजीभाय, सोराबजी बंगाली और डॉ. बी. आर आंबेडकर की प्रतिमाएँ|इंप्रेस कोर्ट जैसी आर्ट डेको शैली की इमारतें भी जिनका सौंदर्य दूर से ही ललचाता है| अब तो यहाँ जॉगिंग कोर्स भी बन गया है| किसी ज़माने में ओवल मैदान में घुड़सवारी और वॉकिंग ट्रैक हुआ करता था जिसके चारों ओर खंभों की चारदीवारी थी| मैदान के दक्षिणी छोर में हॉर्स राइडिंग ट्रैक पर आठ आने में घोड़े पर ट्रैक का चक्कर लगाने मिल जाता था| इसे‘रॉटन रो’ कहते थे जो किंग्सरोड का अपभ्रंश था|आज जहाँ ताज वेलिंग्टन म्यूज़ियम है, वहाँ घुड़साल हुआ करती थी जहाँ एमेचर राइटर्सक्लब के प्रशिक्षित ट्रेनर घुड़सवारी सिखाया करते थे| ओवल को अब विश्व धरोहर का दर्ज़ा मिल गया है|

एक ज़माना था जब फिल्मों के साथ साथ सट्टे और मटके का भी क्रेज़ था| दिन भर खून पसीना एक कर कमाई हुई रकम सट्टे या मटके में थोड़ी बहुत अवश्य लगाई जाती थी| रतन खत्री मटके के व्यापारी का नाम था|चर्चगेट और बेलार्ड स्ट्रीट के कारोबारी इलाकों में देर रात तक काम करने वाले क्लर्क और अफ़सर भी मटके के क्रेज़ से अछूते नहीं थे| अब दलाल स्ट्रीट का शेयर मार्केट मटके की जगह ले चुका है| शेयर्स में भारी रक़म लगाकर मध्यवर्ग अपनी गाढ़ी कमाई स्वाहा करता जा रहा है| पर लत है कि छूटती नहीं| आँखें सूचकांक के चढ़ते गिरते अंकों पर टिकी रहती हैं|

महानगर का दिल गिरगाँव चौपाटी…..

गिरगाँव चौपाटी को महानगर का दिल कहा गया है | इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है| गाँधीजी ने‘अँग्रेज़ों भारत छोड़ो’का नारा सर्वप्रथम ग्रांट रोड स्थित गवालिया टैंक से आरंभ किया था और क्रांतिकारियों का दल गिरगाँव चौपाटी समुद्र तट पर इकट्ठा हुआ था| उस वक्त यह तट नारियल के पेड़ों से भरा था| अब इक्का दुक्का ही रह गए हैं नारियल के पेड़| अब यहाँ नाना-नानी पार्क बन गया है जिसमें बुजुर्ग टहलते-बतियाते हैं| यहीं बल उद्यान है जहाँ ठीक उस जगह बाल गंगाधर तिलक की प्रतिमा है, जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया था| एक गोल घेरा रेलिंग को जोड़कर बनाया गया है| बस उतने ही गोल दायरे में कबूतर मटरगश्ती करते और पर्यटकों द्वारा बिखेरे गये दाने चुगते हैं| परिंदे हैं पर अनुशासन बद्ध ….. मजाल है जो गोल दायरा तोड़ बाहर निकलें? यहाँ मॉनसून के दौरान विभिन्न प्रकार के वॉटर स्पोर्ट्स आयोजित किये जाते हैं| स्पीडबोट, जेट स्की, पैरा सेलिंग आदि|

चौपाटी नाम ‘चौ पाटी’ यानी चार जल मार्गों वाला स्थल| १८६५में मालाबार हिल की पहाड़ियाँ काटकर समुद्र को पाटकर निकली ज़मीन तक समुद्र की लहरों को अंतिम स्थान मिला इसी चौपाटी में| यह मुम्बई का बेहद मशहूर समुद्री तट है जहाँ सैलानियों को तनाव भरी ज़िन्दग़ी से थोड़े वक्त के लिए सुकून तो मिलता ही है, साथ ही चाय, नारियल पानी, भेलपूरी, पाव भाजी, वड़ापाव के स्टॉल, सींगदाना यानी मूँगफली टोकरी में भर कर गले सेलटकाए तट पर बैठे टहलते सैलानियों के बीच ‘टाइम पास’ की और ‘चना जोर गरम’ की आवाज़ें लगाते फेरी वाले, रिंग फेंकने और गुब्बारे फुलाने वाले, सैंड आर्टिस्ट से लेकर रूमानी जाड़ों को ब्लैक मेल करने वाली वृहन्नलाओं और ग्राहकों से इशारेबाज़ी करने वाली वेश्याओं तकहज़ारों लोगों की रोज़ी रोटी भी है|रोजाना कितने ही सपने चौपाटी पर पलते और टूटते हैं| देश के स्वतंत्रता आंदोलन की कर्मभूमि तो है ही, देश के सबसे प्रसिद्ध (महाराष्ट्र के त्यौहार) गणपति विसर्जन और दशहरे पर शहर की एक प्रसिद्ध रामलीला के रावण दहन का स्थान भी यही चौपाटी है|२६/११ के रूप में देश पर सबसे बड़े आतंकी हमले के नायक अजमल कसाब को पुलिस ने यहीं पकड़ा था| उसे पकड़ने के प्रयास में अपने जीवन की कुर्बानी देने वाले तुकाराम ओंबले का स्मारक यहीं है|

चौपाटी से बाईं ओर दूर तलक लम्बी दौड़ती मरीन ड्राइव की सड़क और दाहिनी ओर मालाबार हिल के कर्व तक बिल्कुल नेकलेस की शक्ल में सड़कों की बत्तियाँ जब जगमगाती हैं तो लगता है नेकलेसके हीरे दिपदिपा रहे हैं इसलिए इसे क्वींस नेकलेस कहते हैं| डूबते सूरज के तमाम रंग चौपाटी के समँदर को रंगों से भर देते हैं| जब नारियल पूर्णिमा या अनंत चतुर्दशी का त्यौहार गणपति विसर्जन के रूप में मनाया जाता है तो चौपाटी खिल उठती है| देवलोक जैसी नज़र आती है| यहाँ आई. ए. एफ. एयर शो (भारतीय वायुसेना) और मेराथन दौड़ भी आयोजित होती है| आसमान में वायुसेना का करतब देखने समुद्र तट पर लाखों की भीड़ उमड़ पड़ती है|मरीन ड्राइव समुद्र से लगी दीवार साक्षी है प्रेम कहानियों की| शाम होते ही यहाँ दीवार की रेलिंग पर प्रेमी जोड़े आ जुटते हैं और अगर समुद्र में ज्वार रहा तो लहरों की बौछारों में भीगते हैं| लहरों में ज्वार भी तो पूर्ण चंद्र रात्रि में होता है| प्रकृति प्रेम और मानव प्रेम की साक्षी है मरीन ड्राइव की रेलिंग|

अँग्रेज़ों के समय में मुम्बई के तत्कालीन गवर्नर जॉर्ज लॉयड ने मालाबार हिल से कोलाबा के बीच की १००० एकड़ से भी ज़्यादा ज़मीन को पाटकर समुद्र को पीछे ढकेल दिया था और मरीन ड्राइव का जन्म हुआ है| तब यहाँ मरीन बटालियन के रहने के लिए बैरेक्स बनाये गये थे|तभी से ये मरीन ड्राइव कहलाया जबकि इसे सोनापुर, क्वीन्स रोड और लाड़ का नाम क्वींसनेकलेस से बुलाया जाता रहा| पहले यह कैनेडी सी फेस के नाम से भी मशहूर था| उन दिनों समँदर की लहरें मरीन लाइन स्टेशन को छुआ करती थीं|

अँग्रेज़ीवर्णसी C के आकार वाला मरीन ड्राइव देश का सबसे महँगा बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट और मशहूर सिलेब्रिटीज़ का बसेरा ही नहीं विश्व का एकमात्र ऐसा शहर है जहाँ समुद्र तट पर अन्य विक्टोरियन गोथिक इमारतों के साथ आर्ट डेको की लगभग ३९ इमारतें हैं जो बेहद खूबसूरत दिखती हैं| इनमें कई ७५ साल पुरानी हैं|ये वर्ल्ड हेरिटेज इमारतों में गिनी जाती हैं| मुम्बई के ६० से ज़्यादा फ्लाई-ओवरों में सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध है मरीन ड्राइव फ्लाईओवर|

मरीन ड्राइव में कई प्रसिद्ध फिल्मों की शूटिंग हुई| दीवार, सी आई डी का मशहूर गीत “ज़रा हट के ज़रा बच के ये है मुम्बई मेरी जान|” आज भी लोगों की ज़ुबान पर है|

मरीन ड्राइव से नरीमन पॉइंट तक तीन किलोमीटर तक दौड़ती सड़क पर छै: कंक्रीट लेन हैं| यहाँ आयुर्वेद कॉलेज, महात्मा गाँधी रिसर्च सेंटर, तारापोरवाला एक्वेरियम यानी मत्स्यालय है| जो १९५१ में पर्यटकों के लिए खुला था| इस मत्स्यालय में समुद्री और मीठे पानी की मछलियाँ व्हेल के कंकाल से लेकर जीवित मछलियों के तमाम प्रकार मौजूद हैं| नन्ही गोल्ड फिश सहज आकर्षित करती है| और भी बड़ी बड़ी मछलियाँ जो मत्स्यालय में रखना संभव नहीं उनके कंकाल हैं| विशेष बात यह है कि यहाँ समुद्र से सीधी पाइप लाइन आती है और समुद्री जीवों को ताज़ा पानी मिलता है| आयुर्वेद कॉलेज में अध्ययन के साथ इलाज भी किया जाता है| केरल पद्धति से इलाज की भी सुविधा है| महात्मा गाँधी रिसर्च सेंटर यूँ तो शोध छात्रों के लिए है पर यहाँभारत के तमाम प्रकाशनों से छपी पुस्तकों की विशाल, भव्य लाइब्रेरी भी है| प्रतिमाह हिन्दी और उर्दू ज़बान में मासिक शोध पत्रिका ‘हिन्दुस्तानी ज़बान’ नाम से निकलती है| गाँधीजी ने यहाँ ‘हिन्दुस्तानीप्रचार सभा’ की स्थापना कर विदेशी छात्रों को हिन्दुस्तानी भाषा से परिचित कराने का उद्देश्य निर्धारित किया था| यहाँ सांस्कृतिक व साहित्यिक आयोजन भी समय समय पे होते हैं|

अंग्रेज़ी शासनकाल में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नारा था ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’| महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से गणपति का उत्सव शुरू करने वाले तिलक ही थे|अब यह त्यौहार मुम्बई में बहुत विशाल पैमाने पर धूमधाम से मनाया जाता है| भाद्रपद चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक मुम्बई गणेशमय रहता है|तिलक ने इस त्यौहार का श्रीगणेश राष्ट्रीय एकता के लिए किया था| मुम्बई में ‘सरदार गृह’ तिलक की गतिविधियों का केन्द्र था| यहीं|अगस्त १९२० को उनका निधन हुआ था| अब यह भवन सूना-सूना सा उपेक्षित नज़र आता है| मकड़ी के जालों के साथ जंग लग रहे लोहे के बीम झाँक रहे थे जब मैं भवन के द्वार पर खड़ी थी| मेहराबदार खिड़कियाँ किसी ज़माने में रही होंगी पर अब वहाँ ग्रिल और ए. सी. और बाल्कनियाँ, अहाते और सीढ़ियों पर बेतरतीबी से सामान अटा पड़ा है| सीढ़ियाँ लकड़ी की हैं| लगता है ये उस ज़माने का लॉज रहा होगा जिसे सरदार गृह के नाम से जाना जाता है| यहाँ महात्मा गाँधी और तिलक ठहरा करते थे| बिस्किट कलर में रंगे दो चौक और चार मंज़िल वाले सरदार गृह का मुख्य आकर्षण चौथी मंज़िल है जहाँ तिलक द्वारा संपादित केसरी अखबार का मुम्बई कार्यालय अब भी कार्यरत है|अंदर की दीवारों पर तिलक के महत्त्वपूर्ण जीवन प्रसंगों को चित्रित किया गया है| एक चित्र में उनकी मृत्युशैय्या के पास महात्मा गाँधी खड़े हैं| तिलक की टकटकी जहाँ लगी है वहाँ एंग्लो गोथिक स्थापत्य की इमारत का चित्र है| विडंबना देखिए कि आज इस इमारत में उसी पुलिस का हेड ऑफ़िस हैजोज़िन्दग़ी भर तिलक की जान के पीछे पड़ी रही| पेंटिंग में क्रॉफ़र्ड मार्केट का शानदार क्लॉक टॉवर है जो अब चोरी चला गया| तिलक के लिखे पत्र, कैबिनेट और मेज कुर्सियाँ जस की तस हैं| एक छोटी सी श्वेत प्रतिमा भी है उनकी| बस लोकमान्य स्मारक ट्रस्ट के अलावा और कोई आकर्षण नहीं रह गया है| हाँ तिलक जयंती पर ज़रूर यहाँ रौनक रहती है|

गिरगाँवचौपाटी से नाना चौक तक के रास्ते को गाम देवी भी कहते हैं| मुख्य सड़क से दाएँ-बाएँ के रास्तों के भी अलग-अलग नाम हैं| लेबर्नम मार्ग पर हरे भरे पेड़ों से घिरा हलका जमुनी और सफेद रंग से पुता शानदार बँगला आज़ादी की कहानी कहता नज़र आता है| यह बँगला ‘मणि भवन’ नाम से जाना जाता है जो महात्मा गाँधी के मित्र रेवाशंकर जगजीवन झावेरी का है| १९१७ से १९३४ तक यहाँ गाँधीजी का निवास रहा इसलिए इसका बहुत अधिक ऐतिहासिक महत्व है| गाँधी जी की आज़ादी के प्रति सरगर्मियां असहयोग आंदोलन, दाण्डी यात्रा,सविनय अवज्ञा आंदोलन, तमाम ऐतिहासिक बैठकें, सलाह मशविरे आदि का साक्षी यह बँगला आज भी गाँधीजी को समर्पित है| गर्मी के दिनों में आज़ादी के मतवालों का जमावड़ा मणिभवन की छत पर होता था| गाँधीजी ने पहली बार चरखे पर सूत यहीं काता, बकरी के दूध का सेवन भी यहीं से उन्होंने आरंभ किया था| यहीं से अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्र यंग इंडिया और गुजराती साहित्यिक पत्र नवजीवन के संचालन की ज़िम्मेवारी उन्होंने ली|इसके ग्राउंड फ़्लोर में लाइब्रेरी है जिसमें महात्मा गाँधी के और उनके विचारों से जुड़ी ५० हज़ार किताबें हैं|पहली मंज़िल पर चढ़ते हुए दीवारों पर गाँधीजी की कई तस्वीरें हैं| एक छोटा सा ऑडिटोरियम (प्रेक्षागृह) भी है| दूसरी मंज़िल पर जहाँ गाँधीजी बैठते थे उस जगह को शीशे से सील कर दिया गया है| शीशे के उस पार चरखा, उनका टेलीफोन, हाथ से हवा झेलने वाला पँखा, गद्दा, तकिया रखा है| बा-बापू के काते हुए सूत की लच्छी भी वहाँ रखी है| कमरे के साथ लगी बालकनी पर खड़े होकर वे लोगों का अभिवादन स्वीकार करते थे| बड़े हॉल में प्रदर्शनी है जिसमें उनके जीवन से जुड़ी झाँकियाँ बेहद खूबसूरत तरीके से लगी हैं| बाजू के कमरे में टैगोर को लिखा पत्र रखा है और उसके बाजू में सुभाषचंद्र बोस के द्वारा गाँधीजी को लिखे पत्र हैं|

कन्हैयालाल मुन्शी ने ७ नवंबर १९३८ को गाँधीजी की प्रेरणा से भारतीय विद्या भवन की स्थापना की| यह मार्ग के. एम. मुन्शी मार्ग कहलाता है| भारतीय विद्या भवन साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र है| इसके पूरे भारत में ११७ केन्द्र हैं और ७ केन्द्र विदेशों में हैं| इसके द्वारा ३५५ संस्थाएँ संचालित की जा रही हैं| लोकप्रिय हिन्दी साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘नवनीत’ पिछले ६३ वर्षों से यहीं से निकल रही है| नवनीत अन्य भाषाओँ में भी प्रकाशित होती है|

गिरगाँव चौपाटी के सामने विल्सन कॉलेज है| यह भारत के पुराने कॉलेजों में से एक है जिसकी नींव १८३२ में रखी गई| बिल्डिंग बनी १८८९ में जिसका डिज़ाइन जॉन एडम्स ने किया था| विक्टोरियन गोथिक शैली की इस इमारत को हेरिटेज इमारतों में ग्रेड  का दर्ज़ा दिया गया है| यहाँ विभिन्न विषयों की पढ़ाई होती है| लाइब्रेरी, हॉस्टल, चैपल, विल्सन जिमखाना, नेचरक्लब, काउंसलिंग सेंटर में विद्यार्थी अध्ययनरत हैं| मेरे लिए तो यह तीर्थ के समान है क्योंकि हेमंत (पुत्र) ने यहीं शिक्षा प्राप्त की थी| अक़्सर फ़िल्मी दृश्य भी यहाँ फिल्माए जाते हैं|

वी. आई. पी. लोगों की पसंदीदा जगह मालाबार हिल…..

गिरगाँव चौपाटी से मालाबार हिल की चढ़ाई बाबुलनाथ से शुरू होती है | व्हाईट हाउस, वालकेश्वर, बाणगंगा, राजभवन….. राजभवन पहुँचकर मालाबार हिल का एक कोना समाप्त हो जाता है| चढ़ाई चढ़ते हुए लगता है मानो कोई पहाड़ी शहर हो| मुम्बई के उमस भरे मौसम से छुटकारा मिल जाता है और ताज़गी भरी ठंडक बदन को तरोताज़ा कर देती है| चढ़ाई चढ़ने के पहले दाहिने छोर पर स्थापित है वालकेश्वर मंदिर जिसका निर्माण ९वीं और १३वीं सदी के बीच सिल्हारा साम्राज्य द्वारा कराया गया था|मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही प्राचीन कला वैभव के दर्शन होते हैं| चारों ओर विभिन्न देवी देवताओं के मन्दिर और बीच में शीतल जल का तालाब| मंदिर के प्रांगण में कई स्थानों पर प्राचीन दीपस्तंभ इस स्थान के ऐश्वर्य और वैभव की कहानी सुनाते हैं| तालाब के चारों ओर कई पुरानी मूर्तियाँ हैं जिनमें कच्छप और शिवलिंग बहुत अधिक हैं| यहाँ पर जितने भी छोटे बड़े मंदिर हैं उनमें सबसे पुराना मंदिर वेंकटेश्वर बालाजी केमंदिर को माना जाता है| पेशवा काल में बने इस मंदिर में लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है| वालकेश्वर मंदिर के निर्माण के साथ जो कथा जुड़ी है वह त्रेतायुग की है| जब श्रीराम सीताजी की खोज करते हुए यहाँ से गुज़रे थे तो उन्होंने सागर के किनारे शिव जी की पूजा करने के लिए लक्ष्मण से शिवलिंग लाने को कहा|लक्ष्मण को देर होती देख उन्होंने तट पर की बालू से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की| इसीलिए इस स्थान का नाम वालकेश्वर पड़ा| बाबुलनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग की महिमा अद्भुत है| जब वर्षा नहीं होती, सूखे जैसी स्थिति आ जाती है तो शिवलिंग को पूरा पानी में डुबो दिया जाता है और तब यकीनन वर्षा होती है|

पुर्तगालियों के शासनकाल में यह इलाका गझिन हरियाली भरा था| धूप में चमकती, झिलमिलाती बालू वाले खूबसूरत समुद्र तट थे और उन पर नारियल, सीताफलके पेड़ चिड़ियों से गुलज़ार रहते थे| इन पेड़ों के बीच से गुज़रती समुद्री हवा जैसे संगीत के सुरों से गुज़र रही हो, एक नशीलापन चहुँ ओर होता था| धीरे-धीरे मालाबार हिल के जंगल आबाद होते गये| और एक समृद्धशाली इलाक़ा बसता गया|

राजभवन मालाबार हिल की उतराई पर है| यह राजभवन सफेद चमकते स्फटिक के महल जैसा है| यहाँ बिना अनुमति प्रवेश वर्जित है| राज्यपाल जी का प्राईवेट समुद्र तट और पर्सनल हेलीपेड है| यहाँ की ‘सूर्योदय गैलरी’ और‘देवी मंदिर’ अब आम आदमी के लिए भी सुबह सवा छै: से आठ बजे तक के लिए खुल गया है| लेकिन एक बार में केवल दस लोग ही मरीन ड्राइव के समुद्र तट का आनंद ले सकते हैं वो भी वेबसाइटपर ऑनलाइन बुकिंग करा के|

घोर कंक्रीट जंगल में सघन दरख़्तों और बाग बगीचों की पचास एकड़ लहलहाती हरियाली वाला इतना खूबसूरत राजभवन….. कि नज़रें हटती ही नहीं| इसकी राजसी शान ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर विदेशी राष्ट्र अध्यक्षों तक को अपना मुरीद बना लिया| ‘जल भूषण’, ‘जल चिंतन’, ‘जल लक्षण’, ‘जल विहार’, ‘जल सभागृह’ राजभवन में एक से बढ़कर एक भव्य विशाल नगीने हैं| जल भूषण राज्यपाल का घर और दफ़्तर है| जल सभागृह दरबार हॉल है जहाँ सरकार के शपथ ग्रहण और पुरस्कार समारोह हुआ करते हैं|जल विहार विदेशी राष्ट्र प्रमुखों व अन्य गणमान्य अतिथियोंके लिए आरक्षित है और जल लक्षण मुम्बई आने वाले अन्य देशों के राष्ट्रपतियों और जल चिंतन प्रधानमंत्रियों का आवास है| तीन ओर से समुद्र से घिरे इस राजभवन की ‘सूर्योदय गैलरी’ के लिए कहा गया है कि शायद ही अन्य देशों में इतना खूबसूरत सूर्योदय दिखता हो| यहाँ भारत के चुनिंदा तीन सौ कलाकारों ने बाँसुरी की स्वरलहरियों और समँदर से उठते हवा के ताज़े, शीतल झकोरों के बीच लो रेलिंग सी फेंसिंग डेक पर खड़े होकर या योग चटाई पर बैठकर उगते सूरज को जब अपनी स्वरांजलि अर्पित की तो ‘वाह वाह’ से गूँज उठा माहौल| १ सितंबर २०१४ से जब से इस शानदार परिसर ने आम आदमी के लिए पट खोले हैं तब से मुम्बई को नया पर्यटन आकर्षण मिल गया है| सूर्योदय गैलरी की दीवारों को मध्यप्रदेश के आदिवासी चित्रकारों ने सजाया है| पास ही प्राचीन देवी मंदिर के दर्शन भी पर्यटक कर सकते हैं|

राजभवन के दरबार हॉल में मुझे तत्कालीन राज्यपाल एस. एम. कृष्णा के हाथों वसंतराव नाइक प्रतिष्ठान की ओर से वर्ष २००४ में साहित्य का लाइफ़ टाइम एचीव्हमेंटअवार्ड दिया गया था|तब मैंने राजभवनको पहली बार अंदर से देखा था| उस जनविहीन प्राइवेट समुद्र तट पर भी गई थी जो राजभवन केउद्यानकी सीढ़ियाँ उतारकर हैं| कुछ सफेद परों वाले परिंदे किनारे की लहरों पर कागज़ की नाव के समान तैर रहे थे| वह मेरे जीवन का अद्भुत क्षण था| दूसरी बार २०१४ में उत्तराखंड के गवर्नर ने मुझे चाय पर आमंत्रित किया था| गवर्नर अज़ीज़ कुरैशी साहब को हम चार शायरों ने देर तक गज़लें सुनाईं थीं इसी राज भवन के विशेष मेहमान कक्ष में और मैंने उन्हें हेमंत की किताब ‘मेरे रहते’ भी भेंट की थी|मेरी ग़ज़लों पर राज्यपाल साहब के मुक़र्रर शब्द आज भी कानों में गूँजते हैं|

राजभवन से मालाबार हिल की चढ़ाई पर बाएँ तरफ़ बाणगंगा सरोवर है| जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जाना जाता है| यह सरोवर हिन्दू धर्म की आस्था का केन्द्र है| किंवदंती है कि वनवास के दौरान सीताजी की खोज में श्री राम यहाँ आये थे और आसपास कहीं नदी या सरोवर न होने की वजह से लक्ष्मण ने धरती को अपने बाण से भेदकर जल की धार बहाई थी| इसकेजल में गंगाजल की तरह जड़ी बूटियों वाले गुण थे इसलिए इसे बाणगंगा कहते हैं| कितना आश्चर्य है कि वालकेश्वर समुद्र से घिरा है और वहाँ मीठे जल का सरोवर है!! चौदहवीं सदी में इस सरोवर का जीर्णोद्धार हुआ और यह धार्मिक आस्थाकाकेन्द्र बन गया|श्रावण मास और पितृपक्ष में श्राद्ध आदि धार्मिक कार्यों से सरोवर गुलज़ार रहता है| इसके जल में रोहू मंगूर मछलियाँ, बत्तख और हंस तैरते नज़र आते हैं| बाणगंगाराजभवन से महज़ दस मिनट की दूरी पर है| इस इलाके में पचास से अधिक मंदिर, पुरानी इमारतें आदि पर्यटकों के आकर्षण स्थल हैं| बाणगंगा के पश्चिमी छोर परकाशी मठ के सातवें मठाधीश श्रीमत माधवेंद्र स्वामी और  अठारवें मठाधीश श्रीमत वरादेंद्र तीर्थ स्वामी की महासमाधियाँ हैं| सन् १७७५ में माधवेंद्र स्वामी ने यहाँ जलसमाधि ली थी| मुम्बई में गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों का यह सबसे पवित्र स्थान है|

बाणगंगा सरोवर से मालाबार हिल की चढ़ाई में रेखा भवन के पास बना जैन मंदिर इस समृद्धि शाली इलाके का पहला सोपान है| १९०५ में बना प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का यह जैन मंदिर कला की अद्भुत मिसाल है| मंदिर की दीवार पर रंगीन कलाकृतियाँ हैं जिसमें २४ तीर्थंकरों के जीवन की झलकियाँ हैं| पहली मंज़िल पर काले संगमरमर से निर्मित भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा है और हिन्दुओं के विभिन्न प्लेनेट भी दर्शाये गये हैं| जैन मंदिर से हैंगिंग गार्डन तक चढ़ाई है| यह सारा इलाका हीरे के व्यापारियों, फिल्म कलाकारों और नेताओं के बँगलों, घरों से आबाद है| बीसवीं सदी के सातवें, आठवें दशक में यह इलाका जादुई एहसास सा कराता था| इन बँगलों के बीच से चारों ओर से फेनिल लहरों वाला समुद्र दिखाई देता था| ऊँचाई से नीचे चट्टानों पर टूटती, बिखरती लहरें न जाने किस लोक में पहुँचा देती थीं| डबल डेकर बसें चलती थीं और लोगों की आवाजाही अधिक नहीं थी|

यहीं पारसियों का ‘टॉवर ऑफ़ साइलेंस’ है जहाँ पारसी शवों को गिद्धों के हवाले कर दिया जाता है| ताकि  गिद्ध मृत शरीर को अपना भोजन बनालें| उनकी मान्यता है  कि मृत शरीर भी किसी  केकाम आना चाहिए|

पाकिस्तान के संस्थापक  मोहम्मदअल न्ना का शानदार बँगला ‘जिन्नाहाउस’ भी यहीं है  जो१९३० में मालाबार हिल का महत्त्वपूर्ण स्थल था  जहाँ  जिन्ना से जुड़ी न जाने कितनी कहानियों ने जन्म लिया|  उनकी पोती  दीना वाडिया इस बँगले के  मालिकाना हक  के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में लम्बी  लड़ाई लड़ रही है|

मुख्यमंत्री का खूबसूरत बँगला भी मालाबार हिल का आकर्षण है|

फ़िरोज़शाह  मेहता उद्यान….. किसी ज़माने में फ़िल्मों की शूटिंग का केन्द्र था…..

मालाबार हिल हैंगिंग गार्डन के लिए प्रसिद्ध है| अब इसका नाम बदलकर सर फ़िरोज़शाह मेहता उद्यान रख दिया गया है| यहाँ से मुम्बई को पानी भी सप्लाई किया जाता है| इस उद्यान के पेड़, क्रोटन आदि जानवरों की शक्ल में कुछ इस अंदाज़ से काटे गये हैं कि वे अधर में लटके जान पड़ते हैं| यहाँएक फ्लावर क्लॉक भी है और जूते के आकार का शू गार्डन भी है जो बच्चों के चढ़ने, उतरने, फिसलने वाला घर है|यहाँ खड़े होकर सामने सागर में डूबते सूरज को देखना बेहद सुहावना लगता है| सूर्य के डूबते ही यू शेप में समुद्र को घेरे हीरे सी जगमगाती रोशनियों वाला क्वीन्स नेकलेस समुद्र के काले दिखते पानी को स्वप्निल बनाता है| नीचे समँदर तक जाने के लिए हरा भरा सीढ़ियों दार रास्ता भी है जहाँ ऊँचे-ऊँचे दरख़्त लगे हैं| नीचे खड़े होकर देखो तो हैंगिंग गार्डन सचमुच अधर में लटका नज़र आता है|

हैंगिंग गार्डन के सामने कमला नेहरु पार्क है| यह १९५२ में बनाया गया और यह थोड़ी ढलान पर है| यहाँ एक बाल उद्यान भी है| यहाँ से भी मरीन ड्राइव का शानदार व्यू दिखता है| कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई है| इसका सौ डेढ़ सौ बोन्साई पेड़ों का बेहद खूबसूरत उद्यान भी पर्यटकों को लुभाता है|

हैंगिंग गार्डन से नीचे उतराई पर की सड़क पार करते ही सामने प्रियदर्शिनी पार्क है| ठाठेंमारता समँदर अपने रेतीले किनारे और उस पर लगे नारियल, नीलगिरी आदि के वृक्षों का सुन्दर कोलाज रचता है| मन करता है घंटों वहीं गुज़ारें, समँदर के इस खूबसूरत आमंत्रण पर टकटकी सी बँध जाती है|समँदर की विशाल फैली भुजाओं में सिमटी मुम्बई किसी अभिसारिका सी सदियों से न जाने कितने उतार चढ़ाव देख चुकी है| लोग इसे ‘माझी लाडकी’, ‘मेरी जान’ जैसे विशेषणों से नवाज़ते हैं….. लोग अन्य प्रदेशों से यहाँ कुछ पाने की चाह में आते हैं….. पर…..

यहाँ मिलता है सब कुछ/ इक मिलता नहीं दिल/ इक चीज़ के हैं कई नाम यहाँ/ ज़रा हट के, ज़रा बच के, ये है बॉम्बे मेरी जान| लो मैं तो प्रियदर्शिनी पार्क घूमते-घूमते ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने में पहुँच गई….. क्या करूँ….. “लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे|

मुम्बई आये और महालक्ष्मी के दर्शन न किये तो क्या किया…..

प्रियदर्शिनी पार्क से महालक्ष्मी तक की सड़क महत्त्वपूर्ण इमारतों से युक्त है| मुकेश चौक में गायक मुकेश की स्मृति में सी स्टोन से बनी दो मूर्तियाँ स्थापित हैं जो भारतीय संगीत का बेहतरीन नमूना हैं|पैडर रोड, भूलाभाई देसाई रोड, ब्रीच कैंडी अस्पताल जो फिल्मी हस्तियों के इलाज के लिए जाना जाता है और जहाँ भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के घुटनों का ऑपरेशन हुआ था, वार्डन रोड का प्रभुकुंज स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर का निवास स्थान है| मीना मंगेशकर, आशा भोंसले भी इसी इलाके में रहती हैं| जसलोक अस्पताल उच्च तकनीकी इलाज के लिए प्रसिद्ध है| तमाम वीज़ा एम्बेसीज़ आदि के बाद महालक्ष्मी में समँदर के किनारे धनधान्य की देवी लक्ष्मी का मंदिर है जो शिलाखंड पर निर्मित है| मंदिरमें देवी महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली रूप की मनोहारी प्रतिमाएँ हैं| प्रतिमाओं का श्रृँगार रत्नजड़ित आभूषणों से किया जाता है| मुम्बई में आतंकवादी हमले के बाद से महालक्ष्मी मंदिर में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम हैं| सी सी टी वी में श्रद्धालुओं की कतारें आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती हैं….. नवरात्रि में बम डिटेक्शन और खोजी कुत्तोंका स्क्वाड पुलिस दल और सुरक्षा दल के साथ मंदिर की सुरक्षा में कड़ी नज़र रखता है| महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण काल बॉम्बे गज़ेटियर्स में १७६१ से १७७१ के बीच का माना गया है| कहते हैं कि अँग्रेज़ सरकार ने गिरगाँव, मालाबार हिल से वर्ली कॉज़वे को जोड़ने का काम किसी रामजी-शिवजी प्रभु को सौंपा था| आलम यह था किदिन भर का निर्माण रात को समुद्री ज्वार में बह जाता….. एक रात प्रभु को सपने में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती के दर्शन हुए….. तीनों देवियों ने कहा….. “हमें समुद्र की तलहटी से निकाल कर यहाँ हमारा मंदि रब नवाओ| ” नींद से जागकर जैसे प्रभु प्रभु मय हो गया| करिश्मा ये हुआ कि समुद्र तल से मूर्तियाँ निकालते ही निर्माण पूरा हो गया| ८० हज़ार की लागत से डेढ़ एकड़ के परिसर में मंदिर बन कर तैयार हुआ | मंदिर दूर से द्वीप की तरह लगता है जिसके तीन ओर ठाठें मारता सागर मंदिर का प्रक्षालन करता रहता है| चैत्र और क्वार की नवरात्रि में मानो सूरज उगते ही अपनी कोमल किरनों से देवियों का स्पर्श करता है| पहले मंदिर के पिछवाड़े की सीढ़ियाँ उतर चट्टानों पर खड़े होकर सागर दर्शन कर सकते थे लेकिन अब इसे घेर दिया गया है| आतंक की छाया इधर भी डेरा डाले है|

मंदिर के गर्भगृह में रजत सिंहासन, ध्वजस्तंभ, सभामंडप, मुख्य द्वार और बाहर गणपति, विट्ठल रुक्मणी, जयविजय की प्रतिमाएँ, श्रीयंत्र, सामने स्तंभों पर हाथी और मोर की आकृतियाँ मंदिर की अन्य विशेषताएँ हैं |मंदिर के पीछे उतराई पर एक जलपान गृह है जहाँ मूँग की और चने की दालके पकौड़े राईके तेल में तल कर दिये जाते हैं| इन स्वादिष्ट पकौड़ों को हरी चटनी के साथ हर दर्शनार्थी अवश्य खाता है| यहाँ आकर समँदर का नाम वर्ली तट हो जाता है|

महालक्ष्मीरोड पर ही हाजी अली की दरगाह है जो समँदर मेंस्थित एक टापू पर बनी है| टापू से सड़क तक कंक्रीट का जल मार्ग है लगभग आधा किलोमीटर का जिसमें आजू बाजू कोई रेलिंग नहीं है और जिस पर चलना किसी रोमाँच से कम नहीं है क्योंकि शरारती लहरें कब उछलकर आपको भिगो दें कहा नहीं जा सकता| यह दरगाह मुस्लिम संत सैय्यद पीर हाजी अली शाह बुखारी की कब्र है| वे बुखारा के निवासी थे और १५वीं सदी में दुनिया का भ्रमण करते हुए मुम्बई आ बसे थे| जब वे मुम्बई से मक्का जा रहे थे तो इसी स्थान पर डूबकर उनकी मृत्यु हो गई थी| उनकी स्मृति में १४३१ में यह दरगाह बनी| जो इस्लामी स्थापत्य का नायाब नमूना है| ४५०० मीटर के क्षेत्र में बनी इस दरगाह के साथ ही मस्जिद भी है जो दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र ऐसा धर्मस्थान है जहाँ दरगाह और मस्जिद समुद्र के बीच टापू पर हो| दरगाह झक्क सफेद रंग की है जिसकी सबसे ऊँची मीनार ८५ फीट की है|मकबरा लाल हरे रंग की चादर से ढँका हुआ है| मुख्य परिसर में स्तंभों पर काँच की सुन्दर नक्काशी है| पुरुषों और महिलाओं के इस्लाम रीति अनुसार अलग-अलग प्रार्थना स्थल हैं| चार सौ साल पुरानी यह दरगाह ऐसा लगता है जैसे कल ही बनी हो| प्रांगण में खाने पीने की वस्तुएँ, फूल, चादर, अगरबत्ती आदि की दुकानें हैं| जब समँदर में ज्वार आता है तो जलमार्ग पानी में डूब जाता है| प्रतिदिन सुबह से दोपहर तीन बजे तक वह पानी में डूबा रहता है|इसके आसपास समुद्री चट्टानें हैं जिन पर सफेद पँखों वाले पक्षियों के झुंड बैठे रहते हैं| उड़ते हैं तो एकसाथ, बैठते हैं तो एक साथ| इसकी एक मीनार पर चढ़कर अमिताभ बच्चन ने फिल्म कुली का सीन दिया था| खूबसूरत कार्पिंग वाली दरगाह का मुख्य आकर्षण हर शुक्रवार को सूफ़ी संगीत और कव्वाली की महफ़िल है| चट्टानों पर लहरें टकराकर मानो कव्वाली की महफ़िल में शामिल होने की कोशिश करती हैं| यहाँ से दूर-दूर तक समँदर बाँहें फैलाए मानो मुम्बई की गगनचुम्बी इमारतों को बस पुकार ही रहा हो|

यहीं महालक्ष्मी रेसकोर्स है| ओवल शेप का ट्रैक दो हज़ार चार सौ मीटर तक स्ट्रेट गया है| महालक्ष्मी रेसकोर्स की संरचना १८८३ में ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न स्थित रेसकोर्स को ध्यान में रखकर की गई| रेसकोर्स का गेट समुद्र की ओर खुलता है| यह सर कसरो एन वाडिया के धन से बनकर तैयार हुआ| अब इसे म्यूनिसिपल कार्पोरेशन ऑफ़ग्रेटर मुम्बई की देखरेख में‘रॉयलवेस्टर्न इन्डिया टर्फ़क्लब’ चलाता है| घोड़े पर करोड़ों का सट्टा लगाना अमीरों का शगल है|

महालक्ष्मी रेस कोर्स के बाजू में पर्यावरण संरक्षण की बड़ी इमारत है| तुलसी के पौधे यहाँ मुफ़्त मिलते हैं| सामने हीरा पन्ना शॉपिंग सेंटर है जहाँ अभिजात्य वर्ग और फिल्मी हस्तियाँ शॉपिंग करती हैं|

समँदर को जहाँ किनारों से बाँधा है वहाँ वर्ली सी फेस है| वर्ली मुम्बई का समृद्ध इलाका है| खूबसूरत सड़क ऊँचाई पर है  और  थोड़ा नीचे समँदर का अथाह जल  | रेलिंग  पर बैठे पर्यटक लहरों की बौछारों से  भीग जाते  हैं| सामने ही वर्ली दुग्ध डेअरी बहुत विशाल अहाते को घेरे हुए है| यहाँ प्रतिदिन लाखों लीटर दूध मशीनों द्वारा छानकर प्लास्टिक  की थैलियों में पैक किया जाता  है| दूध पावडर, क्रीम, मक्खन सबकी बड़ी बड़ी मशीनें दिनरात  चलती हैं| इस  डेअरी की इमारत  में सुस्ताना  मना है| रात  और दिन काम ही काम|

महालक्ष्मी रोड पर ही आगे नेहरु सेंटर है जिसमें बच्चों का साइंस पार्क और स्थाई आर्ट गैलरी है जिसमें ज़िन्दग़ी से जुड़ी    को समय-समय पर चित्रों  द्वारा दर्शाया  जाता है| एंटीक वस्तुओं की  प्रदर्शनी में रेलवे एंजिन, ट्राम, सुपर सॉनिक  हवाई जहाज  और भाप से चलने वाली ट्रेन विशेष दर्शनीय है| यहाँ  नेहरू जी द्वारा लिखित पुस्तक डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया का चित्ररूप में प्रस्तुतीकरण किया गया है| यहाँ चौदह गैलेरीज़ हैं और ऑडियो विज़ुअल शो भी होते हैं| कई तरह के कल्चरल प्रोग्राम नृत्य, गायन, साहित्यिक सम्मेलन भी होते हैं| नेहरु सेंटर में ही लाफ़्टर क्लब द्वारा आयोजित एकल कविता पाठ में मैंने एक घंटे तक कविता सुनाई थी| और सुनने वाले साहित्यकार नहीं बल्कि साहित्य में रूचि रखने वाली आम पब्लिक थी|

नेहरु साइंस सेंटर से आगे डॉ. एनी बेसेंट रोड पर नेहरु तारांगण(प्लेनेटेरियम) है| जहाँ अलग अलग समय में अँग्रेज़ी और हिन्दी भाषा में शो होते हैं जिसमें तारे, सूर्य, चंद्र, आकाशगंगाएँ, ग्रहनक्षत्रों को बिल्कुल असली रूप में दिखाया जाता है| ऐसा लगता है जैसे हम कुर्सी पर बैठे आसमान की सैर कर रहे हैं |बेहद खूबसूरत इमारत के अंदर भी शो के लिए बनाया गया प्रतीक्षा लय भी ऐसा लगता है मानो आसमान नीचे उतर आया है| दीवारों पर खूबसूरत कलाकृतियाँ….. मंगल, शनि के बड़े बड़े मॉडल….. धरती से आसमान….. ब्रह्मांड की सैर करा देते हैं|

वर्ली में ही पांडुरंग बुधकर मार्ग पर दूरदर्शन केंद्र है| किसी ज़माने में दूरदर्शन केंद्र बहुत लुभाता था| मात्र दो चैनल मेट्रो और दूरदर्शन|इन दो चैनलों ने रामायण, हम लोग जैसे कई बेहतरीन धारावाहिक देकर लोगों को टी वी सेट का दीवाना बना दिया था| हम लोग में उषारानी के लिए डॉन क्वीन संबोधन तब लोगों की ज़बान पर था| हर रविवार को मुम्बई की सड़कें कर्फ्यू ग्रस्त नज़र आती थीं और लोग हाथ पाँव धोकर बाकायदा पालथी लगाकर टी वी के सामने बैठकर रामायण धारावाहिक देखते थे| अब आठ सौ से अधिक चैनल होने के बावजूद उतने नहीं लुभाते|हर जगह बाज़ारवाद छा गया है| मुम्बई में भारतीय टेलीविज़न स्टेशन २ अक्टूबर १९७२ में बना| प्रसार भारती के कार्यक्रमों का प्रसारण नियमित होने लगा| १९९४ में दूरदर्शन ने सह्याद्रि चैनल लाँच किया जो पूरे महाराष्ट्र को कवर करता है|दूरदर्शन केन्द्र में अन्य कल्चरल प्रोग्राम भी समय समय पर आयोजित किये जाते हैं| २०१३ में आशीर्वाद साहित्यिक संस्था द्वारा वैश्विक हिन्दी पर महानगर की लेखिकाओं की परिचर्चा आयोजित की गई थी जिसमें वक्ता के तौर पर मैं भी मौजूद थी| यह कार्यक्रम सह्याद्रि चैनल पर दिखाया गया था|

मैं वर्ली से सीधे प्रभादेवी होते हुए दादर की राह पकड़ती हूँ| वर्लीसे प्रभादेवी तक ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं में महत्त्वपूर्ण सरकारी और ग़ैर सरकारी ऑफ़िसेज़ रहाइशी फ्लैट आदि हैं जिसमें ऊँचे तब केके लोग रहते हैं| भीतर ही भीतर कई गलियाँ मुम्बई की चॉल को समेटे हैं| चॉल भी बैठी चॉल, खड़ी चॉल आदि नामों से अपने आवरण को उजागर करती हैं| प्रभादेवी सिद्धि विनायक मंदिर के लिए प्रख्यात है| जो ३० साल पुराना है यहाँ तगड़ी सुरक्षा के बीच भक्तगण आते हैं और घंटों लाइन में खड़े रहकर दर्शन करते हैं| मंदिर में छोटे से मोहक गनपति अपनी पत्नियाँ रिद्धि-सिद्धि के साथ पूजे जाते हैं| गणेश चतुर्थी यानी संकष्टि के दिन यहाँ लड्डू प्रसाद मिलता है|बूँदी का मेवों से भरा लड्डू इतना बड़ा होता है कि एक ही लड्डू से पेट भर जाता है| भक्तों की कतार कभी वी आई पी की अलग से नहीं होती| अमिताभ बच्चन जैसी हस्ती भी आठ-आठ घंटे नंगे पाँव कतार में खड़े रहते हैं|किसी के लिए स्पेशल पूजा का विधान नहीं है| तभी तो तमाम अवरोधों के बावजूद मुम्बई मंगलमय है सबको लुभाती है|

प्रभादेवी से दादर रेलवे स्टेशन जाने वाले रास्ते में पुर्तगाली चर्च आता है| पुर्तगाली स्थापत्य का यह चर्च अपनी विशेष बनावट के लिए प्रसिद्ध है| यह पुर्तगालियों के समय से उनका प्रार्थना स्थल रहा है| आगे कबूतरखाना है| हज़ारों कबूतरों का चौराहे के बीचों बीच निर्धारित गोल घेरे में बैठना, पर्यटकों द्वारा डाले गये दाने चुगना, पँख फड़फड़ाना विशेष आकर्षण का केन्द्र है| यह गोल दायरा लोहे की फैंसिंग वाला है| कबूतर खाने के चारों रास्ते दिन भर बसों, टैक्सियों और पदयात्रियों से भरे रहते हैं लेकिन ये क़बूतर कभी किसी के लिए रूकावट नहीं बनते|

दादर में निर्मित हो रहा है अंबेडकर स्मारक

भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब भीमराव रामजी आंबेडकर की सवा सौवीं जयंती वर्ष के अवसर पर दादर के इंदु मिल परिसर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों ४२५ करोड़ रुपये लागत से देश के भव्यतम आंबेडकर स्मारक का भूमिपूजन भी सम्पन्न हुआ है| चैत्य भूमि जहाँ ६ दिसंबर को बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस पर उनकी भस्म और अन्य अवशेषों के दर्शन के लिए देश, विदेश के कोने-कोने से अनुयायी आते हैं| चैत्य भूमि वो जगह है जहाँ ६ दिसंबर १९५६ को उनकी पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हुई थी| इस दिन मुम्बई में तिल रखने को जगह नहीं मिलती| महाराष्ट्र सरकार बस, ट्रेन, लोकल ट्रेन में यत्रियों को बिना किसी यातायात शुल्क के चैत्य भूमि पहुँचाती है| चैत्य भूमि के निकट इंदु मिल कंपाउंड का ४.८ हेक्टेयर का प्लॉट जहाँ से बांद्रा वर्ली सी लिंक का विहंगम नज़ारा भी दिखेगा और चैत्य भूमि तक आने जाने का मार्ग भी इससे जोड़ा जायेगा|यहाँ १५० फीट ऊँची आंबेडकर की प्रतिमा होगी साथ ही बौद्ध चैत्यों की याद दिलाने वाला २४०० मीटर वर्ग फुट में फैला, ४० मीटर लम्बा और ८० मीटर व्यास का, २४ रिब्ड सीलिंग वाला स्तूप होगा|ऊपर बुद्ध केअष्ट मार्गों का आठ टियर का कांस्य मंडप और नीचे कमल के फूलों से भरी कृत्रिम झील होगी|३६८१ वर्ग मीटर क्षेत्र में वॉटरपूलके पास बनेगा म्यूज़ियम जिसमें बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन को दर्शाने वाली झाँकियाँ, दलितों के सशक्तिकरण, संघर्ष और संविधान और भावी पीढ़ियों को संदेश देती गैलरियाँ होंगी| होलोग्राफ़ से ऐसा आभास पैदा किया जायेगा मानो बाबासाहेब सामने खड़े भाषण दे रहे हैं| पुस्तकालय में एक ध्यान केन्द्र और पाँच हॉल होंगे|

बाबासाहेब आंबेडकर एलफिंस्टन रोड स्थित उस ज़माने के सरकारी हाई स्कूल में पहले दलित छात्र थे| ८ जुलाई १९४५ को उन्होंने पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की| फोर्ट स्थित बुद्ध भवन और आनंद भवन में १९ जून १९४६ को सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंस की स्थापना के साथ उन्होंने महाराष्ट्र में उच्च शिक्षा का नया अध्याय खोला| यहाँ उनका अस्थिकलश और पुस्तकों का बहुमूल्य संग्रह संकलित है| बुद्ध भवन के पुस्तकालय में अब केवल शोध छात्र ही आते हैं| लाइब्रेरियन ने मुझे बताया कि उनकी दान की गई पुस्तकें विभिन्न कॉलेजों और शिक्षा संस्थानों में रखी हैं| चौथी मंज़िल के जिस कमरे में वे रहते थे अब वह क्लासरूम है| पुस्तकालय में उनकी आरामकुर्सी भी रखी है जिस पर बैठकर उन्होंने संविधान के कई अध्याय लिखे|

आनंद भवन से थोड़ी ही दूर एक चायनीज़ रेस्टोरेंट है| एक ज़माने में यह ईरान कैफे ‘वेसाइड इन’ के रूप में बाबासाहेब की सबसे प्रिय जगह थी| खिड़की के पास वाले टेबिल पर उन्होंने कानूनी लेख अपनी कानून की किताब के लिये लिखे|वह खिड़की अब बंद कर दी गई है| मुम्बई उनका गृह नगर था| दादर की हिंदू कॉलोनी में छह दरवाज़ों वाले तीन मंज़िला“राजगृह” नमक बँगले में वे रहते थे| उनके निधन के बाद यह बँगला विवादों से घिर गया| अब वहाँ तल मंज़िल में उनके कुछ फोटो और भस्मी रखी है| हॉकर बँगले के ठीक पास अपने स्टॉल लगाते हैं और सामने की जगह को स्कूल की गाड़ियों ने घेरा हुआ है| हरे भरे राजगृह के आसपास के सारे दरख़्त कट जाने से बँगले को वीरानगी ने घेर लिया है|सीढ़ी से पहली मंज़िल की ऊँची सीलिंग व नक्काशीदार दरवाज़ों वाली बॉलकनी वाली स्टडी और वहाँ से घुमावदार सीढ़ियाँ उनके ख़ास कमरे की ओर जाती हैं जहाँ एक शो केस में उनकी किताबें रखी हैं|यहाँ वे १९३७ से रहे|उनकी आरामकुर्सी, पलंग, वार्डरोब, लिखने की टेबल आदि देखकर सिर श्रृद्धा से झुक गया| इन दो छोटे कमरों में रखे विज़िटर्स रजिस्टर में मैंने यूरोप और अमेरिका से आए आंबेडकर को मानने वाले लोगों के हस्ताक्षर के साथ ही श्रृद्धांजलियाँ भी लिखी थीं|बाबासाहेब ने राजगृह बनवाया ही इसलिए था कि पचास हज़ार से अधिक अपनी अमूल्य पुस्तकें सुरक्षित रख सकें| यहीं दादर स्टेशन के पास आंबेडकर प्रेस है|

दादर टर्मिनल तक पुराना मुम्बई है| फिर उपनगर शुरू हो जाते हैं| वृहत्तर मुम्बई बोरीवली तक है| बोरीवली से आगे ठाणे जिला शुरू हो जाता है|

नाटकों का बोलबाला था तब…..

मुम्बई मैं घूमने के लिए नहीं बल्कि यहीं बस जाने के लिएआई थी| जब जबलपुर में थी तो कच्ची उमर के मेरे लेखन में प्रौढ़ता नहीं थी|हालाँकि मेरी कहानियाँ तब भी बड़ी बड़ी पत्रिकाओं धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय, सारिका, कहानीआदि में प्रकाशित हुई हैं| लेकिन मेरे लेखन को प्रौढ़ता मुम्बई ने ही दी| मुझे पत्रकारिता के लिए ज़मीन भी मुम्बई ने ही दी| मुम्बई के फलक पर मेरे ढेरों दोस्त बने| आज मुम्बई का पूरा साहित्यिक वर्ग मेरा दोस्त है| नई पीढ़ी की युवा लेखिकाएँ मुझे अपना आदर्श मानती हैं और मैं उन्हें यथासंभव प्रमोट भी करती हूँ| आज ये सब मेरीअंतरंग सहेलियाँ हैं| मुम्बई ने मुझे जीना सिखाया, मुम्बई तुझे सलाम|

ग्राण्ट रोड स्टेशन पर लैमिंग्टन रोड के दूसरे बाजू नाना चौक है| वहीं गवालिया टैंक है| गवालिया टैंक के पीछे तेजपाल थियेटर है जहाँ ज़बरदस्त नाटक खेले जाते हैं| जबलपुर में शहीद स्मारक में हुए कई नाटकों की ताज़ा स्मृति लिए जब मैंने मुम्बई के नाट्य मंच को नज़दीक से देखा तो पाया कि यहाँ तो नाटकों का एक पूरा बड़ा दर्शक वर्ग है| तेजपाल थियेटर में मैंने गिरीश करनाड का तुगलक और सत्यदेव दुबे का हयवदन सबसे पहले देखा, दोनों ही नाटक मेरे दिमाग़ पर छा गये| अमोल पालेकर और सुलभा देशपाँडे की मैं दीवानी हो गई| तब पँद्रह बीस दिन में एक नाटक देखना मेरी ज़रुरत बन गई| पूरे शहर में यही एक ऐसी जगह थी जहाँ देश विदेश की अन्य नाट्य कृतियाँ जो थीं तो अपरिपक्व लेकिन मँजे हुए कलाकारों के ज़रिए दर्शकों के एक वफ़ादार वर्ग तक पहुँचती थीं| तेजपालमेंनियमित रूप से जाने के बाद मैं वहाँ के कलाकारों के साथ-साथ दर्शकों को भी पहचानने लगी थी और चाय के स्टॉल या इन्टरवल में हॉल से बाहर आते ही हलो हाय होने लगती थी, भले ही उनके नामों से मैं अपरिचित थी|सत्यदेव दुबे अक्सर शो से पहले पैंट पर कुरता पहने बाहर चाय स्टॉल पर बेचैनी से चक्कर मारते नज़र आते थे| कन्नड़ नाटक ‘सुनो जनमेजय’ में उनकी भूमिका लाजवाबथी| उनके नाटकों के दूसरे किरदार जो मेरी नज़र में फिल्मी सितारों से कम नहीं थे कभी-कभी ग्रीन रूम के बंद दरवाज़ों से बाहर झाँकते थे| अमरीशपुरी, अलकनन्दा समर्थ, सुलभा देशपांडे और बाद में भक्तिलता बर्वे और अमोल पालेकर मेरे टीनएजर मन में घुसपैठ किये हुए थे| ‘आधे अधूरे’ मुम्बई में जब खेला गया तो भक्तिलता बर्वे पहली बार फ्रॉक पहने दिखाई दी थीं और उनके भाई थे अमोल पालेकर जबकि पुरुष की चार भूमिकाओं में अमरीशपुरी ने जी जान लगा दी थी|हॉल में हिन्दी उर्दू की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ मिलतीं| जबलपुर में जिन्हें पढ़ती थी….. बल्कि पढ़-पढ़कर १९ साल की हुई वो सलमा सिद्धीकी, इस्मत आपा (चुग़ताई) विजय तेंदुलकर जिनके साथ कभी-कभी उनकी बेटी भी रहती थी|लम्बे क़द के गिरीश करनाड जिनका नया नाटक तुग़लक अँग्रेज़ी दुनिया के सुपरिचित कलाकार कबीर बेदी द्वारा मुख्य भूमिका में खेला जाने वाला था| यहीं मिले थे राही मासूम रज़ा| जिनकी जेब में नीला मखमली बटुवा होता था| बटुवे में सुपारी और चाँदी के घुँघरू लगा सरौता रहता| वे जब सुपारी काटते तो घुँघरू छुनछुन की आवाज़ करते|एक ही पल में सब जान जाते कि सुपारी कट रही है और सबको मिलने वाली है| उन दिनों मुम्बई कला जगत से जुड़ा एक कलात्मक रचनात्मक शहर था| उन दिनों नाटक आम दर्शकों की पहुँच में थे| अब नाटकों में रूचि लेने वाला दर्शक ख़ास हो गया है| और उसे मंच पर आसीन करने वाले इलाके अभिजात्य वर्ग के हो गये हैं| जुहू में पृथ्वी थियेटर और बांद्रा में रंग शारदा का मंच नई-नई प्रतिभाओं को बाक़ायदा अपनी कला प्रदर्शित करने का मौका देता है| नई प्रतिभाएँ पूरे जोश में अपने-अपने संगठन बना रही हैं| नादिरा बब्बर की एकजुट संस्था कई अच्छे नाटक प्रस्तुत कर चुकी है| अब नुक्कड़ नाटक भी पूरे जोशोख़रोश से खेले जा रहे हैं| धीरे-धीरे स्टेटस सिंबल बनी नाटकों की दुनिया मुम्बई में अँगड़ाई लेकर उठ खड़ी हुई है|

मुम्बई में कई दशक पहले पारसी थियेटर भी हुआ करते थे| वहाँ उर्दू का ज़्यादा बोलबाला था क्योंकि पारसी अभिनेत्रियों को हिन्दी सिखाने वाले शिक्षक उर्दू मिश्रित हिन्दी बोलते थे| ऐसे संवाद सुनने वालों का मन मोह लेते थे| वैसे देखा जाए तो पारसी रंगमंच उन्नीसवीं शताब्दी के ब्रिटिश रंगमंच के मॉडल  पर आधारित था| पारसी कलाकारों ने रंगमंच की पूरी टेक्नीक ब्रिटेनसे मँगाई थी| इसमें प्रोसेनियम स्टेज से लेकर बैक स्टेज की जटिल मशीनरी भी थी| लेकिन लोकरंग, मंच,गीतों, नृत्यों, परम्परागत लोक हास-परिहास के कुछ आवश्यक तत्वों और इनके प्रारंभ तथा अंत की रवायतों को पारसी रंगमंच ने अपनी कथाकहने की शैली में शामिल कर लिया था| १ मार्च १८५३ में पारसी व्यवसायिक रंगमंच कम्पनियों ने एक मराठी नाटक खेला|पारसी थ्रियेटिकल कम्पनी को रंगमंचीय नाटक कम्पनी के नाम से जाना जाता है| आरंभ में यानी बीसवीं सदी के आरंभ तक पारसी कम्पनियाँ घूम-घूम कर नाटक खेला करती थीं| जब फिल्मों का दौर चला….. पारसी थ्रियेटिकल कम्पनियों का व्यवसाय मन्द पड़ने लगा और एक नई कम्पनी खुली पृथ्वी थियेटर….. जो पृथ्वीराज कपूर की चाह का परिणाम थी| पारसी ओरिजिनल थ्रियेटिकल कम्पनी ने चाँद बीवी, शीरी फरहाद, अलीबाबा, लैला मजनूं, हुस्न अफ़रोज़ आदि नाटकों से दर्शक बटोरे|मुहम्मद आगा हश्र, मुंशी नारायण प्रसाद बेताब, राधेश्याम कथावाचक ने पारसी रंगमंच की एक नई धारा का सूत्रपात किया| बाद में जब फिल्में लोकप्रिय होने लगीं तो पृथ्वी थियेटर के कई कलाकार फिल्मों में चले गये|यही  वजह थी कि पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी आदि फिल्मों में भी थ्रियेटिकल अंदाज़ में संवाद अदायगी करते थे|

अब जब पृथ्वी थियेटर की बात चली है तो एक नज़र पृथ्वीराज कपूर के जुनून पर भी डाल लेना मुनासिब होगा| पृथ्वी थियेटर देश के उन सबसे पुराने थियेटरों में है जिनका सम्बन्ध किसी सिनेमा परिवार से हो| कपूर परिवार को इस बात का पूरा श्रेय भी दिया जायेगा कि तमाम पॉपुलर कल्चर माध्यमों को तरजीह देने वाली युवा पीढ़ी आज भी यहाँ हिन्दी, अँग्रेज़ी, गुजराती और मराठी नाटकों का लुत्फ़ उठाने जाती है|पृथ्वीराज कपूर ने साल १९४४ में इस थियेटर की स्थापना एक मूविंग थियेटर के फॉर्म में की थी जो देश के कोने-कोने में घूमकर थियेटर किया करते थे और रंगमंच को बढ़ावा देते थे|उन्होंने मूविंग थियेटर में पहला नाटक खेला‘ अभिज्ञान शाकुंतलम’| जो उन दिनों दर्शकों में काफी लोकप्रिय हुआ| पृथ्वीराज कपूर की मृत्यु के बाद उनके बेटे शशिकपूर और बहू जेनिफर कपूर ने इस कारवां को आगे बढ़ाया और पृथ्वीराज मेमोरियल ट्रस्ट और रिसर्च फाउंडेशन नाम से एक संस्था की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दी थियेटर को बढ़ावा देना था| जुहू में बाक़ायदा पृथ्वी थियेटरकी स्थापना कर पृथ्वीराज कपूर के उस सपने को शशि कपूर और जेनिफर कपूर ने पूरा किया जो वे जुहू की उस ज़मीन पर पलता पनपता देखना चाहते थे जिसकी लीज़ उनकी मृत्यु के साथ ही ख़त्म हो गई थी| १५ नवम्बर १९७८ को पृथ्वी थियेटर में पहला हिन्दी नाटक खेला गया जिसका निर्देशन एम. एस. सत्थू ने किया|नसीरुद्दीन शाह, बेंजामिन गिलानी और ओमपुरी द्वारा अभिनीत इस नाटक को इंडियन पीपुल थियेटर एसोसिएशन ने ‘मंझे’ नाम से आगे बढ़ाया|पृथ्वी थियेटर की जुहू में स्थापना हिन्दी थियेटर प्रेमियों के लिए बहुत बड़ी बात थी क्योंकि ठीक इसी समय दादर मराठी थिएटर जगत का और दक्षिण मुम्बई अंग्रेज़ी थिएटर जगत के लिए आदर्श स्थान माने जाते थे| सन् १९९३ में इस नाट्य समूह,कोजो पृथ्वी थियेटर नाम दिया गयाथा अब शशिकपूर की बढ़ती उम्र और अस्वस्थता की वजह से उनके बेटे कुणाल कपूर और बेटी संजना कपूर ने जिसकी बागडोर सम्हाल ली है|वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहाँ मुम्बई अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषा के नाटकों के लिए जाना जाता है। ठीक उसी समय यानी कि सन् २०१०में गीतकार स्वानंद किरकिरे का खांटी हिन्दी नाटक ‘आओ साथी सपना देखें’ और‘चाँदनी चौक की चाँदनी’ दर्शकों को बरबस अपनी ओर खींच लेने में सफल हो जाता है| पृथ्वी थियेटर की या पृथ्वीराज कपूर के सपनों की यही परिणति है|

आईडियल ड्रामा एंड इंटरटेनमेंट एकेडमी के मुजीब ख़ान ने केवल प्रेमचंद की कहानियों पर ही नाटक करने की ठानी है| उनके साहित्य को समर्पित मुम्बई ही नहीं बल्कि पूरे भारत की यह एकमात्र नाटक अकादमी ‘आदाब, मैं प्रेमचंद हूँ’ सीरीज़ के तहत २००५ से अब तक मुंशी प्रेमचंद की सभी कथाओं पर नाटकों का मंचन कर के लिम्का बुक में नाम दर्ज़ कराते हुए अब विश्व रिकॉर्ड की ओर अग्रसर है|’प्रेम उत्सव’ नाम से भी इनकी नाट्य श्रृँखला चल रही है| हिन्दी उर्दू की नई पीढ़ी में मुंशी प्रेमचंद के आदर्शों पर अमल करने की सोच जगाने के उद्देश्य से यह नाट्य अकादमी मुम्बई के स्कूलों में जा-जाकर उनकी कहानियों पर आधारित नाटक दिखाया करती है|

मुम्बई में पचास के दशक में मराठी नाटकों का बोलबाला था साथ ही मराठी, अंग्रेज़ी और गुजराती भाषाओँ के नाटक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहे थे| गुजराती नाटक पारसी थियेटर शैली के हास परिहास और पौराणिक कथानक की परंपरा से बाहर आ रहे थे|अँग्रेज़ी नाटक अपने इकहरे यथार्थवाद से बाहर निकल रहा था| कुल मिलाकर मुम्बई नाट्य परिवर्तनकारी क्रांति से गुज़र रहा था| स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में मुम्बई में मिल मज़दूरों के लिए एक विशेष किस्म का कामगार नाटक भी मराठी में होता था और परेल का दामोदर हॉल ऐसी गतिविधियों का केन्द्र था| मध्यवर्गी मराठी बहुल इलाके गिरगाँव में साहित्य संघ मंदिर का सभागार अस्तित्व में आया| मामावरेरकर, आत्माराम भेंडे, डॉ. भटकल जैसे रंगकर्मी और रंगचिंतक नाटकों को परंपरागत औपचारिकताओं से मुक्त करने में लगे थे| लिहाज़ा नाटकों का मंचन थियेटर से उठकर खुली छत, प्रांगण, नुक्कड़ कहीं भी होने लगा |रेडियो नाटक के रूप में भी नाटकों ने कई मोड़ लिए|

स्वतंत्रता के बाद का पहला महत्त्वपूर्ण मराठी नाटक रत्नाकर मतकरी का ‘वेडी माणसे’ १९५५ में आकाशवाणी मुम्बई ने प्रस्तुत किया| भालचंद्र पेंढारकर के अत्यंत लोकप्रिय नाटक ‘रितांचे तिमिर जावो’ का पहला शो १९५७ में गिरगाँव के साहित्य संघ मंदिर में हुआ| मुम्बई में एक तरफ़ हिंदी और उर्दू में वामपंथी विचारधारा से जुड़ा इप्टा का प्रतिबद्ध थियेटर था तो दूसरी तरफ़ पचास के दशक में मार्क्सवादी प्रभाव को रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी ने बहुभाषी इंडियन नेशनल थियेटर खड़ा किया था| एलफिंस्टन कॉलेज मराठी नाट्यकला का केन्द्र था| युवा रंगकर्मियों के मार्गदर्शन के लिए भालचंद्र पेंढारकर और चिंतामणि गणेश कोल्हटकर वहाँ जाते थे| उधर सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज अंग्रेज़ी नाटकों का केन्द्र था| आधुनिक भारतीय नाटक के पितामह कहे जाने वाले इब्राहिम अल्काजी ने मुम्बई में थियेटर यूनिट नामक ग्रुप की स्थापना की और नाटक को जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के दायरे से बाहर निकाला|अल्का जी से प्रभावित होकर विजया मेहता ने विजय तेंडुलकर, अरविंद देशपांडे और श्रीराम लागू के साथ मिलकर मुम्बई में रंगायन थियेटर ग्रुपबनाया तथा मराठी रंगमंच पर पहली बार बर्तोल्त ब्रेख़्तके नाटक ‘काकेशियन चॉक सर्कल’ तथा आयनेस्को के नाटक ‘चेयर’ को मंचित किया|

वह दौर मुम्बई के रंगकर्म का स्वर्णकाल था| भारतीय जननाट्य संघ इप्टा यानी इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन जो पूरे भारत में एक आंदोलन के रूप में उभरा,उसकी स्थापना मुम्बई में २५ मई १९४३ को हुई| मारवाड़ी हॉल में प्रो. हीरेन मुखर्जी की अध्यक्षता में इप्टा की स्थापना का भव्य समारोह हुआ| इप्टा का नामकरण मशहूर वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया थाऔरनारा था “पीपुल्स थियेटर स्टार्स पीपुल|” उस दौर में नाटक, संगीत, चित्रकला, लेखन, संस्कृतिकर्मी शायद ही कोई ऐसा होगा जो इप्टा से नहीं जुड़ा होगा| लेकिन इप्टा पूरी तरह से मुम्बई में २० जनवरी १९५२ में अस्तित्व मेंआया, जब ललित कलाएँ, काव्य, नाटक, गीत, पारंपरिक नाट्य रूप में पारंगत कलाकार जो मुम्बई के ही थे इस संस्था से जुड़ते गये| उस समय बॉलीवुड में प्रवेश का रास्ता नाट्य मंडली से होकर ही था|इप्टा ने कई चर्चित कलाकार दिए| बलराज साहनी, दीना पाठक, संजीव कुमार, शबाना आज़मी, ए. के. हंगल, पृथ्वीराज कपूर, नसीरुद्दीन शाह जैसे संजीदा अभिनेता, क़ैफ़ीआज़मी, अली सरदार ज़ाफ़री, साहिर लुधियानवी, फैज़ अहमदफैज़, शैलेन्द्रजैसेगीतकार, ख़्वाजा अहमद अब्बास, इस्मत चुग़ताई जैसे लेखक, रामकिंजर बैज जैसे चित्रकार, के. ए. अब्बास जैसे निर्देशक, हबीब तनवीर आदि नामों की सूची लम्बी है लेकिन मुम्बई ऐसे कलाकारों से समृद्ध था|

इप्टा भारत के विभिन्न शहरों में भी काम कर रही है|

मुम्बई में इटीएफ(दि एक्सपेरिमेन्टल थियेटर फाउंडेशन)एक रंग आंदोलन के रूप में उभरा जिसके प्रणेता मंजुल भारद्वाज हैं| थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस इटीएफ़ का दर्शन है जो अन्य नाट्य संस्थाओं से अलग हटकर सहभागियों को मंच नाटक और जीवन का सम्बन्ध, नाट्य लेखन, अभिनय, निर्देशन, समीक्षा, नेपथ्य, रंगशिल्प, रंगभूषा आदि विभिन्न रंग आयामों को प्रदान करता है, प्रशिक्षित करता है| स्कूलों, बस्तियों, गाँवों, कस्बों, उपनगरों और नुक्कड़ों पर यह संस्था नाटक करती है| मुम्बई में अवितोको नाट्य संस्था भी है| फ़र्क़ यह है कि जहाँ इटीएफ़ के नाटक मौलिक होते हैं वहीं अवितोको के नाटक कहानियों का नाट्य रूपान्तर होते हैं|

एक यूनानी मिथक है कि फिनिक्स पक्षी अपनी राख से दोबारा जन्म लेता है पर शायद अपने नए रूप में वह पिछले जन्म जैसा नहीं होता| एक ज़माना था जब मुम्बई के प्रायः सभी प्रमुख चौराहों पर ईरानी होटल थे| सफेद संगमरमर के टेबल टॉप पर बेतहाशा स्वादिष्ट ईरानी चाय, खारी बिस्किट और बन मस्का केऑर्डरदिये जाते थे तो रेस्तरां गुलज़ार हो उठता था नाट्यकर्मियों, फिल्मी कलाकारों, लेखकों से और छिड़ जाती थी अंतहीन चर्चा कला, विचार, फलसफ़े, मुहब्बत, याराने, ताने उलाहने, शिकवा शिकायतें, मिलने बिछुड़ने का संघर्ष, यूटोपिया और सपनों की एक अनोखी संस्कृति जिसे रचा गया था इन्हीं रेस्तरां में मिल बैठकर| चर्चगेट स्टेशन के सामने आज जहाँ एशियाटिक डिपार्टमेंटल स्टोर है वहाँ ईरानी रेस्तरां था|प्रसिद्ध फिल्मकार एम. एस. सथ्यू बताते हैं- “एक शाम इस रेस्तरां में नाटककार सत्यदेव दुबे एक गपशप में प्रगतिशील और वामपंथियों की खूब बखिया उधेड़ रहे थे| वे वहाँ मौजूद हर किसी पर भारी पड़ रहे थे| उसी समय ऑपेरा हाउस के पास ज्योति स्टूडियो में बलराज साहनी किसी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे| उन्हें किसी ने खबर कर दी इस बात की| उन्होंने तुरन्त मोटर साईकल उठाई और दस मिनट में वहाँ पहुँच गये| इस तरह अचानक बलराज साहनी को सामने देख सत्यदेव दुबे सकपका गये|

यह खूबसूरत माहौल तब मुम्बई को एक जोश भरी जादुई दुनिया का अंदाज़ देता था| लगताहै जैसे वह जादुई दुनिया कहीं खो गई है औरमुम्बईकेवल कुछ सिरफिरों, शायरों, कलाकारों, दीवानों, दरवेशों और स्वप्नजीवियों के अंदर ही बचा रह गया है जिसे वे हर लम्हा अपनी शिराओं में जीते हैं|

नाना चौक स्थित गवालिया टैंक से ही ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ आंदोलन की शुरुआत हुई थी| गाँधीजी ने इस आँदोलन से भारतीय सैनिकों को द्वितीय विश्व युद्ध में भेजे जाने का विरोध किया था| यहीं है ग्रांटरोड रेलवेस्टेशन|

जिस्म का बाज़ार कमाठीपुरा…..

ग्रांटरोड स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर के फासले पर है कमाठीपुरा| मुम्बई में कमाठीपुरा दो तरह से जाना जाता है| मराठी के मशहूर लेखक जिन्होंने दलित पैंथर जैसे क्रन्तिकारी संगठन की स्थापना की कमाठीपुरा में ही पैदा हुए और वे थे नामदेव ढसाल|नामदेव ढसाल महार जाति के थे और उनके माता पिता कमाठीपुरा स्थित छोटे से बीड़ी कारखाने में श्रमिक थे| उनका काव्य संग्रह ‘गोलपीठा’ जबरदस्त चर्चा का विषय था|‘गोलपीठा’ में उन्होंने कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया की दिल दहला देने वाली सच्चाइयों का वर्णन किया है| कमाठीपुरा जिसे ब्रिटिशकाल में व्हाइट ज़ोन (यूरोपीय नस्ल की वेश्याओं के कारण) कहा जाता था में एक तरह की अन्तरराष्ट्रीयता विद्यमान थी |अँग्रेज़ तो चले गये पर उनका बसाया कमाठीपुरा आज भी वैसा ही है जहाँ देश के सभी इलाकों की औरतें जिस्म का सौदा करती हैं| यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा जिस्म बाज़ार है जहाँ सभ्यता का यह सबसे पुराना कारोबार दिन रात चलता है| जिस्मके इस बाज़ार में हिजड़े, पुलिस, ड्रग एडिक्ट, सुपारी किलर और सिंगर, मुज़रा डाँसर, महाराष्ट्र के लोक नृत्य तमाशा कलाकार आदि का जमावड़ा रहता है| अस्सी के दशक में यहाँ हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहीम जैसे अंडरवर्ल्ड के लोग भी आया करते थे|

कमाठीपुरा मराठी का नहीं बल्कि तेलुगु का शब्द है जिसका अर्थ है मज़दूर क्षेत्र| १७९५ में मराठा सैनिकों ने हैदराबाद के निज़ाम को पराजित कर दिया था| इस विजय ने उन्हें अपार धन बल के साथी कमाठी के रूप में अपार जन बल भी मुहैया कराया| मराठाकालीन राजसी इमारतों के निर्माण में ये मज़दूर एवं राजमिस्त्री बड़े काम के साबित हुए| मज़दूरों को बसाए जाने की वजह से यह इलाका कमाठीपुरा कहलाने लगा| वक़्त कहाँ रुकता है? अब मज़दूर तो रहे नहीं रह गईं जिस्म का सौदा करने वाली मजबूर औरतें जो इस भयानक ग़रीबइलाके में पाउडर क्रीम से चेहरा पोतकर ग्राहकों का इंतज़ार करती हैं और विडंबना ये है कि उनके लिए ग्राहक लाने वाले दलालों में उनके बाप, बेटा, भाई, देवर या पति भी शामिल हैं| सन् १९५० में भारत सरकार ने जब यौन व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया, उस समय यहाँ के २०० से ज़्यादा घरों में ५००० से अधिक पेशा करने वाली औरतें रहती थीं….. उनके घरों के चूल्हे ठंडे थे और पेट की आग भड़की हुई| लेकिन सवाल अधर में लटका था कि इनका क्या होगा? यहाँ दर्जनों स्वैच्छिक संगठन हैं जो इनके इलाज आदि मुफ़्त में करते हैं| सुनील दत्त जब तक जीवित रहे रक्षाबंधन के दिन इनसे राखी बँधवाने आते थे और इनकी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करते थे| तमाम प्रयासों और सरकारी प्रतिबन्धों के बावजूद कमाठीपुरा आज भी आबाद है|


नाना चौक से एक रास्ता कम्बाला हिल जाता है| कम्बाला हिल एरिया में अगस्त क्रान्ति मैदान है| अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करने वाली क्रान्ति का साक्षी अगस्त क्रान्ति मैदान|जहाँ अब कम्बाला हिल पैडर रोड में निर्मित सेन्ट स्टीवन चर्च गुड फ्रायडे मनाता है|यहीं पे कम्बाला हिल हॉस्पिटल एण्ड हार्ट इंस्टिट्यूट है| प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना सितारा देवी का इसी अस्पताल में लम्बी बीमारी के बाद निधन हुआ था| मेरी उनसे आख़िरी मुलाक़ात नेहरु सेंटर में तब हुई थी जब ग़ालिब के कलाम पे नृत्य नाटिका आयोजित हुई थी|कहाँ तो साठ से भी ज़्यादा दशकों तक वे मंचों पर कत्थक की शानदार प्रस्तुति करती रहीं यहाँ तक कि बॉलीवुड में इस नृत्य शैली को लाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है और कहाँ वे व्हील चेयर पर बैठी नृत्य नाटिका देख रही थीं| ग्यारह साल की उम्र में मुम्बई आकर बस जाने वाली सितारा देवी ने स्वर्णिम काल जिया है अपने नृत्यों के ज़रिए|

कम्बाला हिल स्थित खुले टेरेस पे नटरंग प्रतिष्ठान के इब्राहिम अलकाजी ने धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ के अभूतपूर्व बारह प्रस्तुतिकरण किये| अलका जी पूरे देश में नुक्कड़ नाटकों और नाटकों के नये ढंग से प्रस्तुतिकरण के लिए जाने जाते हैं|

नाना चौक, ग्रान्ट रोड से ताड़देव, भाटिया अस्पताल, एसी मार्केट होते हुए यह रास्ता भी महालक्ष्मी में खुलता है और कम्बाला हिल पैडर रोड वाला रास्ता भी महालक्ष्मी तक जाकर वर्ली रोड कहलाने लगता है और नाना चौक से ही ग्रांट रोड पूर्व का पुल पार करते ही दाहिनी ओर ऑपेरा हाउस और बाईं ओर मुम्बई सेंट्रल आता है|

भारत का एकमात्र ऑपेरा हाउस…..

ऑपेरा हाउस मरीन लाइन्स रेलवे स्टेशन के सामने है| द रॉयल ऑपेरा हाउस नाम से जाना जाने वाला यह भारत का एकमात्र ऑपेरा हाउस है जिसका निर्माण १९०९ में अंग्रेज़ों के शासनकाल में हुआ| जब जॉर्ज पंचम १९११ में मुम्बई आये तो इसका उद्घाटन उनके हाथों हुआ था| हालाँकि यह पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ १९१५ में |यह भारतीय और यूरोपियन स्थापत्य कला बारोक शैली का मिला जुला प्रतिरूप है साथ ही कोलकाता के वास्तु शिल्पी मौरिस बैंडमेन और जहाँ गीरफ्रेम जी करारा की भी इसके निर्माण में अहम भूमिका है| इसका मुख्य डोम आठ भागों में बँटा है| हर एक भाग थियेटर, साहित्य, संगीत और चित्रकला से जुड़े लोगों को अलग-अलग रूप से समर्पित है| जॉर्ज पंचम के द्वारा उद्घाटन होने के कारण इसका नाम ऑपेरा हाउस से द रॉयल ऑपेरा हाउस रख दिया गया और पहला शो अमेरिकन जादूगर रेमंड का हुआ| बाद मेंजब हिन्दी फिल्में ऊँचाईयाँ छूने लगीं तो उनके प्रीमियर शो यहाँ होने लगे| इसके अलावा ऑपेरा और नाटक भी खेले जाने लगे| बालगंधर्व और पृथ्वीराज जैसे कलाकारों की जब प्रस्तुतियाँ होती थीं तो मुम्बई का कला जगत रोमाँच की दुनिया से गुज़रता था और यहाँ उमड़ पड़ता था| जिसकी वजह से रॉयल ऑपेरा हाउस मील का स्तंभ बनता जा रहा था|

रॉयल ऑपेरा हाउस अब पूरी तरह पुनरुद्धार की दिशा में है| जबकि एक ज़माना था जब ऑपेरा हाउस मुम्बई की शान, पहचान था| १९३५ से यहाँ फिल्में दिखाई जाने लगी थीं, फैशन शो भी होते थे|धीरे-धीरे मुम्बई परिवर्तन के दौर से गुज़रने लगा| कई स्क्रीन वाले थियेटर बन गए….. मॉल संस्कृति सिर उठाने लगी और ऑपेरा हाउस की चमक फीकी पड़ने लगी और १९८० में इसे बंद कर दिया गया|एक क़दम १९९३ में काठियावाड़ी फैशन शो को आयोजित करके उठाया गया लेकिन वह अंतिम शो सिद्ध हुआ| सन् २०१२ में इसे विश्व स्मारक निगरानी सूची में शामिल कर लिया गया |जबकि २००१में इसे धरोहर इमारत घोषित किया गया था| नब्बे के दशक में ऑपेरा हाउस गोंदालवंश के शाही परिवार का हो गया था| जिसे ९९९ साल की लीज़ पर उन्होंने अपने अधिकार में कर लिया था| वे इसके पुनर्निर्माण की योजनाओं में मुब्तिला हैं| बहरहाल ऑपेरा हाउस इलाके में जाने पर इमारत लोहे  के मोटे तारों से बँधी और नीले पतरे से घिरी अपने पुनरुद्धार की याचना सी करती नज़र आती है| जब मैं बिरला पब्लिक स्कूल वालकेश्वर में पढ़ाती थी तो कितनी ही बार ऑपेरा हाउस के सामने बस स्टॉप पर बस के इंतज़ार में खड़ी अपलक इसे निहारा करती थी| क्या ज़माना रहा होगा जब यह कला प्रेमियों की चहल-पहल से भरा रहता होगा| आज मानो वह स्वयं अपने अतीत को मुझसे कहना चाहता है| कहना चाहता है कि इस नश्वर दुनिया में चाहे इंसान हो या इमारत सबका यही अंत है|

सात सौ इकतीस घाट हैं धोबी तालाब में

मरीन लाइन्स और चर्नीरोड के बीच में यदि पैदल चला जाए तो धोबी तालाब इलाके में मिलेगा परिदृश्य प्रकाशन जो विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का मशहूर बिक्री केन्द्र है|पहले यहाँ से पुस्तकें भी प्रकाशित होती थीं|मैंने मुम्बई के कथाकारों की सांप्रदायिक दंगे और विभाजन पर आधारित कहानियों की पुस्तक संपादित की थी ‘नहीं, अब और नहीं’ यह पुस्तक परिदृश्य प्रकाशनसे प्रकाशित हुई और बहुत अधिक चर्चित भी हुई|

यह पूरा इलाका यानी चर्नी रोड, मरीन लाइंस और महालक्ष्मी रेलवेस्टेशनों तक अतीत बहुत लुभाता है| रोमाँचित हूँ| उतर रही हूँ सवा सौ साल पहले के धोबी तालाब के उस गौरवशाली इतिहास में जहाँ स्थित स्मॉल कॉज़कोर्ट में गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटकर अपना पहला मुक़दमा लड़ा था| इस मुक़दमे के बारे में गाँधीजी अपनी आत्मकथा माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ में लिखते हैं- “मुझे पहला मुक़दमा मिला ममीबाई का जिसमें मुझे तीस रुपए फीस मिली| मुक़दमा पहले ही दिन ख़तम हो गया|मैं खड़ी हूँ कोर्ट के सामने| देख रही हूँ पत्थरों से बनी चार मंज़िल की इमारत जो १९१८ में पूरी तरह बनकर तैयार हुई और जिस पर ग्यारह लाख का ख़र्च आया|लम्बेचौड़े कोर्ट रूम्ज़, चौड़े-चौड़े कॉरिडोर, घुमावदार सीढ़ियाँ, गोल काउंटर्स, पुराने ज़माने की लिफ़्ट्स….. वक़्त के सितम सहकर भी इस इमारत की बुलंदी में कोई फ़र्क़ नहीं आया| वही शान, वही सुंदरता….. जो पहले थी वो अब भी है| हाँ, इमारत का पिछला हिस्सा थोड़ा कमज़ोर निकला| जगह-जगह से झाँकती दरारों में घास फूस उग आई है….. लेकिन सरकार इसकी मरम्मत के लिए कटिबद्ध है|

धोबी तालाब एरिया महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन के नज़दीक है|यहाँ एशिया का सबसे बड़ा धोबी तालाब है इसलिएइस पूरे इलाके का नाम धोबी तालाब पड़ा| मुम्बई आने वाले विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं धोबी तालाब |वे इसे एक अजूबे की तरह देखते हैं| यहाँ बीस हज़ार वर्ग फुट एरिया में कपड़ों की धुलाई होती है| इसी तालाब से सटे तीस से चालीस हज़ार वर्गफुट एरिया में कपड़ों को सुखाया जाता है| धोबी तालाब में कुल ७३१ (सात सौ इकतीस) घाटहैं जहाँ आज भी परंपरागत तरीके से कपड़ों को धोया जाता है| मुम्बई में धोबियों का बड़ा संगठन कपड़ों को धोने, सुखाने, प्रेस करने और पुराने कपड़ों को रंगकर नया रूप देने का काम इस प्लेटफार्म में करता है| क़रीब दस हज़ार से ज़्यादा धोबी इस कारोबार में लगे हैं जो नज़दीक के स्लम एरिया में रहते हैं|

मुम्बई के आकर्षण का केन्द्र डब्बावाला

मुम्बई में एक और विशिष्ट आकर्षण का केन्द्र है ठीक धोबी घाट की तरह ही डिब्बावाला एसोसिएशन| जब मेरा मुम्बई में पदार्पण हुआ और आर टी वी सी में मेरा कॉपी राईटिंग का काम शुरू हुआ तो मैं रोज़ ही देखती….. सफेद कपड़ों में डिब्बावाला एक जैसे टिफ़िन सबको पकड़ा कर चला जाता|उन एक जैसे टिफिन कैरियर में लाल अक्षरों में नम्बर अंकित होते| वही लाल नंबर पहचान थे उन टिफिन कैरियर के मालिकों के|जिन्हें लँच के समय खोलकर सब अपने-अपने घरों के खाने का आनंद लेते थे|

अभी पिछले दिनों लँच बॉक्स फिल्म देखी जो इन्हीं डिब्बावालों के इर्द गिर्द घूमती है| इस बेहतरीन फिल्म ने जहाँ एक ओर मुझे डिब्बावालों को अच्छी तरह से समझने, जानने को मजबूर किया वहीं दूसरी ओर यह सच्चाई भी सामने आई कि मुम्बई जिस तेज़ी से विकास की मंज़िलें तय कर रहा है….. इस तेज़ रफ़्तार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी को ज़रूरी मानने वाले इस युग में मुम्बई के डिब्बावाला एसोसिएशन अपने अस्तित्वके लिए ख़तरा मानते हैं|

सुबह नौ बजे से लोकल के लगेज कम्पार्टमेंट में एल्यूमीनियम के डिब्बे तरतीब से रखे मिलेंगे लम्बे चौड़े हाथ ठेलों में| इन ठेलों के पहिए हैं वे पाँच हज़ार कर्मचारी जो इन डिब्बों में रखे दोपहर के भोजन (लंच) को मुम्बई के विभिन्न कार्यालयों में तेरह लाख लोगों तक पहुँचाते हैं|चाहे चटख़ धूप हो, तेज़ हवाएँ हों, मूसलाधार बारिश हो इनके काम में कभी रूकावट नहीं आती| सुबह सबेरे ये घरों से टिफिन इकट्ठा कर इन एल्यूमीनियम के डिब्बों में रखकर लोकल ट्रेन के द्वारा इस भोजन के असल हक़दार तक इसे पहुँचा देते हैं| ऊपर से एक सरीखे दिखने वाले डिब्बे लेकिन मज़ाल है कि कोई टिफिन किसी और को पहुँच जाये? मुम्बई में कार्यरत यह डिब्बावाला एसोसिएशन जो पूरे देश में एकमात्र एसोसिएशन है| वर्ष १८९० में तीस व्यक्तियों से शुरू हुए इस एसोसिएशन की सफलता का राज़ है पाँच हज़ार कर्मचारियों की निष्ठा, परिश्रम तथा ईमानदारी| सफेद पायज़ामा, सफेद कमीज़ और सफ़ेद टोपी इनकी यूनिफॉर्म है| इनमें से ८५ प्रतिशत अनपढ़ हैं और १५ प्रतिशत केवल आठवीं पास हैं|

विश्व के कई देशों में डिब्बावाला एसोसिएशन पर खोज चल रही है इनके प्रबन्धन कार्य पर और इस बात पर कि क्या कारण है कि विश्व स्तरीय अवार्ड जीतने वाले डिब्बावाले मुम्बई से बाहर अपनी सेवाओं को चालू नहीं कर पा रहे हैं| डिब्बावाला कर्मचारियों के कदम १२० साल के इतिहास में पहली बार तब रुके जब ये गाँधीवादीअन्ना हज़ारे के आंदोलन में शामिल हुए और हड़ताल पर बैठ गये| उस दिन मुम्बई भूखी रही|

१८ जनवरी २००८ में ये डिब्बावाले एशिया की सबसे बड़ी स्टैंडर्ड चार्टर्ड मुम्बई मेराथन में शामिल हुए| उन्हें सम्मान देने के लिए इसका ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया और होर्डिंग्स लगाए गये| अब यह आयोजन प्रतिवर्ष होता है| दुबई में ५ जून को आयोजित गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के सम्मेलन में मुम्बई के डिब्बावाला एसोसिएशन की सफ़लता के मंत्र को समझने की कोशिश की गई| नूतन मुम्बई टिफिन बॉक्स सप्लायर्स ट्रस्ट के प्रवक्ता अरविंद तालेकर ने मुम्बई डिब्बा वाला एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व किया|

डिब्बावाला एसोसिएशन का काम है प्रतिदिन सुबह ७ से ८ के बीच रजिस्टर्ड व्यक्ति के घर जाकर लँच बॉक्स लेना और उसे उसके कार्यालय में दस से ग्यारह के बीच पहुँचा देना| कार्यालय बंद  होने  से  पहले  ख़ाली  लंचबॉक्स  इकट्ठे कर लेना….. डिब्बावाला की  लोकप्रियता इतनी कि उन्हें लंदन के शाही घराने में विवाह में शामिल होने की बाकायदा दावत भी दी गई|

जनवरी २०१६ से डिब्बावाला एसोसिएशन ने रोटी बैंक की स्थापना की है जिस काम को चार सौ डिब्बावाले अंजाम दे रहे हैं| इन्होने इसकी वेबसाइट भी बनाई है| उद्देश्य पूछने पर डिब्बावाला प्रबन्धक ने बताया- “आजकल शादी ब्याह तथा अन्य उत्सवों की पार्टियों में बहुत सारा खानाबच जाता है| हम उस खाने को इकट्ठा कर ग़रीब, ज़रूरतमंदों की भूख मिटाते हैं| हमारेकर्मचारी साढ़े तीन बजे दोपहर को फ्री हो जाते हैं उसके बाद हम ये काम करते हैं| हमें हैल्पलाइन नं. भी मिल गया है जिस पर फोन कर बचा हुआ खाना ले जाने की खबर आप दे सकते हैं|इसके अलावा जो भी खाना दान करना चाहे हमेंफोन कर देता है| जो खाना जलसा ख़त्म हो जाने के बाद डस्टबिन को भेंट कर दिया जाता है उसे जब हम किसी की भूख मिटाने के लिए देते हैं तो बड़ा स्वर्गिक आनंद मिलता है साहब|”

डिब्बावालों की इस पहल को मैं सलाम करती हूँ|

अँग्रेज़ों के ज़माने का किंग्ज़ सर्किल अब माहेश्वरी उद्यान कहलाता है…..

मुम्बई में भव्यता के पैमाने पर जो दर्ज़ा छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, ताजमहल होटल, मरीन ड्राइव, गिरगाँव चौपाटी का है वही दर्ज़ा किंग्ज़ सर्किल का है| ब्रिटिश शासनकाल में यह पूरा इलाका किंग्ज़ सर्किल के नाम से प्रचलित था किन्तु अब यह माहेश्वरी उद्यान के नाम से जाना जाता है| हालाँकि रेलवे स्टेशन किंग्ज़ सर्किल ही कहलाता है जो सीधे वी. टी. तक जाता है| किंग्ज़ सर्कल के पास साउथ इंडिया एजुकेशन सोसाइटी हाईस्कूल है जो मुम्बई के पुराने स्कूलों में से एक है| यहीं कोलीवाड़ा, वडाला, सायन और सी. जी. एस. कॉलोनी एंटॉप हिल है| एंटॉप हिल मेरे मुम्बई के शुरूआती दिनों का साक्षी है जब मैं पत्रकारिता के लिए मुम्बई में संघर्षरत थी| एंटॉप हिल निम्न श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों का वन बेडरूम हॉल किचन आवास है जो चार माले की बहुत सारी इमारतों में आबंटित किया जाता है| इसी में से एक फ्लैट में मैं रहती थी|एजेंट के द्वारा लिये इस फ्लैट में चाहें जब रात बिरात चैकिंग होती थी और एजेंट हमें ताले में बंद करके चला जाता था क्योंकि चैकिंग के दौरान इंस्पैक्टर ने अगर पकड़ लिया तो उसी समय सामान सहित बाहर कर दिये जायेंगे और बेचारे कर्मचारी का मकान छीनकर उसे जुर्माना भरना पड़ेगा| लेकिन अमूमन फिल्मी कलाकारों, गायकों, लेखकों, रंगकर्मियों को स्ट्रगल के दौरान शरण देने में एंटॉप हिल का जवाब नहीं| एंटॉप हिल जुड़ता है कोलीवाड़ा से,वडाला से और माटुंगा तथा सायन से| यहीं बरकत अली दरगाह है जो पहाड़ी पर है| यहाँ एक पुल भी है  जो पहाड़ी को पूर्व और पश्चिम से जोड़ता है|प्रतिवर्ष उर्स के दौरान यहाँ उत्सव जैसा माहौल रहता है| लाउड स्पीकर पर अजान, कव्वाली आदि सुनतेदिन रात बीतते थे हमारे| थोड़े फासले पर कोलीवाड़ा मार्केट है जो कोलियों का मशहूर मछली बाज़ार है और जहाँ सड़क के किनारे ठेलों पर झींगा और मछली फ्राई खरीदने शाम से भीड़ जुटने लगती है| कोलियों के अलावा पाकिस्तान अधिकृत सिंध और पंजाब से आए शरणार्थियों की बस्ती होने के कारण पंजाबी बाज़ार भी यहाँ का बहुत प्रसिद्ध है| लोहड़ी पे यहाँ की रौनक देखते ही बनती है| यहीं मशहूर फिल्मकार सागर सरहदी रहते हैं और जिन दिनों विविध भारती रेडियो स्टेशन मरीन लाइंस में था….. कई रेडियो पदाधिकारी और कलाकार एंटॉप हिल, कोलीवाड़ा में रहते थे|यहीं मैंने भी कई रेडियो नाटक लिखे| अब विविध भारती बोरीवली के गोराई में स्थानांतरित हो गया है|

कोलियों की देवी गामदेवी का मंदिर भी कोलीवाड़ा में है जहाँ नारियल पूर्णिमा और अन्य उत्सवों पर कोली नृत्य होते हैं| सबसे मशहूर कोली नृत्य है….. कोलीवाड़ा ची शान| इस नृत्य का गीत भी बेहद चर्चित है….. कोलीवाड़ा ची शान आई तुझा देवू न….. हम सब काम धाम छोड़कर यह नृत्य देखने ज़रूर जाते थे और लौटते समय सरसों के तेल में तले पंजाबी भजिए और असली घी की इमरतियाँ ज़रूर खाते थे|

कोलीवाड़ा जो अब गुरु तेग बहादुर नगर कहलाता है से किंग्ज़ सर्किल की ओर जाने पर गाँधी मार्केट आताहै|गाँधी मार्केट डॉ. अम्बेडकर रोड पर है| जो पाकिस्तान से आये सिंधी और पंजाबी शरणार्थियों द्वारा बसाया गया है| गाँधी मार्केट में दो सौ दुकानें हैं जिसमें सभी के बजट की वस्तुएँ बिकती हैं| मुख्यतः कपड़ों के लिए प्रसिद्ध इस बाज़ार में अब सब्ज़ी मंडी और फल मंडी भी है, चमड़े की वस्तुएँ, जूलरी और कई प्रकार के घरेलू उपकरण भी बिकते हैं|

गाँधी मार्केट और किंग्ज़ सर्कल स्टेशन बिल्कुल आमने सामने हैं जिसे जोड़ता है एक छोटा सा पदयात्री पुल जो मंकी ब्रिज कहलाता है| पहले किंग्ज़ सर्कल, रेलवे स्टेशन में गंदगी और रात आठ बजे के बाद महिलाओं के लिए असुरक्षा का साम्राज्य था किन्तु अब एक एन जी ओ ने इसे गोद लेकर इसका कायाकल्प कर दिया है| अब हरे भरे पौधों की क्यारियाँ और साफ़ सुथरा स्टेशन मुसाफिरों का स्वागत करता नज़र आता है|

गाँधी मार्केट के पीछे षण्मुखानंद हॉल है| यह हॉल षण्मुखानंद फाइन आर्ट्स एंड संगीत सभा यानी षण्मुखानंद ऑडिटोरियम के नाम से मशहूर है| १९५८ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का जब मुम्बई आगमन हुआ तो यहाँ के बाशिंदों से उनकी बातचीत के लिए कोई उपयुक्त सभागार नहींथा| पंडित जी की इस मायूसी से दुखी मुम्बई निवासी दक्षिण भारतीयों ने इस सभागृह का निर्माण करने की ठान ली| यह सभागृह तीन समान उद्देशीय संस्थाओं….. षण्मुखानंद संगीत सभा, दक्षिण भारतीय संगीत सभा तथा भारतीय ललित कला सोसाइटी के विलय से अस्तित्व में आई| ३५ लाख रुपियों की लागत से जब यह बनकर तैयार हुआ तो इसका उद्घाटन महाराष्ट्र की तत्कालीन राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित ने किया| १९६३ में पूरी तरह बनकर तैयार हुआ यह सभागृह उस वक़्त एशिया में सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग और वास्तुशिल्प सौंदर्य की अनुपम मिसाल था| दक्षिण भारतीय शैली में बना यह किलेनुमा प्रेक्षागृह पर्यटकों को दूर से ही लुभा लेता है|भारत में ऑडिटोरियम का कॉन्सेप्ट षण्मुखानंद ने ही दिया| हॉल में २७६३ सीटें हैं जिसमें अति आधुनिक लाइट्स और साउंड सिस्टम्स हैं|इस प्रेक्षागृह की खूबसूरती जग जाहिर है| इसे कला का मंदिर कहा जाता है| यहाँ पश्चिमी और पूर्वी शास्त्रीय संगीत, भारतीय संगीत, नृत्य, ऑर्केस्ट्रा, बैले, कठपुतली शो, मनोरंजन के कार्यक्रम, नाटक, मार्केटिंग, मीटिंग्स, बिज़नेस सेमिनार, अवॉर्ड फंग्शन, कॉन्फ्रेंस, हिप्नोटिज़्म और मैजिक प्रोग्राम, फिल्मों के प्रीमियर शो, फिल्मफेयर अवार्ड्स, फेमिनामिस इंडिया,मिस यंग इंडिया जैसी सुपरहिट स्पर्धाएँ आयोजित कीजाती हैं| यहाँ छोटे कार्यक्रमों के लिए जसुभाई कन्वेंशन हॉल, पद्मरंगा चैंबर म्यूज़िक हॉल, पोर्टेट गैलरी और एस्सार हॉल भी हैं| ग्रीन रूम्ज़ हैं|कैंटीन है| पोर्टेट गैलरी में बीसवीं सदी के तमाम संगीत महारथियों के पोर्टेट लगे हैं| भारत में यह एकमात्र ऐसा भवन है जहाँ सभा के रेकॉर्ड में एक लाख घंटे का रेकॉर्डेड आर्काइव है| सभा षण्मुख नाम की एक त्रैमासिक पत्रिका भी निकालती है| इसकी पहली मंज़िल पर मेडिकल केयर और कंसल्टेंसी उपलब्ध है|

किंग्ज़ सर्कल से दादर की ओर जाने पर फाइव गार्डन मानो पुकार उठता है…..! ‘मुसाफिर हमसे भी मिलते जाओ|’ यह उद्यान समूह स्वप्न नगरी मुम्बई का स्वर्ग है| मंचेरजी जोशी पाँच उद्यान नाम से मशहूर पाँच उद्यानों का ये समूह फोर स्क्वेयर्स यानी चार कोनोंवाले रास्तों को समेटे हैं| उद्यान में खूबसूरत फव्वारे, हरे भरे दूब के लॉन, ऊँचेऊँचे छायादार दरख़्त और क्यारियों में लगे सतरंगे फूल सहज ही मन लुभाते हैं|

माटुंगा में ही दक्षिण भारतीय शैली से बना मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता दक्षिण भारतीय मंदिर है| देखिए कैसे कोस भर की दूरी पर ही मुम्बई रंग बदल लेती है| कोलीवाड़ा कोलियों की बस्ती और बाज़ार, किंग्ज़ सर्कल सिंधी-पंजाबी बाज़ार और माटुंगा दक्षिण भारतीय बाज़ार….. यानी तमाम प्रदेश बस एक मुम्बई में| इसीलिए तो मुम्बई को ‘मुम्बई मेरी जान’ कहा है|

माटुंगा से जुड़े जुड़े से हैं दादर और वडाला रोड….. वडाला रोड रेलवे छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से जुड़ा है| वडाला पश्चिम में बहुत बड़ा शिक्षा का केन्द्रहै| कैंपस में कैमिकल टेक्नॉलॉजी विश्वविद्यालय, विद्यालंकार इंस्टिट्यूट, साउथ इंडिया वेलफेयर सोसाइटी (SIWS) ऑक्सीलियम कॉन्वेंट हाईस्कूल,खालसा कॉलेज, एस एन डी टी महिला विश्वविद्यालय, डॉ. आम्बेडकर कॉमर्स और लॉ कॉलेज हैं| वडाला का आईमेक्स दुनिया का सबसे बड़ा डोम थियेटर है| यहीं अवर लेडी ऑफ़ डोलोर्स चर्च, सेंट जोज़ेफ़ हाईस्कूल, डॉन बॉस्को कान्वेंट, बंसीधर अग्रवाल स्कूल है|डॉन बॉस्को एरिया ईसाई बहुल है| यहाँ फुटपाथ पर कोढ़ जैसे भयानक रोग से पीड़ितों की झुग्गियाँ हैं|

वडाला पूर्व में दो किलोमीटर टर्मिनस पर फ्लेमिंगो बे है| दिसंबर से मार्च तक विदेशों से आये हज़ारों फ्लेमिंगो पक्षियों से यह खाड़ी भर जाती है| आसमान गुलाबी पँखों की छटा बिखेरता नज़र आता है| ये प्रवासी परिंदे यहाँ मेंग्रोव्ज़ की सघन झाड़ियों में अपने घोंसले बसाते हैं और प्रजनन करते हैं|ज़ाहिर है अपने देश लौटते समय ये हज़ार से कई गुना बढ़ जाते हैं|   

मुम्बई की सरहद सायन…..

दशकों पहले सायन को मुम्बई की सरहद या प्रवेश द्वार कहा जाता था| मराठी में इसे शीव कहते हैं  जिसका अर्थ है बाऊँड्री| सायन रेलवे स्टेशन सैंट्रल और हार्बर  लाइनों से जुड़ा है| यहाँ का ऐतिहासिक स्थान है हिल  टॉ  पगार्डन जहाँ सायन का किला  स्थित है| यह  किला  टोपीनुमा पहाड़ी पर है| हिलटॉप गार्डन यानी नेहरु उद्यान  से होकर ही किले की सीढ़ियाँ हैं |पहाड़ी के उस पार सॉल्सेट द्वीप है| हालाँकि वहाँ अब समुद्र का कोई अता पता नहीं है| निर्माण की आँधी समुद्री ज़मीन को हड़पती चली जा रही है| किन्तु पुर्तगाली शासनकाल में वहाँ समुद्र हुआ करता था|पुर्तगालियों ने इस पहाड़ी पर सैनिकों के रहने की व्यवस्था की थी| बाद में किले पर मराठों का कब्ज़ा हुआ और फिर अँग्रेज़ों का|जैसे ही उद्यान की सीमा समाप्त होती है, ऊँचे-ऊँचे दरख़्तों और जंगली झाड़ियों से भरा जंगल शुरू होता है| ओह….. इतने मोटे तने वाले चम्पा के पेड़ मैंने पहली बार देखे| दो पुरानी तोपें भी यहाँ रखी हैं| पहले १२ थीं अब २ ही बची हैं| सीढ़ियाँ चढ़ते हुए किले के खंडहर मानो अपनी कहानी सुनाते हुए से लगते हैं| न अब वो ज़माना रहा न किले की सुँदरता| अबतो खंडहरों में हरियाली मनमानी जगह पर उग आई है| नीचे तहख़ाना है जो बारूद रखने के लिए था| एक बड़ी सीमेंट और चूने से बनी टंकी है जिसमें बारिश का पानी सैनिकों के पीने के लिए इकट्ठा किया जाता था| यह किला समुद्री यातायात और समुद्र पर कड़ी नज़र रखने के लिए बनाया गया था|

सायन में प्रख्यात के. जे. सौमैया इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एन्ड इन्फरमेशन टेक्नॉलॉजी है| यही वो उपनगर है जहाँ से मिथुन चक्रवर्ती,साधना, बोनी कपूर और अनिल कपूर ने फिल्मों का रुख किया था| सायन के पूर्व से ही जुड़ा है धारावी, जो माहिम के पश्चिम तक फैला है|

एशिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी…..यानी मुम्बई का दिल…..

१७५ हेक्टेयर भूमि पर बसा धारावी एशिया का सबसे बड़ा स्लम एरिया है| पहले धारावी द्वीप पर कोली मछुआरे रहते थे और बहुतायत से मेंग्रोव्ज़ की झाड़ियाँ थीं| कोली मछुआरों को कोलीवाड़ा में स्थानान्तरित कर १८८२ में धारावी बसाया गया| अब यहाँ की जनसंख्या आठ लाख है| सटी सटी 

झोपड़पट्टियाँ….. मानो ललकार कर कह रही हैं ‘घुस सको तो घुसो इनमें, घुस न पाई हवा जिनमें|’ मात्र दो लोगों को सटकर चलने लायक रास्ते जो हमें ले जाते हैं,उन कुटीर उद्योगों की ओर जहाँ से ६५० मिलियन डॉलर की वस्तुएँ हर साल विश्व के बाज़ारों में निर्यात की जाती हैं|

बॉलीवुड की फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ ने कई ऑस्कर अवार्ड जीते इस वजह से धारावी न केवल पूरे विश्व में चर्चित हुआ है बल्कि पर्यटन बॉलीवुड पैकेज में भी शामिल हो गया है| फिल्म की पूरी शूटिंग यहीं हुई थी और कलाकार भी यहीं के थे| आतंक, सौदेबाज़ी, सैक्स वर्कर्स, हिजड़े, गंदीबदबूदार गलियाँ, शौच से ठसाठस नाला और इस नाले के दोनों ओर लाइन से झुग्गियाँ….. इन्हीं के अंदर है कुम्हारवाड़ा….. मिट्टी के खूबसूरत बर्तन  पर कलाकारी  करते  हुए कुम्हार  यानी एक अधेड़ पुरुष ने बताया- “बाहर से धारावी ऐसा ईच दिकता….. अंदर आक्खी सुविधा| अपुन  को लाइफ़ से प्रॉब्लम नहीं बाई….. प्रॉब्लम सरकार से है, ध्यान ही नहीं देती धारावी पे|”

तब तक एक लकड़ी की नसैनी से ऊपर के माले पर चढ़ती हुई उसकी बीवी बोली- “बसा(बैठो) चाय बनाती मी|” उसका झोपड़ा अन्दर से सुविधाजनक मुझे भी लगा| धारावी में महाराष्ट्र नेचर पार्क भी है| विशाल क्षेत्र में फैले इस पार्क में कई प्रकार के पेड़ पौधे, तितलियाँ और रेंगने वाले प्राणी हैं| यहाँ स्लाइड शो और नेचर वॉक भी आयोजित किये जाते हैं|

चूना भट्टी उपनगर से गुज़रते हुए मुझे अम्मा की याद आ गई| वे जब भी मुम्बई मेरे पास आतीं चूनाभट्टी ज़रूर आतीं क्योंकि यहाँ राधास्वामी सम्प्रदाय की शाखा है जहाँ हर रविवार सत्संग होता है| लौटते में वे हेमंत के लिए चूना भट्टी मार्केट से ख़रीदी करती थीं| ….. अब दोनों ही नहीं रहे….. पर दुनिया तो चल ही रही है|

कुर्ला रेलवे स्टेशन जो लोकमान्य तिलक टर्मिनस कहलाता है बाहर से आने वाली गाड़ियों का मुकाम भी है और सैंट्रल तथा हार्बर की लोकल गाड़ियों का भी| कुर्लातालुका पहले मुम्बई सबर्बन डिस्ट्रिक्ट का हेडक्वार्टर था| यहाँ प्रसिद्ध ख़ान बहादुर भाभा अस्पताल है|

मुम्बई तेरे क्या कहने…..

मुम्बई बड़े दिलवाली है,सुनहले सपनों की खान है| सबको अपने मेंसमेट भी लेती है और सपनों को सच करने का रास्ता भी दिखाती है| मुम्बई ने न जाने कितने गाँवों को अपने में समेट लिया है जो आते तो ठाणे, अलीगढ़, डोंबीवली, कल्याण में हैं पर उनके सूत्र मुम्बई से जुड़े हैं| कुर्ला से आगे विद्याविहार, घाटकोपर, सानवाड़ा, विक्रोली, कांजुर मार्ग, भांडुप, मुलुंड, ठाणे, भिवंडी, नेरल, कर्जत और फिर इसतरफ़ नवी मुम्बई, वाशी, नेरुल, बेलापुर….. इनको जोड़ता है ठाणे क्रीक, बृहन्मुम्बई| तीन तरफ लहराता सागर, जंगल(फॉरेस्टएरिया) किले, नेचरपार्क, निरंतर मुम्बई की ओर खिंचती ज़मीनें….. चट्टानी हों या भुरभुरी….. बिल्डर ख़रीदकर गगनचुम्बी इमारतें खड़ी कर रहे हैं जिनमें अथाह पैसे वालों का अपना ‘डुप्ले’ संसार है|

येऊर और पारसिक पहाड़ियों से घिरा मुम्बई का ठाणे जिला जिसके अंतर्गत अन्य गाँवों के अलावा विरार से दहिसर तक का इलाका आता है पहले मुम्बई का आवासीय उपनगर था| झीलों का शहर ठाणे बेहद खूबसूरत शहर है जिसके १५० वर्ग कि. मी. से एरिया में ३५ झीलें हैं| ठाणे को पहले संघानक नाम से भी जाना जाता था| यह मुम्बई के उत्तर पूर्व में स्थित है| २४ लाख की आबादी वाला ठाणे सालसेटे द्वीप पर समुद्र तल से सात मीटर की ऊँचाई पर स्थित है| यही वो जगह है जहाँ मुम्बई ठाणे के बीच पहली रेल पटरी बिछाई गई और १६ अप्रैल १८५३ को दोपहर ३.३५ बजे ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे की पहली रेल बोरीबंदर से ठाणे के लिये रवाना हुई| यहाँ का ठाणे कोल पुल भारत का पहला रेल पुल है|१८६३ में ठाणे को पहला नगर परिषद मिला|

ठाणे जिला वसई और ठाणे की खाड़ियों पर से होता हुआ मुख्य उपनगरों यानी मुम्बई की ओर दहिसर तक फैला है| ठाणे शहर में कई शिक्षण केन्द्र, स्कूल, कॉलेज औरअल्फ़ा अक़ादमीहै| यहाँ रसायन इंजीनियरिंगउत्पाद एवं वस्त्रका विशाल औद्योगिक केन्द्र भी है|

सभी झीलों में सबसे खूबसूरत मसुंदा झील है जिसके तट पर चिमाजी अप्पा द्वारा बनवाया गया कोपिनेश्वर मंदिर है जो ६ मंदिरों का समूह है| पाँच फीट ऊँचा शिवलिंग ब्रह्मा, राम, उत्तरेश्वर, शीतला देवी तथाकालिका देवी के मंदिर हैं| मसुंदाको स्थानीय लोगतलाव पल्ली कहते हैं| यहाँ नौका विहार और वॉटर गेम्सबहुत प्रचलित हैं| येऊर पहाड़ियों और नीलकंठ हाइट्स के बीच स्थित उनवन झील बहुत सुंदर है|हर हर गंगे झरना भारत का सबसे बड़ा और कृत्रिम झरना है| गुज़रो तो हवाएँ बूँदों की सौगात देती हैं| अम्बरनाथ मंदिर हेमंदवा  थी शैली में बना है| इतिहास प्रेमियों के लिए बेसिन फोर्ट और जवाहर पैलेस है|पहाड़ी की चोटी पर मुम्ब्रा देवी मंदिर है जिसे १७वीं सदी में यहाँ के मूल निवासी (आदिवासी भी और मछुआरे भी) कोली और आगरियों ने बनवाया| पहले यहाँ गाँव था अब ठाणे शहर ने इस गाँव का रंगरूप बदल डाला|इस पहाड़ी का नाम पारसी हिल है| पारसी हिल पर २१० मीटर की ऊँचाई पर यह मंदिर बना है| ट्रेकिंग करते  हुए जाने  में आसपास  की खूबसूरत  प्रकृति  रोमाँचित करती है|

ठाणे क्रीक में पानी खूबसूरती से गिरते हुए मानो लेट  सा गया है| किनारों  पर  चिड़ियों के झुंड  शोर मचाते  हुए फुदकते हमें प्रकृति के करीब ले जाते हैं| आधुनिक सुविधाएँ भले ही  शरीर को आराम दें पर खुशी  तो प्रकृति  में  उतरने से ही मिलती है|

घोड़बंदर फोर्ट जिसे  पुर्तगालियों ने बनवाया ,ये ऊरपहाड़ियों से घिरा जंगल जहाँ जंगली जानवरों के झुंड विचरण करते हैं, संजय  गाँधी राष्ट्रीय  उद्यान, ये सब ठाणे जिले के रुचिकर पर्यटन स्थल हैं| यहाँ के सूरज वॉटर पार्क ने अपनी खूबसूरती की वजह से पाँच बार लिम्का बुक में नाम दर्ज़ कराया और कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते| इस वॉटर पार्क को मुचला मैजिक लैंड प्राइवेट लिमिटेड ने बनवाया| इसका डिज़ाइन व्हाइट वॉटर वेस्ट इंडस्ट्रीज़ ऑफ़ कनाडा ने तैयार किया| यह १९९२ में बनकर तैयार हुआ|

ठाणे में टीकूजी नीवाड़ी है| जो एम्यूज़मेन्ट, रिक्रिएशन और थीम पार्क है| विशाल परिसर में फैला यह पार्क बहुउद्देशीय है| मसलन यहाँ रिसॉर्ट, पार्टीहॉल, शादी के लिए हॉल, हर तरह के व्यंजन के सुस्वाद रेस्तरां भी हैं, वॉटर पार्क भी है| ड्रायऔर वेट राइड्स हैं और जंगल और गाँव भी साकार हुआ है| बैलगाड़ी है| खाट पर दरी बिछी है जो अमराई में और चीकू, अमरुद के उद्यान में आराम से बैठकर ताज़ी हवा में बातें करने को आमंत्रित करती है|शिवजी के भक्तों के लिए शिव मंदिर है|जंगल में नज़रें घुमायेंगे या चहलकदमी करेंगे तो कहीं भागते हिरन, शेर मिलेंगे पर असली का आभास देते सब नकली| नकलीपन में भी वे पर्यटकों को तो लुभा ही लेते हैं|

जो टीकूजी नी वाड़ी तक पहुँच जाते हैं वे फिर कल्याण के पास चोखी ढाणी जाना नहीं भूलते| हालाँकि ये इलाका मुम्बई में नहीं आता पर मुम्बई का अपना मिजाज है| न वह दूरियाँ देखती है, न थकती है| चरैवेति के सिद्धांत का पालन करने वाली मुम्बई हमेशा चलती रहती है| चोखी ढाणी राजस्थानी थीम पर बना एक ऐसा स्थान है जिसकी प्रेरणा जयपुर स्थित चोखीढाणी से ली गई है| बहुत बड़े परिसर में राजस्थानी गाँवसा बसा है| गेट से प्रवेश टिकट लेकर अंदर पहुँचकर मुझे लगा जैसे मैं राजस्थान भ्रमण पर हूँ| कुछ लोग ऊँट पर सवारी कर रहे थे, ऊँट दौड़  रहा था ज़मीन पर बिछी रेत पर|एक जगह कुम्हार अपना चक्र चलाकर मिट्टी के बर्तनों का डिमाँस्ट्रेशन दे रहा था| कहीं दस बारह साल का लड़का पतली पाइप पर चढ़कर करतब दिखा रहा था, कहीं राजस्थानी नृत्य करते युवा थे तो कहीं घूमर  नृत्य  और सिर पर ७ या ९ घड़े रखकर  नाचती  राजस्थानी  महिलाएँ| थीम के अनुसार कच्चे घरों की दीवार पर चित्र उकेरे हुए| ऐसा लग रहा  था जैसे  मैं  किसी फिल्मी लोकेशन  पर हूँ और यह पूरा सैट, सरंजाम शूटिंग के लिए तैयार किया है| पूरी राजस्थानी संस्कृति वहाँ ठहर गई थी|

पुरुषों को सिर पर पगड़ी बाँधकर आसनी पर बैठा कर सामने रखी चौकी पर छप्पन भोजन परोसे जा रहे थे| राजस्थानी घाघरा और ज़ेवर पहन कर मैंने भी पारम्परिक तरीके से बेहद स्वादिष्ट भोजन किया| भोजन के बादपानभी….. कुल्फ़ी भी| ठेठ राजस्थानी स्वाद की कुल्फ़ी थी जैसी मैंने झुँझुनू में खाई थी|

पूरा परिसर राजस्थानी गीतों से गूँज रहा था| मुम्बई आने वाला हर पर्यटक चोखीढाणी ज़रूर आता है| विदेशी पर्यटक ऊँट पर सवारी करना बहुत पसंद करते हैं|

आज भी हैं मुग़ल हमाम…..

स्पा के इस युग में शायद ही किसी को यकीन होगा कि मुम्बई जैसे महानगर में मुग़ल हमाम भी हुआ करते थे बल्कि थोड़ी सी खोजबीन से उनके आज भी मौजूद होने की पुख़्तगी हासिल हुई| सैंडहर्स्ट रोड से कुछ ही दूरी पर स्थित डोंगरी में ये मुग़ल हमाम मौजूद हैं| हालाँकि वहाँ स्थित ईरानी या मुग़ल मस्जिद जैसी शान इस हमाम को नहीं मिल पाई है पर यह उससे भी ज़्यादा पुराना और ऐतिहासिक है| डोंगरी की मेन इमामबाड़ा रोड पर मौजूद इसे देखकर कोई नहीं कहेगा कि यह हमाम अतीत में वैभव से सम्पन्न था| इसकी दीवार पर उर्दू में हमाम लिखा है| हमाम के अंदर पानी आदि के गरम होने की व्यवस्था है लेकिन भीतरी दीवार पर हमाम में स्नान करने की शर्त आपका मुस्लिम धर्मावलम्बी होना ज़रूरी है| इस अजीबोग़रीब शर्त से और जिज्ञासा बढ़ी, पूछने पर पता चला कि सीज़न के दिनों में नहाने के ख्वाहिशमंदों के साथ यहाँ मालिश की जगहों पर बैठकर इत्मीनान से मालिश करवाने और चंपी करवाने के लिए लोग आते हैं| मालिश के बाद गरम पानी की हौज में पंद्रह मिनट तक नहाने की क्रिया चलती है जो शरीर को बड़ा आराम देती है|

मसाज पार्लरों से प्रतिस्पर्धा के इस युग में पास की मस्जिद से जुमे की नमाज़ के बाद उमड़ी भीड़ ने आज भी इसे जीवंत बनाये रखा है| मुम्बई में बसे ईरानी परिवार की चौथी पीढ़ी द्वारा इसकी देख रेख, मेंटनेंस होती है|यही वजह है कि इस हमाम में ठंडे और गर्म पानी के हौजों सेचंदन के साबुन की खुशबू, गर्म भाफ़, सुगंधित इत्र और गुलाब की पंखुड़ियों की खुशबू उड़ती रहती है|ईरानी परिवार के मुखिया ने बताया किउन दिनों जब हमाम परिवार के सदस्यों से गुलज़ार रहते थे| दोस्तों से मुलाकातों का अड्डा भी ये हमाम ही हुआ करते थे| फल खाना, शरबत पीना, मेहंदी लगवाना, मालिश करवाना और सफेदोब (खुरदुरा) पत्थर से बदनको चिकना बनानायानी पूरा दिन तफ़रीह में निकल जाता था और रुख़सत होते समय सब ताज़ादम महसूस करते थे|

आज से दो सौ साल पहले जब ईरान से लोगों ने मुम्बई आकर यहाँ रेस्टोरेंट और होटल बनाए तो उन्होंने अपनी परम्परा और सुख सुविधा से भरी आदत के लिए हमाम भी बनवाए|हालाँकि अब वक़्त बदल गया है| मसाज पार्लर, स्पा के चलते हमाम को लोग भूल गये हैं परये आधुनिकता भी तो उसी का बदलारूप है| और तो और हमें मुम्बई के एक फाइव स्टार होटल में भी हमाम का पता चला है| लेकिन आधुनिक स्पा के मज़े उसकी बहुत कम कीमत पर मुहैया कराने वाले इस टर्किशबाथ यानी हमाम के ग्राहक अब शहर के ईरानियों के अलावा भिंडी बाज़ार के ही कुछ बाशिंदे रह गये हैं| वैसे सऊदी अरब से आये अरबों का भी यहाँ आना इसकी लोकप्रियता का गवाह है|

बॉक्स ऑफ़िस का रेकॉर्ड तोड़ती फिल्मों के गवाह सिनेमाघर…..

जब जबलपुर में थी तो मुम्बई का मराठा मंदिर सिनेमाघर बहुत आकर्षित करता था |मुम्बई सैंट्रल स्टेशन के सामने यह सिनेमाघर सालों साल चलने वाली सुपरहिट फिल्मों से  दर्शक वर्ग को अपनी ओर खींचता था|मराठा मंदिर में मैंने पहली फिल्म देखी“दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” जब यह फिल्म रिलीज़ हुई थी तो इसकी नायिका काजोल की शादी नहीं हुई थी और यह फिल्म अभी भी मॉर्निंग शो में चल रही है| काजोल की शादी हुई, बच्चे हुए और फिल्म चलती रही| निश्चय ही काजोल जब मराठा मंदिर के सामने से गुज़रती होगीतो ये शेर उसके ज़ेहन में आता होगा-

वो गलियाँ अभी तक हसीन औ जवाँ हैं

जहाँ मैंने अपनी जवानी लुटा दी 

मुम्बई कुछ ऐसी ही फितरत वाला शहर है| जब भी चर्चगेट स्थित इरोज़ सिनेमाघर के सामने से गुज़रती हूँ तो बस इरोज़ को देखती रह जाती हूँ| लंदन के सिनेमा हॉलों के स्थापत्य से प्रेरित चक्करदार सीढ़ियों, डेकोरेटिव बैंड और विशाल साइनबोर्ड से अपनी ओर बुलाता है ये खूबसूरत सिनेमाघर|लाल आगरा सैंडस्टोन से आर्ट डेको स्टाइल में १२ फरवरी १९३८ में बनकर तैयार हुआ ये सिनेमाघर आर्किटेक्ट सोराबजी भेडेवार द्वारा डिज़ाइन किया गया था| यह अपने वाइड एंगिल स्क्रीन और लेटेस्ट साउंड व प्रोजेक्शन सिस्टम के लिए दूसरे सिनेमाघरों से अलग हटकर बल्कि उनके लिए मिसाल है|इस खूबसूरत सिनेमाघर में फिल्म रिलीज़ होते ही दर्शकों की भारी भीड़ बॉक्स ऑफ़िस खिड़की पे टूट पड़ती है और फिल्म हिट होते देर नहीं लगती| वैसे भी चर्चगेट स्टेशन के एकदम सामने होने की वजह से हर तबके के लोगों की नज़र इसके बड़े बड़े होर्डिंग्स पर पड़ ही जाती है| एक हज़ार चौबीस दर्शकों की क्षमता वाला इरोज़ हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी फिल्में भी दिखाता है|


एक ज़माना था न्यू एंपायर सिनेमाघर में जूलिया रॉबर्ट्स या शैरोन स्टोन का नया शो देखने के लिए उमड़ी भीड़ बॉक्स ऑफ़िसकी खिड़की तोड़ती थी| मेट्रो सिनेमाघर के शो हफ़्तों पहले से बुक्ड हो जाते थे| छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर कैपिटल सिनेमाघर के बाहर ब्लैक से टिकट बेचने वालों की चाँदी रहती थी| अपनी लाजवाब लोकेशन की वजह से कैपिटल काफी लोकप्रिय था|कुर्ला के कल्पना सिनेमाघर के बाहर एक अदद टिकट के लिए मारपीट तक हो जाती थी| अब ये सब गुज़रे ज़माने की बातें हैं जिन्हें यहाँ के बुजुर्ग आज भी याद करते हैं|उस ज़माने में लैमिंग्टन रोड पर कतार से सिनेमाघर थे|नाके से थोड़ा आगे नॉवेल्टी सिनेमाघर था| यहाँ सिनेमा देखने वाला चिलियाओं के होटल का बैदा (अंडा) पाव और कीमा पाव ज़रूर खाता था| अब फास्ट फूड संस्कृति ने जड़ें जमा ली हैं| नॉवेल्टी का भी रीकंस्ट्रक्शन हुआ है| लैमिंग्टन रोड पर ही आगे चलकर सैंट्रल सिनेमा था जो मुम्बई में सिनेमा के इतिहास काअहम हिस्सा था|मेरे बुज़ुर्ग पड़ोसीबताते हैं कि इस सिनेमाघर में खम्भों के बीच से देखी गई वहीदा रहमान की फिल्म ‘बीस साल बाद’ आजभीयाद आती है| वहीं स्वस्तिक, नाज़ आदि सिनेमाघर थे|दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री के बैकबोन इन सिनेमाघरों की रौनक अब फीकी पड़ गई है| अब मल्टीप्लेक्स संस्कृति के साथ ही मुम्बई के सिनेमाघर क़रीब ६० प्रतिशत तो बंद ही हो गये हैं और जो बचे हैं वे भी बंद होने की कगार पर हैं|चाहे टाइम्स स्क्वायर का कैपिटल हो, लैमिंग्टन रोड के १६ सिनेमाघर हों, लोअर परेल का दीपक हो, गिरगाँव का कोरोनेशन हो जहाँ ३ मई १९१३ को दादा साहब फालके निर्मित देश की पूरी लम्बाई वाली और स्वदेश निर्मित ‘राजा हरिश्चंद’ दिखाई गई थी|आज बंद हो चुके हैं ये सारे सिनेमाघर| १४ मार्च १९३१ को देश की पहली बोलती फिल्म आलमआरा दिखाने वाला गिरगाँव का मैजेस्टिक सिनेमाघर अब मॉल बन चुका है|वॉटसन होटल में १८९६ में अंग्रेज़ों ने एक रुपए का टिकट लेकर पहला बाइस्कोप देखा था अब मात्र किरायेदारों और खस्ताहाल ऑफ़िसों की बसाहट बनाकर रह गया है| यह देश की सबसे पुरानी इमारत है जो कास्ट आयरन से बनी है| चहल पहल भरे नॉवेल्टी, स्वस्तिक, नाज़, मिनर्वा, श्रेयस, विजय, डायना, एडवर्ड, इंपीरियल,न्यू रोशन, रॉयल और अंकुर जैसे सिनेमाघरों में अब सन्नाटा है| मुम्बई के कुछ सिनेमाघर तो अपनी खूबसूरती और अलहदा शो की वजह से मील का पत्थर बन गये हैं|उन्हीं में से एक है न्यू मरीन लाइन्स स्थित लिबर्टी| आर्ट डेको स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ थियेटरजो अपने ‘लोगो’ पियानोके साथ मुम्बई का सर्वश्रेष्ठ जॉज म्यूज़िक स्मारक भी कहलाता है| १९४९ में ‘अंदाज़’ फिल्म के शो के साथ इसका हिंदी फिल्मों का सफ़र शुरू हुआ| १२०० दर्शकों की क्षमता वाले मुख्य थियेटरके साथ लगभग ३० मिनी थियेटर भी हैं| मॉल संस्कृति की वजह से अब ये कल्चर सेंटर बन गया है और म्यूज़िक, आर्ट, थियेटर, डांस के शोज़ और फिल्म फेस्टिवल्स के लिए ज़्यादा जाना जाता है|

फोर्ट स्थित ‘न्यूइंपायर’ आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना है जो १९०८ में थियेटर के रूप में खुला| इसका मुख्य आकर्षण है आर्ट डेको इंटीरियर| ग्लैमरस फिल्मों के शौकीनों, प्रेमियों, कॉलेज विद्यार्थी और कोने की सीट चाहने वालों का ये मनपसंद थियेटर है|

स्टर्लिंग सिनेप्लेक्स जो दक्षिण मुम्बई यानी फोर्ट में स्थित है|अपने शुरुआत के वर्षों में यानी १९६९ से ही मशहूर सीढ़ियों के साथ कॉलेज विद्यार्थियों के लिए फोर्ट का हैंगआउट प्लेस और डॉल्बी साउंड जेनन प्रोजेक्टर, मैटिनी और लेट नाइट शोज़ की सबसे पहले पहल करने के कारण अन्य थियेटरों का ईर्ष्या पात्र भी बन चुका है|फोर्ट में ही नॉवेल्टी थियेटर था जो १९२८ से न्यू एक्सेल्सियरकहलाने लगा| यहीं पर शोले फिल्म की चैरिटी स्क्रीनिंग और शाहरुख़ ख़ान की फिल्म देवदास का प्रीमियर शो भी यहीं हुआ|

टाइम्स स्क्वेयर में रीगल सिनेमा घर की शान ही निराली है| भारत की पहली अंडर ग्राउंड कार पार्किंग यही है| एशिया का पहला वातानुकूलित थियेटर भी यही है और यही है वह सिनेमाघर जहाँ फिल्म फेयर अवॉर्ड का आयोजन हुआ करता था| १४ अक्टूबर १९३४ को बने इस सिनेमाहॉल में १२०० दर्शक बैठकर सिनेमा देख सकते हैं|रीगल को मनमोहक डिज़ाइन दिया था चेकोस्लोवाकिया के कलाकार कार्ल सचरा ने….. खूबसूरत गुंबद, सीढ़ियाँ, मिरर वर्क और वाइडऐंगिल स्क्रीन| इसके नारंगी और हरे शिखर पर जब सूर्य किरणें उतरती हैं तो सब कुछ जगमगा जाता है|

दादर में प्लाज़ा सिनेमाघर है| यह मराठी फिल्मों के प्रदर्शन का सबसे लोकप्रिय सिनेमाघर है जिसे व्ही शाँताराम ने एक पारसी से ख़रीदा था| यह तीन पीढ़ियों के अभिनेताओं के अरमानों का ठिकाना रहा है| सातवाँ एशियाई फेस्टिवल यहीं हुआ| यही वो जगह है जहाँ १२ मार्च १९९३ केसी रियल बम ब्लास्ट में कई लोग मारे गये| अल्फ्रेड सिनेमाघर जिसका नाम पहले रिप्पन थियेटर था आज सुनहले अतीत की छाया भर है| भारतमाता सिनेमाघर ७५ साल पुराना है जो साल भर मराठी फिल्में दिखाता है| वह भी महज़ पच्चीस-तीस रुपए टिकट दर पे| दादा कोंडके की फिल्मों के लिए तथा डिजिटल के लिए यह सिनेमाघर प्रसिद्ध है|

मुम्बई का शानदार थियेटर मेट्रो जिसे विश्वविख्यात फिल्म प्रोडक्शन कम्पनी एम जी एम ने १९३८ में अपनी फिल्में दिखाने के लिए बनाया था आज मुम्बई के सिनेमाघरों में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है| एम. जी. रोड जंक्शन पर फ्रामजी कावसजी हॉल के सामने स्थित १४९१ दर्शक क्षमता के इस थियेटर को राजकपूर ने अपनी फिल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ को रिलीज़ करने के लिए चुना था| सन् १९५५में पहली फिल्म फेयर अवॉर्ड नाइट भी यहीं हुई थी| यह लकदक फिल्म प्रीमियरों के लिए मशहूर है| और २००६ से यह स्क्रीन मल्टीप्लेक्स भी हो गया है|

मरीन लाइन्स में ही बॉम्बे हॉस्पिटल के पास लिबर्टी सिनेमाघर है| यह आज़ादी के तुरन्त बाद १९४७ में हबीब हुसैन ने बनवाया| बारह सौ सीटों वाले इस सिनेमाघर का डिज़ाइन ब्रिटिश वास्तुकार रिडले अबॉट ने किया था|अब६८ साल बाद इस सिनेमाघर को एक विशिष्ट सांस्कृतिक केन्द्र बनाने की योजना है जिसे नेविल्लेटुलीके ओसियाना मास मूह द्वारा अंजाम दिया जायेगा|

लिबर्टी से जुड़ा एक दिलचस्प वाक़या मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन से जुड़ा है| १९९४ में जब माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘हमआपके हैं कौन’ यहाँरिलीज़ हुई तो हुसैन ने वो फिल्म पचास बार देखी|वे ऊपर की सीट पर बैठते थे और माधुरी का नृत्य देखकर गलियारे में आकर नृत्य करने लगते थे| दर्शकोंने उनकी शिकायत सिनेमाघर के मैनेजर से की| सिनेमाघर के मालिक नाज़िर हुसैन ने एम. एफ. हुसैन को एक निजी कक्ष देने की पेशकश की कि वे उस कक्ष में जी भर कर नृत्य करें लेकिन वे नहीं माने| हुसैन द्वारा माधुरी दीक्षित पर बनाई गई तस्वीरें आज भी लिबर्टी सिनेमाघर की शोभा बढ़ा रही हैं|

मलाड में एस वी रोड स्थित बॉम्बे टॉकीज़ महान फिल्मकार हिमाँशु रॉय और उनकी अभिनेत्री पत्नी देविका रानी ने स्थापित किया था|यहाँ क्रान्तिकारियों के सरताज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ऐतिहासिक न्यूज़ रील (सिनेमा वाली) का फिल्मांकन हुआ था| भारतीय सिनेमा के जनक और मज़बूत स्तंभ दादा साहब फालके (धुंडिराज गोविंद फालके) की स्मृति में स्थापित दादा साहेब फालके अकादमी है|फालके अवार्ड मिलना फिल्म इंडस्ट्री में गौरव का विषय है लेकिन विडंबना देखिए कि दादा साहेब फालके की ज़िन्दग़ी का आख़िरी दौर फाक़ाकशी में गुज़रा और उन्हें गुमनाम मौत मिली लेकिन सिनेकला के प्रति उनकी दीवानगी और फिल्मों की विकास यात्रा में उनके संघर्ष एवं योगदान के आगे फिल्म इंडस्ट्री सिर झुकाती है|

चर्नी रोड की तरफ़ जाने पर रॉक्सी सिनेमाघर है| अब काफी कुछ बदलाव की आँधी का शिकार हो गया है| सिनेमा भी अब ऊँचाईयों को,समृद्धि को छू रहा है| उसमें  बहुत विविधता आ गई है लेकिसि नेमा का वह पहले वाला दौर अब नहीं रह गया| अब चार आने और बाद में दस आनेवाली पहली कतार की सीटों का कोई वजूद नहीं रह गया| फिल्म रिलीज़ होते ही बॉक्स ऑफ़िस पर पहले हफ़्ते ही करोड़ों कमाने वाली फिल्मों को देखने के दौरान पॉपकॉर्न का पैकेट खरीदने के लिए सौ रुपए देने पड़ते हैं|तब आदमी चाहे कितना भी व्यस्त हो ब्लैक एन्ड व्हाइट सिनेमा की पकड़ इतनी मज़बूत थी कि अगर कुछ गाने रंगीन शूट किये जाते तो दर्शक उसे फूहड़ करार देते थे|

फ़िल्म स्टूडियो जहाँ यादगार फ़िल्में शूट हुईं…..

बदलाव फिल्म स्टूडियो में भी आया है| एक ज़माना था जब आउटडोर शूटिंग नहीं के बराबर होती थी| ज़्यादा से ज़्यादा शूटिंग हुई भी तो कश्मीर की दिलकश वादियों में| तब स्टूडियो में ही नगर,मोहल्ले, मंदिर, महल, किले, नदियाँ, पहाड़ सब हुआ करते थे और खूबी यह कि दर्शकों को पता भी नहीं चलता था कि सब कुछ नकली है| चैम्बूर में राजकपूर का स्टूडियो आर. के. फिल्म्स एंड स्टूडियो नाम से पूरी शानो शौकत से तब पर्यटकों को बहुत लुभाता था|गेट के दोनों तरफ़ सफेद झक्क दीवार पर लाल रंग की राजकपूर नरगिस की वही सुपरहिट अदा इकहरे शिल्प में लगी है|दाहिनी तरफ़ का शिल्प बरगद की जटाओं में थोड़ा छिप गया है| जब तक राजकपूर थे आर. के. स्टूडियो की होली का रंग ही कुछ और हुआ करता था| हर छोटा बड़ा कलाकार रंग से भरी टंकी में डुबोया जाता था फिर चाहे शैलेन्द्र हों, मुकेश हों, देवानंद हों या दिलीप कुमार|जमकर भांग घोंटी जाती थी और छक कर पी जाती थी और नाच गाने की धूम होती थी|उनके जाने के बाद अब वो बात नहीं रही है| हालाँकि ऋषि कपूर, शशि कपूर होली पे जमघट जुटा लेते थे| राजकपूर की इस परम्परा को ‘अमिताभ बच्चन’ अपने जुहू स्थितबँगले ‘प्रतीक्षा’ में निभाते हैं| भांग भी छनती है, मेवे और खोवे से भरी स्वादिष्ट गुझिया, रंग, अबीर….. पूरा का पूरा इलाहबाद उतर आता है प्रतीक्षा में|

वीरा देसाई रोड अँधेरी में वाई आर एफ यानी यशराज फिल्म स्टूडियो है| जहाँ उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई |अँधेरी में ही नटराज है जहाँ साहब बीवी और गुलाम की शूटिंग हुई….. कई दिनों तक गुरुदत्त और बड़े से कैमरे से इस जगह की पहचान थी| काँदिवली का बस रास्टूडियो, गोरे गाँव का फिल्मिस्तान और चाँदीवली स्टूडियो जो साकीनाका में है और जिसके भव्य बगीचे के लॉन से लगी पत्थर की रेलिंग को समँदर की लहरें छू-छू कर रोमाँचित होती हैं न जाने कितने फिल्मी दृश्यों के गवाह हैं| बाँद्रा में लोग मेहबूब स्टूडियो देखने ज़रूर जाते थे|बाँद्रावैसे भी कई फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियों का निवास स्थान रहा है| यहीं आनंद परिवार यानी देव आनंद, चेतन और विजय आनंद का स्टूडियो भी है| यहाँ शूटिंग तो नहीं होती पर उनकी बनाई फिल्मों की डबिंग वग़ैरह होती थी| यहीं मेरी मुलाक़ात आधा गाँव के रचियता मेरे प्रिय लेखक राही मासूम रज़ा से हुई थी| उन दिनों मेरे बड़े भाई अभिनेता, पत्रकार, लेखक, संवाद लेखन और डबिंग करते थे| कई अभिनेताओं को उन्होंने अपनी आवाज़ दी है|

अँधेरी में ही जैमिनी स्टूडियो था| ताराचंद बड़जात्या की राजश्री फिल्म्स की शूटिंग का स्थल भी ज़्यादातर जैमिनीस्टूडियो हुआ करता था| दहिसर और बोरिवली के बीच त्रिमूर्ति स्टूडियो है|गोरेगाँव में स्वाति, मालाड में दफाइन आर्ट स्टूडियो, लोअर परेल में सितारा स्टूडियो अपने समय के चमचमाते स्थल थे|उस ज़माने में फिल्म उद्योग अपने चरम पर था| तीन-तीन शिफ़्टों मेंकाम करने वाले फिल्मी वर्कर थे|रातभर मुम्बई की सड़कों पर हीरो हीरोइन की लकदकगाड़ियाँ गुज़रती थीं| पंजाब आदि से आए आज के सुपर स्टार तब संघर्ष के दौर से गुज़र रहे थे|कईयों का तो रातका बसेरा भी इन स्टूडियोज़ के फर्श हुआ करते थे|

जोगेश्वरी स्थित कमाल अमरोही स्टूडियो पाकीज़ा फिल्म की लम्बी दास्तान का गवाह है| कमाल अमरोही और मीना कुमारी का प्रेम भी इन्हीं दिनों परवान चढ़ा….. पूरे २४ घंटे में से केवल चार घंटे आराम करने वाले कमाल अमरोही ने कई यादगार फिल्में दर्शकों को दीं|मड आयलैंड में ओशो फिल्म स्टूडियो है जो भाटी गाँव के अंतर्गत आता है|

अब ज़्यादातर स्टूडियो पर बिल्डर और कॉर्पोरेट जगत की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है….. कईयों का तो मात्र नाम ही रह गया है, कईयोंका वो भी नहीं| फिल्मों की शूटिंग भी अधिकतर विदेशों में होने लगी है| विदेशों की सुंदरता, समृद्धि और रहन सहन फिल्मोंमें देखकर अधिकतर लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं|फ़िल्में आम दर्शकों से हमेशा जुड़ी रही हैं| यही वजह है कि युवा पीढ़ी भी पुराने फिल्मी गीतों की दीवानी है| वे फिल्मी गीत जो उस ज़माने में भारत के गली कूचों, पान की दुकानों पर गूँजा करते थे| आज भी वे गीत सूनेपन को गुदगुदा देने में बड़े कामयाब सिद्ध होते हैं|

अद्भुत है दादा साहब फालके चित्रनगरी…..

गोरेगाँव में ५२० एकड़ भूमि पर फैली है फिल्म सिटी जिसे ३० अप्रैल २००१ में फिल्मों के जनक दादासाहब फालके चित्रनगरी नाम दियागया है| २६ सितंबर १९७७ में इसका उद्घाटन हुआ और यहाँ छोटे परदे यानी टी. वी. सीरियल्स की शूटिंग आरंभ हुई| बड़े परदे की फिल्में भी यहाँ शूट की जाती हैं| दो लाख स्क्वेयर फीट के कार्पेट एरिया में१६स्टूडियो निर्मित हैं| यहाँपूरी कायनात मय लावलश्कर के मौजूद है| सारे पहाड़ी शहर नैनीताल, कश्मीर, शिमला, ऊटी….. यह एक ऐसा ख़ाली कैनवास है जिसमें आर्ट डायरेक्टरसीन के मुताबिक रंग भरता है| कभी रेलकी पटरियाँ बिछ जाती हैं, कभी तालाब, नदी, झील, जंगल, बर्फ़ीले पहाड़, पतझड़, आँधी, तूफ़ान….. ओह,….. यहसपनोंकी नगरी है जहाँ पर्यटक  मस्ती भरे सफ़र में मानो सारा जहाँ देख लेते हैं| कारखाने, खेत, बागबगीचे, किले, महल, मंदिर, बाज़ार, मयख़ाना….. वगैरह| यहाँक्रोमा, कम्प्यूटर, ग्राफ़िक्सटैक्नीक जो अब फिल्मों में इस्तेमाल की जाती है इनके बाँयें हाथ का खेल है| कैमरे के पीछे का हुनर ये है कि यहाँ मंदिर में भगवान सीन के हिसाब से बदलते रहते हैं| कभी गणपति तो कभी शिवशंकर, कभीकृष्णजी तो कभी माँ दुर्गा| मंदिर की दीवारें खड़ी रहती हैं लोकेशन बदल जाती है|ऊपर वाले के इतने रूप….. कहीं अजान, कहीं बौद्ध सूक्त, गुरुबानी….. मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना|यहाँ कई क्षेत्रीय फिल्मों की शूटिंग हुई है….. गुजराती, मराठी, नेपालीआदि| सीरियलतो धुआँधार बन रहे हैं| ऐतिहासिक, धार्मिक, कॉमेडी सीरियल्सके तो परमानेंट सैट बने हुए हैं, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, महाभारत,जोधा अकबर, रज़िया सुल्तान,महाराणा प्रताप, चक्रवर्ती सम्राट अशोक| वहाँ पहुँचकर ऐसा लगता है जैसे हम उस युग में विचरण कर रहे हैं|

ख़्वाजा अहमद अब्बास को देखने की उनसे मिलने की बहुत चाह थी| लेकिन मुम्बई आने के बावजूद भी यह चाह पूरी नहीं हो पाई| बाँद्रा स्थित आलीशान बहुमंजिला इमारत में फिलोमिना लॉज के एक फ्लैट में उनका निवास था|आवारा, श्री ४२०  जैसीहिट फिल्में उन्हीं ने लिखी थी| पिछले दिनों टी. वी. पे उनकी लिखी फिल्म देखी तो राजकपूर का डायलॉग बहुत देर तकज़ेहन में अटका रहा….. ‘एककार, दो कार, सब बेकार’….. तबशोलेनहीं आई थी और न ही गब्बर का यह डायलॉग कि ‘तेरा क्या होगा कालिया?’ लोगों की ज़बान पर था पर आज मैं कह सकती हूँ कि शोले की तरह ही राजकपूर का यह डायलॉग बहुत हिट हुआ था|ख़्वाजा अहमद अब्बास के लिए हम कह सकते हैं कि वे एक सिरफिरे लेखक और फिल्मकार थे….. वे प्रगतिशील परम्परा का आधारस्तंभ थे….. वे अपनी सारी कमाई ऐसी फिल्मों के लिए झौंक देते थे जो उनकी, धर्मनिरपेक्ष सोच के तो करीब होती थीं लेकिन बॉक्स ऑफ़िसपर पिट जाती थीं| शहर और सपना, दो बूँद पानी, सात हिन्दुस्तानी कला की दृष्टि से बेमिसाल थीं|ये सब जुनूनी लेखक थे| फिल्मों में भाग्य आज़माने साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर भी आते रहे पर फिल्म इंडस्ट्री उन्हें कुबूल नहीं कर पाई| मैं भी नामी निर्देशक के पास प्रेमचंद की कहानी लेकर गई थी| अपनी तो क्या ले जाती, लेते ही नहीं वे| सोचा प्रेमचंद की कहानी पर मुझसे संवाद ज़रूर लिखवायेंगे|मिलते ही वे तपाक़ से बोले….. “कहानी तो ठीक है पर ये प्रेमचन्द कौन हैं| लेकर आती उन्हें….. फिर फिल्म की रॉयल्टी देने में दिक्कत आती है|” मैंने माथा ठोक लिया….. केबिन से बाहर निकलते यूँ लगा जैसे किसी ने हिन्दी साहित्य के परखच्चे उड़ा दिये हैं|

अब तो फिल्मों के बाकायदा नियुक्त किये लेखक होते हैं| जो उनके लिए पटकथा, संवाद आदि लिखा करते हैं| भले ही उनके नाम की जगह किसी और का नाम आये पर पैसे तो मिलते रहते हैं इन घोस्ट राइटर्स को|

के से शुरू होने वाले धारावाहिकों का शूटिंग स्थल आरे कॉलोनी…..

गोरेगाँव पूर्व में एक बहुत बड़ालगभग १६ स्क्वेयरकिलोमीटर तक फैला हरा भरा इलाका है जिसे आरे कॉलोनी से जाना जाता है|१९४९ में यहाँ मिल्ककॉलोनी बनी जिसमें भैंसों के ३२ तबेले हैं और उन तबेलों में १६००० भैंस हैं| ये तबेले १२८७ हेक्टेयर एरिया में हैं| आरे कॉलोनी में खूबसूरत बाग़ बगीचे, हरी भरी सड़कें, झीलें, नर्सरी और छोटा कश्मीर जैसा खूबसूरत पिकनिक स्पॉट है जिसके झील में तैरते सफेद परों वाले परिंदों के संग नौका विहार करने का मज़ा ही कुछ और है|यहीं बिमल रॉय की फिल्म मधुमति की शूटिंग हुई थी जो १९५८ में बनी थी| तब से अब तक कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ हो चुकी है| ऊँचे-ऊँचे अजीबोग़रीब दरख़्तों के आगे पीछे दौड़ते हुए गाना गाते अभिनेता, अभिनेत्रियाँकौन भूल सकता है| यहीं है वो दरख़्तों का खूबसूरत मंज़र जहाँ अब शूटिंग तो नहीं होती लेकिन उस इलाके को घेरकर गेट बना दिया गया है| शाम छै: बजे तक वहाँ घूमने की अनुमति है| उसके बाद गेट पर ताला पड़ जाता है और वे खूबसूरत दरख़्त शाम के धुँधलकेमें समा जाते हैं| यहीं पर एकता कपूर का स्टूडियो बालाजी टेलीफिल्म्स है|दिन के सभी प्रहरों में और रात में टी वी डेली सोप की शूटिंग होती है| एकता कपूर का प्रोडक्शन हाउस भी यहीं है| सालों साल टी. वी. पर चले धारावाहिक जिनके नाम के से शुरू होते हैं इसी आरे कॉलोनी की देन है| मुम्बई की यह प्राकृतिक सुषमा से पूर्ण हरी भरी कॉलोनी जहाँ की सड़कों पर झड़े अमलतास और गुलमोहर के फूलों की बिछावन पर चलते हुए लगता है जैसे पुरातन काल का कोई अरण्य हो….. वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे से जोड़ दी गई हैऔर वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पवई से जाकर जुड़ता है|

पहले पवई भी जंगलनुमा इलाका था जो हत्यारे और स्मगलर्स की छुपने रहने की जगह के नाम से मशहूरथा| धीरे-धीरे जंगल ख़त्म होने लगा और बिल्डरों ने वहाँ महँगी-महँगी इमारतें बनाना शुरू कीं| अब पवई एक पॉश इलाका है जहाँ की बहुमंज़िली इमारतों के फ्लैट की कीमतें करोड़ों में हैं|खूबसूरत पवई लेक है जो हरियाली की गोद में छलकती पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है| पहले आई. आई. टी पवई की आखिरी चढ़ाई का हिस्सा जंगल ही था जहाँरात के दस बजते ही ख़ौफ़नाक सन्नाटा पसर जाता था| अब वहाँ आई. आई. टी. के गेट के बाहर छह लाइनों की चौड़ी सड़कपे रात के एक बजे तक ट्रैफ़िक की वजह से रास्ता पार करना कठिन है| हीरानंदानी गार्डन, पंचकुटीर जैसे पवई लेक से लगे इलाके मुम्बई के आधुनिक इलाकों में शुमार हैं|यहाँ कंक्रीट की सड़कों, क्लबों और खूबसूरत बगीचों से लेकर कूड़े को पर्यावरण पद्धति से परिवर्तित करने के प्लांट की सुविधा भी मुहैया है|

पवई से ठाणे शहर की ओर जाती सड़क कई उपनगर या कहें गाँवों को समेटे हुए है| विक्रोली, कांजुर मार्ग, भांडुप, मुलुंड आदि के बाद फिर ठाणे शहर आता है जो अबबहुत अधिक आधुनिक और विकसित जिले के रूप में जाना जाता है| इससे आगे फिर डोंबिवली, नेरल, कर्जत, कल्याणतक विस्तार ही विस्तार| इन सभी गाँवों, शहरों को मुम्बई सम्हाले है और मुम्बई के विकास में इन सबका योगदान है|

मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारे मुम्बई की धार्मिक प्रवृत्ति के परिचायक हैं…..

मुम्बई में हर त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है| होली, दीपवाली, ईद, क्रिसमस, गणेशोत्सव बाज़ारों की सजधज से ही पता लग जाते हैं| रथयात्रा जुहू स्थित इस्कॉन मंदिर से शुरू होकर जब मुम्बई की सड़कों पर निकलती है तो पूरा मुम्बई कृष्णमय हो जाता है|बिहार की छठ पूजा गिरगाँव चौपाटी और जुहू के तट पर हज़ारों की भीड़ में सम्पन्न होती है लेकिन छठ पूजा ने राजनीतिक रूप ले लिया है| वर्ली का बौद्ध मंदिर, यहूदियों के नेसेथ इलोहो, मागेन डेविड, मागेन इसीदिन, तिफरेथ इसराइल, शार हारमिन पूजा स्थल की प्राचीन अग्यारी, ईसाईयों का सेंट माइकल चर्च,बसीन के पुर्तगाली चर्च विभिन्न धर्मावलम्बियों के प्रार्थना स्थल हैं जहाँ हर कोई बेरोकटोक जा सकता है| धार्मिक एकता का ऐसा स्वरुप कहीं देखने नहीं मिलता|

जन्माष्टमी का त्यौहार देश भर में कृष्ण जन्म की स्मृति में मनाया जाता है| उसके दूसरे दिन यानी भादों की नवमी तिथि को पूरे महाराष्ट्र में ‘गोविंदा आला’ के रूप में मनाते हैं| ख़ासकर मुम्बई तो इस दिन ढोल नगाड़े और जश्न से गुलज़ार हो उठती है| इस दिन जश्न में भाग लेने वाले प्रत्येक लड़के को गोविंदा कहा जाता है|ये गोविंदा अपनी टोली के संग आकर मानव पिरामिड बनाते हैं और हवा में रस्सी के सहारे लटकी दही हंडी (मटकी) को अपने सिर की टक्कर से फोड़ते हैं|वैसेतो मुम्बई की हर गली, हर मोहल्ले में इस दिन दही हंडी लगाई जाती है लेकिन धीरे-धीरे इस त्यौहार ने कमर्शियल रूप ले लिया है और महीनों पहले गोविंदाओं को मानव पिरामिड पे संतुलन बनाए रखने की ट्रेनिंग दी जाती है|ऐसे कई मंडल  खुल गये हैं| हर मंडल के गोविंदाओं की यूनीफॉर्म और फीस तय है| दही हंडी का मुख्य आकर्षण वर्ली का जांबोली मैदान है| जांबोली में जश्न के दौरान महिलाओं के बैठने के लिए अलग गैलरी बनाई जती है| सामाजिक कार्यकर्ता, व्यापारी, फिल्म और संगीत से जुड़े कलाकार यहाँ मेहमान के रूप में बुलाए जाते हैं और उनके द्वारा गोविंदाओं के लिए पुरस्कार घोषित किये जाते हैं| गोविंदाओं के बनाए घेरे केस्तर यानी घर जो नौ तक की संख्या में पहुँच जाते हैं….. नौ घर तक पहुँचने वाले गोविंदाओं को पाँच लाख रुपए, फ्रिज, टेलीविज़न आदि इनाम घोषित किये जाते हैं| दही हंडी को स्पेन तक पहुँचा दिया है मुम्बई ने| स्पेनिश समूह कास्टलर्स डी विलाफ्रेंका….. दस घर वाला मानव पिरामिड ठाणे में बना चुका है| अब तो महिला गोविंदा भी हैं| इनके मंडल का नाम गोरखनाथ महिला मंडल है जिसमें १५० महिलाएँ हैं|

मैं जुहू स्थित इस्कॉन के हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर के प्रवेश द्वार पर हूँ| जुहू बीच की ठंडी, मदमाती हवाओं को लिए उतर आया था शाम का झुटपुटा| मंदिर भी सफेद आभा में मटमैला हो रहा था| चारों ओर सफेद पत्थर की जाली से घिरे मंदिर का प्रवेशद्वार पार करते ही एकाएक पैर थम गये|दाहिनी ओर लिखा था….. “अपने जूते यहाँ उतारिए|” नंगे पाँवों के नीचे फर्श फिसल रहा था| मेरी नज़रें मंदिर के कलश स्तंभ तक उठीं| लगा, जैसे कोई विदेशी होटल का नाम हो ‘इस्कॉन’….. अपने तमामजि ज्ञासा भरे सवालों को लिए मैं मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़कर प्रांगण में निकल आई| सफेद-काले नमूनों का,शतरंज की बिसात जैसा प्रांगण का फर्श जहाँएक ओर चम्पा और एक ओर बेलपत्री के दरख़्त झूम रहे थे| मंदिर की छह सीढ़ियों को ऊँचा उठाता परकोटा….. परकोटे के बीचों बीच तीन छतरियाँ| बीच वाली छतरी इस संस्था के संस्थापक आचार्य भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपादजी की थी| मैंने दाहिनी ओर से चलना शुरू किया|  सबसे पहले  कृष्ण और अर्जुन की महाभारत के  आधार पर झाँकी  थी| दूसरी नरसिंह  भगवान की थी जो हिरण्यकश्य का वधकर  रहे थे| तीसरी रामायण की  पृष्ठभूमि को लेकर थी| फिर  चैतन्य  महाप्रभु और स्वामी नित्यानंद तथा गदाधर जी की मूर्ति थी जो शराबी भाई जगायमदाय का मार्गदर्शन कर रहे थे| पाँचवीं, छठवीं, सातवीं झाँकी क्रमशः भगवान पांडुरंग विट्ठल, स्वामी कार्तिकेय और व्यास तथा गणेशजी की थी|इन झाँकियों के बाद था मुख्य राधाकृष्ण मंदिर,जो बेहद सुंदर, सजीव और भव्य लग रहा था|सभी दर्शनार्थी खंभे के पास बैठे कृष्ण भक्त से आचमन प्रसाद ले रहे थे| मैंने भी लिया तभी साँसों में समा गई भुनते बेसन की सौंधी खुशबू| बायीं तरफ़ कुछ विदेशी स्त्रियाँ सफेद साड़ी पहने भारतीय सी लगती लड्डू प्रसाद के पैकेट तैयार कर रही थीं|यहाँ से फिर झाँकियाँ शुरू होती हैं| शेषनाग की शैय्या पर क्षीरसागर में भगवान विष्णु शयन कर रहे हैं| लक्ष्मीजी पैर दबा रही हैं और नाभि से निकले कमल पर ब्रह्माजी विराजमान हैं| शिवजी का विषपान, अजामिल की आत्मा के लिए विष्णुदूतों और यमदूतों का आपस में युद्ध, भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला, आचार्य स्वामी प्रभुपाद का न्यूयॉर्क में प्रवचन और अंतिम झाँकी थी जो मनुष्य के जन्मसे मृत्यु तक की अवस्थाओं को दर्शा रही थी|

    इस्कॉन की शुरुआत १९७२ में ही हो गई थी| लेकिन इस मंदिर की स्थापना १९७८ की जनवरी मकर संक्रांति के दिन हुई थी| मुम्बई, लॉसएंजेल्स, न्यूयॉर्क, मॉस्को, लंदन आदि स्थानों पर बल्कि पूरी दुनिया में २५० मंदिर और २०० केंद्र हैं| संस्था का उद्देश्य एकता और भाईचारे की भावना को जन-जन तक पहुँचाना है|कलियुग में मोक्ष का रास्ता नाम संकीर्तन और कृष्ण प्रसाद पाना है|यही महामंत्र है| मैं चकित थी| भगवानके राम, अल्लाह, प्रभु यीशु आदि कई रूप हैं| फिर कृष्ण को ही इन्होने क्यों चुना? जवाब जैसे मंदिर का कण-कण दे रहा हो….. क्योंकि कृष्ण अपने आप में पूर्ण पुरुष हैं| वे सबसे ज़्यादा शक्ति सम्पन्न, खूबसूरत, विद्वान, दार्शनिक, मित्र, प्रेमी और सबसे अच्छे राजा थे|वे चौंसठ कलाओं से पूर्ण पुरुष थे फिर भी संसार से विरक्त थे| कृष्ण का नाम ही मोक्ष का मार्ग है|

‘हरे कृष्ण फूड फॉर लाइफ़ इंटरनेशनल’ नामक एक अलग विभाग है, जो करोड़ों व्यक्तियों को पौष्टिक भोजन हरे कृष्ण प्रसाद के रूप में सारे संसार में वितरित करता है| यह पूर्ण शाकाहारी भोजन है जो पौष्टिक पदार्थ सब्ज़ियों, अनाज, घी और मक्खन से तैयार किया जाता है| इस योजना का उद्घाटन श्रील कीर्तनानन्द स्वामी भक्तिपाद ने २५ मार्च १९८४ को किया था| प्रसाद ग्रहण कर मैं मंदिर के पिछवाड़े आश्रम में गई जो कृष्ण भक्तों का आवास है| वहाँ छोटे-छोटे कई कमरे हैं| प्रत्येक कमरे में चार गृहस्थ रहते हैं| गृहस्थ नाम थोड़ा अटपटा लगा|सन्यासियों को गृहस्थी से क्या काम?पता चला विद्या-प्राप्ति के बाद कोई भी गृहस्थाश्रम में आ सकता है| वे सुख ऐश्वर्य की चीज़ोंसे सर्वथा परे हैं| उनका शारीरिक सम्बन्ध भी संतान प्राप्ति के उद्देश्य से होता है ताकि छोटे-छोटे हरि भक्तोंसे ये संसार शिशुमय हो जाए| इस्कॉन यानी ‘इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कांशसनेस|’ जन्माष्टमी के बाद इस्कॉन का दूसरा बड़ा त्यौहार है

रथयात्रा| जो उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिर से लेकर पूरे विश्व के कृष्ण मंदिरों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरंभ होती है|आज से पाँच हज़ार साल पहले महाभारत के युद्ध के पश्चात कृष्ण, बलराम और सुभद्रा गोपियों से मिलने गये थे| उसी की झाँकी रथयात्रा में निकाली जाती है| सोने चाँदी से बने तीनों रथों को फूलों से सजाया जाता है| सबसे पहले कृष्ण का रथ, फिर सुभद्रा का रथ फिर बलराम का रथ|ढोल मजीरे बजाते हरे राम हरे कृष्णा गाते हुए जब कृष्ण भक्त रथ को घेर कर चलते हैं तो लगता है जैसे द्वापर युग आ गया|रथयात्रा की समाप्ति दशमी के दिन होती है और एकादशी के दिन भगवान क्षीर सागर में विश्राम के लिए चार महीने के लिए चले जाते हैं|

मंदिर से निकली तो मैं कृष्णमय थी|

मुम्बई का भूलेश्वर…..जहाँ का उषाकाल सुबह-ए-बनारस से कम नहीं…..

ब्राह्ममुहूर्त में यानी चार बजे से ही भूलेश्वर में फूलों से लदे ट्रक फूलों की दुकानों पर उँडलना शुरू हो जाते हैं| हवाओं में भक्तों की आस्थाके स्वर मुखरित होते हैं और शंखनाद और घंटानाद राहगीरों को पलभर ठिठका देता है| कारोबारी महानगरी के दक्षिण में सैंकड़ों सालों से बसा यह जो भूलेश्वर इलाका है यहाँ सौ से भी ज़्यादा मंदिर हैं|और उससे भी कहीं अधिक भक्तों की भीड़| भूलेश्वर मंदिर में शंकरजी विराजमान हैं|यह मंदिर तीन सौ साल पुराना है| मंदिर के मुख्य द्वार के ऊपर नगाड़ा खाना है जहाँ भोर होते ही नगाड़े और शहनाई की जुगलबंदी शुरू हो जाती थी….. अब घंटे और शंख बजाते हैं| माधवबाग में राधाकृष्ण का मंदिर है| नवरात्रि में यहाँ नौ दिनों तक लगातार यज्ञ होता है| माधवबाग से पांजरापोल की तरफ़ जाने पर भव्य जैन मंदिर है| पांजरापोल में भगवान कृष्ण हैं और गौशाला भी जहाँ भक्त गौ माता को हरी घास, लाबसी के लड्डू, गुड़ चना खिलाते हैं|राम मंदिर, समुद्री माता का मंदिर अब धरोहर मंदिर का दर्ज़ा पा चुका है|

१५० साल पुराना बड़ा जगदीश मंदिर आज भी मुम्बई में भगवान जगन्नाथ के गिने चुने मंदिरों में से एक है| पंचमुखीहनुमानजी के इस मंदिर में हर शनिवार भगवान शनिको तेल चढ़ाने की परम्परा है| श्री कृष्ण प्रणामी मंदिरमें भगवान कृष्ण के चरणों की पूजा होती है| भूलेश्वरके बड़े मंदिर परिसरों के अलावा लक्ष्मीनारायण मंदिर भव्य और आलीशान है| जलारामबप्पामंदिर के अलावा भूलेश्वर में और भी कई प्रसिद्ध मंदिर हैं|

मुम्बई और यहाँ के मूल निवासियों की अधिष्ठात्री देवी मुंबा का मंदिर शताब्दियों से एक दूसरे के पूरक हैं| भूलेश्वरऔर जवेरी बाज़ार की कुंभ के मेले जैसी भीड़ के बीच मुख्य शहर की सबसे घनी आबादी में प्रतिष्ठित है मुम्बादेवी का मंदिर| मुम्बा देवी नाम संस्कृत के महा अंबा से निकला जिनकी पूजा मुम्बई के मूल निवासी कोली व आगरी आराध्य देवी के रूप में पिछले छै: सौ सालों से पहले बोरीवली और अब भूलेश्वरमें करते आ रहे हैं| सिर पर चाँदी का मुकुट, नाक में नथुनी, गले में स्वर्णहार, साड़ी में लिपटी, गेंदेके फूलों से सजी वेदी पर विराजमान चमकदार लाल बालुई पत्थर मेंगढ़ी साढ़े तीन फुट ऊँची मुम्बादेवी की तेजस्वी प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता है उनका दिव्य मुख और विशाल नयन|सन्मुख है सिंह जो देवी की सवारी है| एक तरफ़ मोर पर अन्नपूर्णा देवी विराजमान हैं| मुख्य द्वार पर संगीत वाद्य बजाते साधुओं की मूर्तियाँ हैं| मुख्य परिसर में गणेश, हनुमान और अन्य देवी देवता विराजमान हैं| चूँकि मुम्बादेवी शहर के चार मंदिरों में से एक हैं जिस पर आतंकवादी हमले का ख़तरा मँडराया करता है इसलिए यहाँ कड़ी सुरक्षा के बंदोबस्त हैं|मंदिर के गर्भगृह में मुम्बादेवी ने आसपास के समुद्र का पाटा जाना और पूरे इलाके के भूगोल और कलेवर को बदलते देखा है| वे साक्षी हैं बोरीबंदर के विक्टोरिया टर्मिनस के निर्माण की जहाँ भूलेश्वर में स्थानांतरित होने से पहले उनका मंदिर हुआ करता था| यह १६७५ की बात है जब मुम्बई सात द्वीपों में बसा होता था|

मुंबा देवी के चारों ओर सोने चाँदी जवाहरात की दुकानें हैं| यह बाज़ार ज़वेरी बाज़ार के नाम से जाना जाता है| यहाँ किसी भी दुकान में आँख मूँदकर सौदा किया जा सकता है| सोने-चाँदी मेंज़रा भी मिलावट आज तक नहींपकड़ी गई| जिनके पास दुकानें नहीं हैंवे हथेलियों में हीरा, मोती, पन्नालिए खड़े रहते हैं और बिना किसी लिखित बिल के केवल ज़बान की शान में ये बिज़नेस चलता है|यहाँ मुस्लिम धर्म स्थल जमा मस्जिद भी है जो टैंक के ऊपर बनी मेहराब पर सुशोभित है|

मुम्बई में अन्य धार्मिक उत्सवों की तरह क्रिसमस भी अपने पूरे जोशो-जश्न से लबरेज रहता है| चैपल, चर्च, कैथेड्रल की शोभा देखते ही बनती है| मुम्बई को देश की चर्च राजधानी भी कहा जाता है| कुछ चर्च तो चार सौ साल सेभी ज़्यादा पुराने हैं| कुल १३६(एक सौ छत्तीस) चर्चों में से जो सबसे पुराने चर्च हैं वे पोर्चुगीज़ और ईसाई मिशनरियों के द्वारा बनवाये गये हैं| सबसे ज़्यादा चर्च ब्रिटिश शासनकाल में बने हैं|

हार्निमल सर्कल स्थित पश्चिम भारत का सबसे पुरानाएग्लिकन चर्च और गोथिक शैली के सुंदर फव्वारे व स्टेंड ग्लास की ऊँची खिडकियों वाला सेंट थॉमस कैथेड्रल गोथिक आर्ट की सबसे खूबसूरत मिसाल है|इसी चर्च की वजह से चर्चगेट नाम रखा गया|चर्च के अंदर प्रथम बिशप सर फ्रेडरिक लेविस मेटलैंड तथा कैप्टन निकोलस हार्डिंग की प्रतिमा तथा स्मारक है| ब्रिटिशकाल के कई ऐतिहासिक दस्तावेज भी यहाँ मौजूद हैं|

भूलेश्वर में बने कैथेड्रल का स्थान लेने वाला मुम्बई का दूसरा कैथेड्रल कोलाबा में है| ये मुम्बई के आर्चडॉयसिस का मुख्यालय और आर्कबिशप का घर भी है| यहाँ तीनों पोपों द्वारा भेंट की गई घंटियाँ, स्टोल और वाद्ययंत्र रखे हैं|चर्च ऑफ़ सेंट जॉन दि इवेंगलिस्ट चर्च कोलाबा में है जिसे अफगान युद्ध में मारे गये योद्धाओं की स्मृति में बनाया गया है| नियो गोथिक शैली में बना यह चर्च अपने शुरूआती दिनों में हॉर्बर में प्रवेश करने वाले पोतों के लिए इस बात का सूचक था कि मुंबई आ गया है|

सेंटएंड्रूज़ चर्च ४०० साल पुराना बांद्रा स्थित चर्च है जिसके निर्माण में कोलियों ने भरपूर योगदान किया|अम्बोली स्थित सेंट ब्लेज़ चर्च भी चार सौ साल पुराना है| माहिम का खूबसूरत चर्च विक्टोरिया चर्चतो ४५० सालसे भी पुराना चर्च है| माहिम में ही सेंट माइकल चर्च है जो सबसे पुरानी पुर्तगाली इमारतों में से एक है| बांद्रा स्थित माउंट मेरी चर्च की वर्जिन मेरी की प्रतिमा यहीं रखी हुई है| २७ जून २००८ को जीसस क्राइस्ट के चित्र से ‘खून बहने’ की कहानी ने पूरे मुम्बई को चकित करदिया था|

चर्च ऑफ़ ऑवर लेडी ऑफ साल्वेशन या पोर्चुगीज़ चर्च के नाम से मशहूर दादर स्थित चर्च १५ वीं सदी कापुर्तगालियों द्वारा बनवाया चर्च है| सेंटपीटर्स चर्च बांद्रा में है|बोरीवली में चर्च ऑफ़ इमैकुलेट कंसेप्शन फादर एंटोनियो डो पोर्टो नामक ईसाई मिशनरी ने बनवाया था|एक ज़माने में यहाँ रॉयल कॉलेज और ईसाई मठ भी था| बोरीवली की प्रख्यात मंडपेश्वर गुफाएँ इसके ताबे में थीं जो अब संरक्षक स्मारक घोषित  कर दी गई हैं|

आई आई टी पवई के सामने पहाड़ी पर होली ट्रिनिटी चर्च है| लेकिन मराठों के हमलों से अब वो खण्डहर होगया है| कहते हैं मूल चर्च विहार झील में समा गया है|

भायखला में बेहद खूबसूरत चर्च है क्राइस्ट चर्च जो नियो क्लासिकल श्रेणी का है| इसके अलावा ग्रांट रोड में १४६ साल पुराना इमैनुएल चर्च, उमरखाड़ी में मशहूर सेंट जोसेफ़ चर्च है|ये सब मुम्बई के प्रख्यात चर्च हैं| कुर्लामेंहोली क्रॉस चर्च भी १५ वीं सदी का है|

मरोल में सेंट जॉन इवेंगलिस्ट की जीसस क्राइस्ट, मदरमेरी और सेंट जॉन इवेंगलिस्ट की खूबसूरत मूर्तियों की वजह से मशहूर है यह चर्च| कोलाबा कॉजवे के पाससुन्दरसा, छोटा सा चर्च वेसेलियन मेथडिस्ट चर्च है|नगीनदास मास्टर रोड पर मुंबई का एकमात्र आर्मीनियन चर्च सेंट पीटर्स चर्च है| सैक्रेड हार्ट चर्च चैपल के रूप में वर्ली के कोली मछुआरों द्वारा बनाया गया| मझगाँव में सेंट ऐंस चर्च गिरजाघर के नाम से जाना जाता है| मालाड पश्चिम में ऑवर लेडी ऑफ़ लूडर्स ऑफ़ ऑर्लेम चर्च, वकोला में सेंट एंथोनी चर्च तथा फोर्ट में सेंट एंड्रूज़ ऐंड कोलंबाज़ चर्च है जो रिनुएशन के बाद बहुत शानदार हो गया है|ग्लोरिया चर्च मुम्बई के विशालतम और प्राचीनतम चर्चों में से एक है जो भायखला में है|

कोलाबा में अफ़गान चर्च है जो गोथिक कला का बेहतरीन नमूना है| यह चर्च १८४४ में उन ब्रिटिश सैनिकों कीस्मृति में बना था जो १४४३ के सिंध अफगान अभियानोंमें मारे गये थे| यह चर्च प्रोटेस्टेन्ट मतावलंबियों का है| चर्च की मीनार इतनी ऊँची है कि देखते ही सिर चकरा जाए| यह मीनार मुम्बई हार्बर जाने वाले जहाजों को रास्ता दिखाती है| चर्च को पार करते ही एक भव्यता का एहसास होता है| दीवारों पर शिलाएँ हैं जिन पर अफगान युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के नाम लिखे हैं| डोरिक स्टाइल में बने स्तंभ मन मोह लेते हैं|चर्च की जादुई खूबसूरती देखते ही बनती है|प्रार्थना हॉल में प्रवेश करते ही ढेरों मोमबत्तियों की लौ देख प्रार्थना के लिए हाथ जुड़ जाते हैं| एक ज़माने में यहाँ अंग्रेज़ों के बँगले हुआ करते थे जिन्हें सिक बँगलों के नाम से जाना जाता था|ब्रिटिश अफ़सर इन बँगलों में आराम और समन्दर के तट पर ताज़ी हवा और धूप के लिए आया करते थे| आज इन्हीं बँगलों की जगह आई एन एस अश्विनी अस्पताल की स्थापना की गई है|जीवन में तमाम दुरूह परिस्थितियों से गुज़रता हुआ इंसान हमेशा ईश्वर को याद रखे यह खूबसूरत अफगान चर्च शायद यही भूमिका अदा करता है|

ठाणे के प्राचीन चर्चों में कई चर्च चार सौ साल से भी पहले के हैं| सेंट जोज़ेफ़ चर्च वसई में ऐतिहासिक चर्च के रूप में जाना जाता है| ठाणे में सेंट जॉन दि बैप्टिस्ट चर्च, काशीमीरा में पुर्तगाली चर्च सेंट जेरोम पोखरण रोड पर स्थित पुर्तगाली चर्च ऑवर लेडी ऑफ़ मर्सी चर्च,डोंगरी उत्तन ऑवर लेडी ऑफ़ बेथलेहम चर्च| ये सारे चर्च सदियों बाद भी अपने स्थापत्य से लोगों को लुभाते हैं|

चर्चों के ऐसे खूबसूरत स्थापत्य और रखरखाव ने मुम्बई को विश्वविख्यात कर दिया है| सदियों पुराने और नए, ऐतिहासिक और पुरातात्विक हर दृष्टि में ये खरे उतरते हैं| वास्तुशैली भी कई प्रकार की और अद्भुत जैसे गोथिक, नियो क्लासिकल आदि| प्रोटेस्टेंट, केथोलिक और मेथडिस्ट चर्च इनके प्रकार हैं| कई चर्च तो स्कूल, कॉलेजसे भी सम्बद्ध हैं| कई के बड़े बड़े कैंपसऔर लचीली घास वाले मैदान हैं जो कंक्रीट का जंगल हो चुकी मुम्बई में ऐसे लगते हैं जैसे रेगिस्तान में नखलिस्तान| मकबरे और संगमरमरी फलक इन चर्चों की ऐतिहासिकता का परिचय देते हैं|स्टेंड ग्लास, टाइलफ्लोरिंग, पत्थरों और कास्ट आयरन केस्तंभ, लकड़ी के आल्टर्स, फर्नीचर, स्क्रीन, पियानो, वाद्ययंत्रों आदि की वजह से ये चर्च खूबसूरत बन पड़े हैं| इनमें लगे विशाल घंटे काँसे और लेड के बने हैं….. कुछ का वज़न तो एक हज़ार किलो तक है और कीमत बीस लाख रुपए तक| इनमें कई घंटे दूसरे देशों से आये धार्मिक और राजनीतिक मेहमानों ने उपहार या दान में दिये हैं| इन घंटों के मेंटनेंस का बहुत अधिक ख़र्च आने के कारण कई चर्चों में अब इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग का इंतज़ाम करा लिया है|

मुम्बई की ख़ास रौनक थे यहाँ के शानदार बँगले…..

वैसे तो मुम्बई जो किसी ज़माने में हरा भरा नदी, सरोवरऔर समँदर को अपने आगोश में समेटे पूरी दुनिया को आकर्षित करता था, अब विकास के जुनून में कंकरीट के जंगलों में बदलता जा रहा है| बहुमंज़िली इमारतें मॉल, मेट्रो और बढ़ती जनसंख्या इसकी पहचान बन गये हैं लेकिन पारसियों, मारवाड़ियों, पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों के कुछ बँगले अब भी यदा कदा मुम्बई की रौनक कहे जा सकते हैं| हालाँकि कई बँगलों ने अब रूप भी बदल लिया है|

मझगाँव में सर जमशेदजी जीजीभॉय मेंशन अब सेल्स टैक्स ऑफ़िस हो गया है| भायखला की लवलेन में पुराने रईस प्रेमचंद रायचंद का १८वीं सदी का राजसी बँगला ‘प्रेमोद्यान’ जिसका मार्क ट्वेन ने अपने यात्रा संस्मरणों में उल्लेख किया है अब रेजिन पासीस कॉन्वेंट का बालिका अनाथालय हो गया है और हिल रोड बांद्रा का भल्ला हाउस स्कूल बन गया है| पैडर रोड का ‘गुलशन महल’ फिल्मी संग्रहालय है| टर्नर रोड का ‘टेहमीटेरेस’, बोरीवली का ‘गार्डनस्ट्रीट’, मढ़ मार्वे रोड का ‘पूनावाला बंगलो’, ‘नायर बंगलो’, ‘कुमारविला’ और ‘बसीननेस्ट’ में अब फिल्मों की शूटिंग होने लगी है| कई बँगले पुलिस और रेलवे अधिकारियों के आवास हैं|

अल्ट्रामाउंट रोड पर कई एकड़ में फैला पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक का ८९ साल पुराने बंगले ‘बम्बारसी’ में रिचर्ड एट्नबरो की ऐतिहासिक फिल्म “गाँधी” की शूटिंग हुई थी| इस बँगले में १९२६ में बनी सौर घड़ीहै जो आज भी सूर्य की स्थिति के साथ चलती समय बताती है| १८६८ में निर्मित पीतल का विशाल घंटा जो किसी ज़माने में रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को गाड़ी छूटने की सूचना देता था और १८७० में बनी चाभी वाली पाँच फुट ऊँची पेन्डुलम घड़ी विशेष आकर्षण का केन्द्र है|

बांद्रा की पेरी क्रॉस रोड पर १९३० में बना बाग़ बगीचों से घिरा नीलवर्ण बंगला है ‘पीस हैवेन’ इसे इंग्लैंड के वैलेंटाइन ने अपनी खूबसूरत बीवी को शादी के तोहफ़े के रूप में दिया था| यही नहीं उन्नीसवीं सदी में जब मुम्बई का क्षितिज विक्टोरियन शैली की सरकारी इमारतों से भर रहा था,न्यू गोथिक डिज़ाइन के बहुत से विला और बंगले बने| कालचक्र में कुछ जीर्ण-शीर्ण हो गये और कुछ को कंक्रीट का जंगल निगल गया| बड़े-बड़े उद्योगपतियों टाटा, गोदरेज, रुइया, बिड़ला और अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान जैसे सुपरस्टार्स के बंगले पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं| लेकिन बाकी शहर गगनचुम्बी इमारतों के माचिस की डिब्बी जैसे फ्लैट्स में रहने को मज़बूर हैं| वो भी इतने महँगे कि शायद उस ज़माने में उतने महँगे दाम चुकाकर तो ये बँगले भी नहीं बने होंगे| मलाबार हिल, कफ़ परेड, मरीन ड्राइव, क्वींस रोड, कंबाला हिल, ब्रीच कैंडी, कोटा चीवाड़ी, माथार पैकेडी और उपनगरों में बांद्रा, सांताक्रुज़,बोरीवली, मालाड में ये बंगले दिखाई देते हैं|

शाहरुख़ ख़ान ने ‘विला वियना’ मात्र नौ करोड़ में ख़रीदकर उसे मन्नत नाम दिया| बांद्रा बैंड स्टैंड में समुद्र मुखी ये बंगला आकर्षण का केन्द्र है| शांत माहौल, ऊँचे-ऊँचे पैडिस्टल पर बने लिविंग हाउस की ओर जाती खुली, दोहरी व घुमावदार सीढ़ियाँ,मैनिक्योर्ड बागीचे, टेरेस गार्डन व आउट हाउस, लम्बे चौड़े संगमरमरी बरामदे, ऊँची सीलिंग, सजी सँवरी बालकनियाँ, टैरेस, ड्राइव वे, स्टैंड ग्लास, खिड़कियाँ,आर्च और कॉलम, पत्थर, कास्ट, आयरन और बर्मा टीक का बेहतरीन काम….. मन्नत के क्या कहने?

मुम्बई में अमिताभ बच्चन के पाँच बंगले हैं लेकिन लोगों के आकर्षण का केन्द्र है जुहू स्थित‘प्रतीक्षा’ और‘जलसा’| दस हज़ार वर्ग फीट में फैला ‘जलसा’ एक दो मंज़िला बंगला है| इसी के पीछे अपनी पोती आराध्या के लिए ६० करोड़ में नया बंगला बनवा रहे हैं अमिताभ बच्चन|आराध्या के बंगले में खेलने के लिए बगीचा और बड़ा सा लिविंग रूम है जिसमें प्राकृतिक चीज़ों की भरमार है| ये बंगला जलसासे एक खूबसूरत मार्ग द्वारा जुड़ जाता है|उनका एक और बंगला है जुहू स्थित ‘जनक’ जहाँ वे मीडिया और मेहमानों से मिलते हैं|

बांद्रा के कार्टर रोड में ‘आशीर्वाद’ बंगले की पहचान अपने ज़माने के सुपर स्टार राजेश खन्ना से है जबकि पहले इसका नाम ‘डिम्पल’ था और ये राजेन्द्र कुमार का था| राजेश खन्ना की मृत्यु के बाद ‘आशीर्वाद’ को उद्योगपति शेट्टी ने ख़रीद लिया| पचास साल पुराने इस बंगले की जगह अब मल्टी स्टोरी इमारत बनेगी| ‘आशीर्वाद’ ६५०० वर्ग फीट एरिया का है|

ट्रेज़ेडी किंग दिलीप कुमार और नाज़ुक सायरा बानो का बंगला ‘दिलीप कुमार एंड सायरा हाउस’ कहलाता है|

शिवाजी पार्क स्थित ‘मेयर हाउस’ नामक बंगला जिसमें मुम्बई के मेयर (महापौर) रहते थे को अब बाल ठाकरे स्मारक में तब्दील किया जा रहा है|

चौंकाने वाली सच्चाई ये है कि खुद को मीरा, दुर्गा, देवी कहने वाली और ये दावा करने वाली कि उनका ईश्वर से सीधे वार्तालाप होता है और जो पिछले सालों से समाचार चैनलों का मुख्य किरदार हैं ऐसी तथाकथित राधे माँ का मुम्बई के चीकूवाड़ी एरिया में स्थित महलों जैसा बंगला है जिसकी कीमत २५० करोड़ है|

मशहूर उद्योगपति और आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमेन कुमारमंगलम बिड़ला का मुम्बई के मलाबार में स्थित बंगला ‘जटिया हाउस’ जो कि समुद्र मुखी हैदो मंज़िला है| जिसे उन्होंने ४२५ करोड़ रुपयों में ख़रीदा था|

भले ही बेतरतीब इमारतों ने महानगर के सौंदर्य को फीका कर दिया है पर आज भी माउंट नैपियन, म्युनिसिपल कमिश्नर बंगलों जैसे बड़े बंगलों का ही नहीं भूलेश्वर, नल बाज़ार, कोटा ची वाड़ी के पुर्तगाली प्रभाव औरपुराने फैशन के बंगलों का सौंदर्य बरकरार है|बंगले के बेडरूम को सड़क से जोड़ने वाली लकड़ी की सीढ़ियाँ यहीं दिखेंगी| तीन सौ साल पुराने मझगाँव गाँवठन में गारे में गुड़ और चीनी डालकर बनाए गये माथेरपाखड़ी के बंगले आज भी उतने की मज़बूत हैं जितने उस ज़माने में थे जब यहाँ से लज़ीज़ आमों के टोकरे भरकर मुगल बादशाहों के दरबार में जाया करते थे|

खुली हवा, फूलों की छटा बिखेरते बगीचे चहारदीवारी से सटे फलों से लदे दरख़्त जिनकी शाखों पर दौड़ती गिलहरियाँ, चहचहाती चिड़ियाँ,कुहुकती कोयल, हरी घास के लॉन पर ख़रगोशों की उछलकूद….. माथेरपाखड़ी के बंगले आज भी ऐसे दृश्यों से भरपूर हैं| कोटा ची वाड़ी में डेढ़ सौ साल पुराने भव्य दिव्य डॉयसहाउसकी जगह अबगगनचुम्बीइमारतहै| पहलेयहाँ६५बंगलेथे,अब १७ बचे हैं| कमरशिलाइज़ेशन की वजह से बचे हुए बंगलों का भविष्य भी दाँव पर लगा है क्योंकि लगातार हो रहा निर्माण उनकी नींव को कमज़ोर कर रहा है|

बैंड स्टैंड में सूर्यास्त के सुरमई, नारंगी रंगों के मायाजाल में उलझे प्रेमी जोड़े दूर-दूर तक दिखाई दे जाते हैं| विदेशी पर्यटकों को बहुत लुभाता है बैंड-स्टैंड| मुम्बई की पहचान भेलपूरी, नारियल पानी और खारी सींग यानी नमकीन मूँगफली के स्टॉल या टोकरी में भरे बेचते लड़के पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं| यहीं जॉगर्स पार्क है जहाँ सुबह शाम योगा करते, दौड़ते, घूमते, साईकल चलाते लोग परवाह भी नहीं करते कि उन्हीं के बीच साईकल चलाता आज का सुपर स्टार सलमान ख़ान भी है| समुद्री लहरों से टकराता बांद्रा फोर्ट आज भी अतीत को दोहराता है….. खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी….. सत्रहवीं सदी का यह पुर्तगाली किला अब मात्र पत्थरों की ऊँची ऊँची दीवारों, अहातों, मुँडेरों, बुर्जियों, बारादरी, झरोखे और विशाल द्वार का जीर्ण शीर्ण अवस्था में अपने अतीत की शानदार कहानी कहता नज़र आता है| पत्थरों की दीवारों पर बुर्जियों पर घास उग आई है| एक ओर अरब सागर और बाकी तीन ओर नारियल के पेड़, गगनचुम्बी इमारतें हैं फिर भी काले पत्थर के इस किले की भव्यता के आगे बौनी नज़र आती हैं|

मन्नत से माउंट मेरी चर्च की चढ़ाई शुरू होती है| जो समुद्र सतह से अस्सी फीट की ऊँचाई पर बना है| पहाड़ी अब दिखती नहीं क्योंकि अब वहाँ रहायशी घर आबाद हैं|पहले यह एरिया सुन्दरबन बांद्रा कहलाता था| ऊँचाईकी ओर जाती सड़क पर किनारे लगे दरख़्तों के फूल, जर्द पत्तों का कालीन बिछा रहता है| ऐसा लगता है जैसे किसी पहाड़ी शहर में आ गये हों|शांत, हरा भरा और समुद्री हवाओं से गूँजता सा| वहीं है चर्च जो सौ साल पुराना है|हालाँकि यह पुर्तगालियों द्वारा १६४० में स्थापित किया गया था| काफी समय तक यह एन्शियंट चर्च के नाम से जाना जाता रहा|  १७६१  में इसका पुनरुद्धार हुआ तब यह ‘दि बसालिका ऑफ़ अवर लेडी ऑफ़ दि माउंटेन’ नाम से जाना गया ।लेकिन अब यह रोमन कैथलिक बसलिका यानी माउंट मेरी चर्च नाम से जाना जाता है| यह वर्जिन मेरी को समर्पित है| कहते हैं कोली मछुआरे को वर्जिन मेरी की मूर्ति समुद्र में तैरती नज़र आई थी जिसे उसने यहाँ लाकर स्थापित किया था| यह अंग्रेज़ी स्थापत्य का बेहतरीन नमूना है जिसको सीढ़ियाँ चढ़कर अंदर प्रवेश करते ही चर्च की भव्यता का एहसास होता है| ऊँची-ऊँची दीवारें और प्रार्थना गृह फ्रांसीसी सभ्यता का एहसास कराता है| सामने क्रॉस पर प्रभु यीशु और उन्हें दुलारती मदर मेरी| ८सितम्बर को वर्जिन मेरी का जन्मदिन मनाया जाता है जो पूरे एक हफ़्ते चलता है| इसे‘बांद्रा फेयर’ कहते हैं| हज़ारों लोगों की भीड़ से यह इलाका सप्ताह भर चहल पहल से भरा रहता है। मेले में तरह तरह की चीज़ों के स्टॉल तो लगते ही हैं| विशेष तौर पर मानव अंगों की आकृति के आधार पर बनाई मोमबत्तियाँ मेले का आकर्षण रहती हैं| इन्हें ख़रीदकर श्रद्धालु सड़क के उस पार मदर मेरी की मूर्ति के सामने जलाते हैं| यह मूर्ति कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर ऊँचाई पर स्थित है| सीढ़ियाँ मूर्ति के दोनोंओर बनी हैं| एक तरफ़ से लोग चढ़ते हैं, दूसरी ओर से उतरते हैं|ऊँचाई से दिखते समँदर का खूबसूरत नज़ारा देखते ही बनता है| बाकी के दिनों में यह इलाका बेहद शांत रहता है|

बांद्रा में फादर एन्जिल चर्च और लिंकिंग रोड मार्केट भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है| लिंकिंग रोड मार्केट शॉपिंग के लिए बहुत सारी वेरायटी और वाजिब  दामों वाला बाज़ार माना जाता है ख़ास कर लेडीज़ कपड़े, जूलरी, सैंडिल आदि के लिए मशहूर है|

बांद्रा वर्ली सी लिंक….. रोमांचकारी सफ़र…..

बांद्रा रिक्लेमेशन से वर्ली की आधा घंटे की दूरी आठ मिनट से भी कम समय में!! सचमुच यकीन नहीं होता, मगर ये संभव कर दिखाया है बाँद्रा वर्ली सी लिंक ने| सचमुच ये सफ़र बेहद रोमाँचकारी है| सी लिंक पर बने विशालकाय तारों से सुसज्जित ब्रिज सम्मोहित कर लेता है और जब उसके बीच से गुज़रती हैं गाड़ियाँ तो लगता है मानो साँसें थम जाएँगी| इतने खूबसूरत नज़ारे को देख भला कौन नहीं इसके इश्कमें पड़ जाएगा|निश्चित रूप से बाँद्रा वर्ली सी लिंक एक लैंडमार्क बन गया है जो मुम्बई की शिल्पकला की अद्भुत मिसाल है| प्रवेश करते ही विशालकाय स्तंभों के नीचे से समँदर की लहरों का संगीत सुनाई देने लगता है| इन स्तंभों का निर्माण मुम्बई की लाइफ़ लाइन कही जाने वाली नेटवर्क केबल को बिना नुकसानपहुँचाये किया गया है|येकेबल समँदर के अंदर बिछाई गई है| गाड़ी की खिड़की से दोनों ओर ऊँची उठती लहरें एहसास कराती हैं जैसे किसी क्रूज़ का सफ़र हो|

भारत में यह सी लिंक पहला सी लिंक है| यह खूबसूरत ब्रिज ५.६ किलोमीटर लम्बा है और ५०० मीटर तक केबल पर टिका है| हर ओर चार लेन हैं| हर दिशा में बेस्ट बसों के लिए अलग लेन है| इसके मुख्य तोरण की ऊँचाई १३० मीटर है|जो ६० मंज़िल इमारत की ऊँचाई के बराबर है| ब्रिजका वज़न ५० हज़ार हाथियों के वज़न के बराबर है|एक हाथी का वज़न कम से कम पाँच टन होता है| ब्रिज में सीमेंट की 2 लाख बोरियों और ३५ हज़ार टन स्टील का इस्तेमाल हुआ| ब्रिज की पूरी लम्बाई पृथ्वी के व्यास के बराबर करीब ४० हज़ार किलोमीटर है|यह ब्रिज वर्ली से हाजी अली होते हुए नरीमन पॉइंट तकहै| सोलह लेन का आधुनिक टोल प्लाज़ा है और इसे एम एस आर डी सी के लिए मैसर्स हिन्दुस्तान कंस्ट्रक्शन ने बनाया है| इसकी लागत १६३४ करोड़ रुपए है और फ्यूल की बचत २६० करोड़ रुपए प्रतिवर्ष|

मुम्बई के खूबसूरत समुद्र तट….. जहाँ समुद्र बतियाता है हमसे 

जब भी वर्ली सी लिंक से गुज़रती हूँ लगता है समँदर मेरा हमसफ़र है| नजाने मुझसे कहाँ-कहाँ की सैर करा देता है| न जाने कितने तटों पर बैठाकर अपनी लहरों से मुझे छूता है, बतियाता है| मानो कह रहा हो….. मैं तुम्हारी हँसी में समा जाना चाहता हूँ|हवा की तरह भर जाना चाहता हूँ तुममें| उड़ा देना चाहता हूँ तुममें जमा दुख-पीड़ा….. मैं अचकचा जाती हूँ|याद आता है जुहू सागर तट जो मेरे मुम्बई आगमन का पहला साक्षी है| मुझे जुहू सागर के हृदय में समाता सूरज का नारंगी गोला देखना था| केवल पंद्रह मिनट बाकी थे सूर्यास्त के और टैक्सी ट्रैफ़िक खुलने की बाट जोह रही थी|और मानो समँदर पुकार उठा कि जैसे खिंची चली गई मैं….. जल्दी जल्दी रेतीले तट पर पहुँची कि पूरा क्षितिज सुनहला, नारंगी, सलेटी रंगों से सराबोर हो उठा| धीरेधीरे सूरज विशाल सागर की बाँहों में समा गया|मुम्बई में सागर के इस प्रथम दर्शन ने मुझे लुभा लिया….. दूर दूर तक फैले तट पर झूमते नारियल वृक्ष….. इक्का दुक्का घोड़ों में सागर से होड़ लेने घुड़सवारी करते अमीरज़ादे या पर्यटक….. भेलपूरी, नारियल पानी, खारी सींग (मूँगफली) चना की टोकरी गलेसे लटकाये लड़के….. और इस सबके बीच रेत पर तरह तरह की कलाकृतियाँ रचता कलाकार….. मेरे देखते ही देखते उसने रेत पर राधाकृष्ण को उकेर कर जीवंत किया| ओह….. लाजवाब….. लगताजैसे कृष्ण अभी राधे-राधे पुकार पड़ेंगे| मुम्बई की यह रेत कला अद्भुत है|

मालाड के करीब है अक्सा बीच |पामवृक्षों की यकसां कतार को छू-छू कर हवा सन्नाटे को चीरती मुझे भी मानो संग-संग बहा ले जाने को आतुर थी|निर्जन तट पर सागर की गरजती लहरें टकरातीं तो लगता न जाने कौन सा इतिहास सुना डालने को आतुर हैं| सैलानी सिर्फ तट पर चहलकदमी कर रहे थे, कोई तैर नहीं रहा था| मनचली लहरों का आक्रामक रवैया तैराकों के कदम वापिस लौटा रहा था| अक्सा से मड आयलैंड की ओर चलने पर तीन-चार किलोमीटर के बादएक छोटी सी पहाड़ी है जिससे नीचे उतरते ही खूबसूरत एरंगल तट है| अक्सा जैसा ही निर्जन| इक्का दुक्का सैलानियों के अलावा तट पर भागते केकड़ों और सागर लहरों की ही हलचल थी| यहाँ पाँच सौ वर्ष पुराने किले के खंडहर हैं जिनकाइतिहास समय की परतों के नीचे दबा पड़ा है| बम्बई का हर तट दूसरे तट से मेल नहीं खाता|एरंगल तट से चार कि.मी. की दूरी पार कर मड जेट्टी की ओर चलने परमड चर्च दिखाई देता है| चर्च के सामने ही मड बीच है| यहाँ हरियाली बहुतअधिक है| जिससेयहाँ की शोभा द्विगणित है|यहाँ पेड़ों के बीच टेंट बने हैं| मन तो था कि इन टेंट्स में एक दो रातें गुज़ारी जाएँ और अर्धरात्रि के समँदर का निराला रूप देखा जाए पर समय नहीं था| अगर वहाँ रूकती तो एक अलग अनुभूति का आभास होता|

मालाड से ही मार्वे आकर और फिर फेरी से उस पार पहुँचकर ताँगे से मनोरी और गोराई बीच तक की सैर एक अद्भुत सफ़र है| गोराई पहुँच कर लगा जैसे समय पीछे लौट गया हो जब नगर आबाद नहीं हुए थे और जब बम्बई सिर्फ मछुआरों की थी| मछली की तेज़ गंध ने आभास दिला दिया था कि यह सम्पूर्ण इलाका मात्र मछुआरों का है| रास्ते के दोनों ओर बाँस से बँधी रस्सियों पर कतार से सूखती मछलियाँ| आगे चलकर तट पर कैसुआरिना के लम्बे लम्बे वृक्ष और पाम वृक्षों की सघनता मन मोह रही थी| यहाँ तैरना जोखिम भरा है| सागर काफी दूर तक सपाट दिखाई देता है| गहराई और उथलापन पता नहीं चलता|

मनोरी सागर तट मछुआरों की बस्ती से हटकर है| यहाँ बने कॉटेज मन मोह लेते हैं| सागर किनारे रात बिताने की चाह इन कॉटेजों में और भी रोमेंटिक हो जाती है| निर्जन रात में सागर कुछ कहता सा जान पड़ता है| सदियों से सागर अपने अंदर कितनी कहानियाँ समेटे बह रहा है, कितनी घटनाओं का साक्षी है वह|

अब बम्बई और भी विस्तृत होता जा रहा है| जो गाँव उपनगर पहले अपना अलग अस्तित्व रखते थे अब वे भी बम्बई में समाते जा रहे हैं| ऐसा ही खूबसूरत और अनछुआ सागर तट है दहाणु| यहाँ आकर बुक शील्ड और क्रिस्टोफ़र एटकिन का ब्लूलैगन आँखों के सामने से फिल्म की रील की तरह गुज़र जाता है|गहरी भरी रेत पानी की सतह के क़रीब कुछ सख़्त सी है| ऐसा लगता है जैसे रेत की घाटी पहाड़ से पानी तक  उतर गई हो| रेतीला फिसलन जैसी आकृति का कटाव जिस परसमंदर की फेन भरी लहरें आकर टकरा-टकरा  जाती हैं| पीछे की ओर कैसुआरिना और मेन्ग्रोव्ज़ की उठी हुई जड़ों वाले पेड़ों के झुरमुट से गुज़रती हवा समुद्री संगीत सुनाती है| बेहद खूबसूरत है दहाणु….. विरार से कुछ ही दूरी पर स्थित दहाणु चीकुओंके लिए प्रसिद्ध है|चीकू के बड़े बड़े बगीचे, आम और किवी के फॉर्म हाउस हैं| ये फॉर्म हाउस धनाढ्य वर्ग, उद्योगपति और फिल्मी हस्तियों के हैं|चीकू के विशाल उद्यान में टेंट हाउस में रात बिताना और डाकबंगले और रेस्टॉरेंट में जाकर ज़ायक़ेदार, लज़ीज़ भोजन करना कुछ देर के लिए भुला देता है कि बम्बई आपाधापी भरा शहर है| सुबह उठकर दूर दूर तक फैले सफ़ेद बालू के सागर तट पर घूमना बहुत अच्छा लगता है| विण्ड सर्फिंग के लिए यह एक आदर्श स्थान है क्योंकि यहाँ हवा का बहाव पचास से साठ कि. मी. प्रतिघण्टा रहता है| वैसे सर्फिंग के लिए अपना उपकरण हो तो यहीं उत्तर में घोलवाड़ तट तक मज़े से विन्ड सर्फिंग की जा सकती है|

दहाणु पारसियों की काफी पुरानी बस्ती के रूप में प्रसिद्ध है| १४०० वर्ष पहले जो सबसे पहला पारसी जोरस्टियुम परिवार यहाँ आकर बसा था उसके अवशेष अब भी वरासद हिल्स की गुफ़ा में पवित्र अग्नि के रूप में हैं|

अलीबाग, नाम सुनकर लगा था जैसे किसी मुस्लिम शासक द्वारा बनवाया कोई बाग होगा लेकिन यह भी एक समुद्र तट ही है| दूर दूर तक फैले तट पर कैसुआरिना और नारियल के दरख़्त समुद्री हवाओं से अठखेलियाँ कर रहे थे| यहाँ अली बाग नामक एक किला है जिसके आसपास चट्टानें ही चट्टानें हैं| समुद्र के बीच में कोलाबा फोर्ट है| जब समुद्र में ज्वार रहता है तो कोलाबा फोर्ट पानी के बीच जहाज सा तैरता नज़र आता है लेकिन हम तो पैदल चल कर गये थे क्योंकि तब समुद्र में भाटा था, लहरें पीछे लौट गई थीं| पिछले तीन सौ वर्षों से यह फोर्ट समुद्र की लहरों के नमकीन थपेड़े झेल रहा है फिर भी इसका आधार स्तंभ जैसे का तैसा है| अंदर मंदिर भी है जिसमें गणपति, महादेव और मारुति की मूर्तियाँ हैं|मुख्य भूमि पर हीरा कोट किला है इसे १७८२ में मराठा सरदार आंग्रे ने बनवाया था| अब यहाँ कारावास है| जिसका ऐतिहासिक महत्व है|

अलीबाग से आठ कि. मी. उत्तर की ओर किहिम समुद्र तट है| यह समुद्र तट लम्बी समुद्र रेखा के लिए प्रसिद्ध है| सफेद रेत और लाल मिट्टी के बीच कैसुआरिना के दरख़्त और मेन्ग्रोव्ज़ के झुरमुट मन मोह लेते हैं| किहिम आकर लगा जैसे यहाँ के माहौल में मंत्रमुग्ध करने और जीने के लिए भरपूर जोश भरने की अद्भुत कला है| समुद्र तट पर नारियल के पेड़ों के बीच टेन्ट बने हैं| लगता है जैसे सैनिकों ने पड़ाव डाला हो|आधुनिक सुविधाओं से युक्त इन टेन्टों में प्रकृति के नज़दीक खूबसूरत पलों को गुज़ारना अपने आप में एक बेहतरीन दिन रात होगी, निश्चय ही|

किहिम के समीप ही कणकेश्वर हिल है| पत्थर की ७५० सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, भगवान शिव के प्राचीन मंदिर तक जाने के लिए|

बंबई तीन ओर से समुद्र तटों से घिरा महानगर है| मुख्य हिस्सों से थोड़ी दूरी पर है मुरुड का पाम वृक्षों से आच्छादित समुद्र तट| विशाल जलराशि के ऐन बीचों बीच किला है जो जंजीरा किला कहलाता है| यह सत्रहवीं शताब्दी में बना था और हमेशा अपराजेय रहा| किले तक पहुँचने के लिए हमनेराजपुरीसे बोट ली थी| न जाने कैसे बनाया गया होगा समुद्र के बीच यह किला| मुरुड तट पर कहीं-कहींबेतरतीब फैली चट्टानें भी हैं जो कुछ ही हिस्सों में हैं| बाकी जगहों से लोग आराम से तैराकी, गोताखोरी कर रहे थे| मुरुडके नज़दीक नवाब का महल, दत्त मंदिर खासा किला दर्शनीयहैं|

मुम्बई के आसपास के क्षेत्रों में ढेरों समुद्र तट हैं और ख़ासियत ये कि एक समुद्र तट दूसरे समुद्र तट से बिल्कुल अलहदा है| मुम्बई से ६० कि. मी. के फासले पर बेसिन समुद्र तट है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ ऐतिहासिकऔर धार्मिक संगम स्थलहै| कुछ तो ऐसे अनछुए तट हैं जहाँ पहुँचकर प्रकृति से सीधा साक्षात्कार होता है| उन्हीं में से एक है गणपति पूल तट|तट के किनारों की मिट्टी लाल है जिसमें उगी हरियाली मन मोह लेती है| सुबह शाम सूरज की रोशनी से नहाया यह तट नारियल और सुपारी के वृक्षों और भी अनेक प्रकार के वृक्षों से घिरा बेहद आकर्षक लगता है| किनारे की मिट्टी लाल है पर पूरे तट पर बिखरी चाँदी सी रेत है जो सूरज की किरणों में झिलमिलाती रहती है| ऐसी ही सफेद रेत और बेहद साफ़ पानी वाला सागर तट है “हरनाइ तट”….. तट पर पाम वृक्ष हवा में झूमते रहते हैं| तट के उत्तर में हरनाइकिला है| किले की हर ईंट, हर पत्थर यहाँ शासन करने वाले महान राजाओं का गरिमामय वर्णन कहते से लगते हैं|

मुम्बई के उत्तर पश्चिम में अद्भुत विशेषता वाला एक तट ‘माधद्वीप तट’ है| इसकी विशेषता है यहाँ की ग्रामीण पृष्ठभूमि जो उन बंगलों से एकदम विपरीत है जो यहाँ कतार में दिखलाई देते हैं|श्रीवर्धन हरि हरेश्वर तट की विशेषता है यहाँ की ठंडी हवाएँ जो इसकी नरम रेत पर घूमते हुए मन को तरोताज़ा कर देती हैं|यहाँ का सागर आमंत्रण देता सा लगता है| यहाँ पेशवा स्मारक और हरिहरेश्वर मंदिर तो देखने लायक हैही साथ ही यहाँ स्टॉलों पर कई किस्म के व्यंजन भी मिलते हैं|

तर्करली तट तो मानो पूरी पृथ्वी का ही अनछुआ तट है| यहाँ की सुंदरता भी अद्भुत, अछूती है| सागर चमकदार नीले पानी वाला है| कतारबद्ध पेड़ों से घिरा संकरा और लम्बा तट है| यहाँ भाटा आने पर २० फीट की गहराई तक समुद्र दिखलाई देता है|

तैराकी के लिए प्रसिद्ध है वेलनेश्वर तट जहाँ शिवमंदिर भी है और सफेद बालू से भरे तट पर नारियल के पेड़ हैं|

जुहू तट के उत्तर में वरसोवा तट है| इसी तट पर मछुआरों की नौका में बैठकर सागर की उत्ताल तरंगों पर डोलती नौका में किसी तरह संतुलन बनाकर मैंने अपने पति के अस्थिपुष्प विसर्जित किये थे|

वेंगुरला, मालवान तट भी सफेद रेत वाले सागर तट हैं| यहाँ देवी सतेरी मंदिर और रामेश्वर मंदिर हैं| तटपर काजू, नारियल, कटहल, आमके पेड़ हैं| इन सब तटों में मुम्बईवासी और पर्यटक कम ही जाते हैं….. ज़्यादातर दादर बीच, माहिम बीच, वर्ली बीच, मार्वे बीच, मानेरी बीच, गोराई बीच पर ही पर्यटकों की भीड़रहती है| ये सारे प्रदूषण से मुक्त शांत समुद्री तट हैं| अक़्सर चाँदनी रात में यहाँ खूब पार्टियाँ होती हैं|

हरे भरे पर्वतीय सैरगाह…..

प्रकृति ने न केवल सुरम्य तटों की समृद्धि मुम्बई कोदी है बल्कि अरब महासागर के साथ-साथचली गई समुद्र रेखा के सामानांतर पश्चिमी घाट माथेरान, खंडाला, लोनावला, अम्बोली, एम्बीवैली और महाबलेश्वर जैसे हरे भरे पर्वतीय सैरगाह भी हैं जिन्हें मुम्बई वासी हिलस्टेशन कहते हैं|

महाबलेश्वर समुद्र तट से १३८० मीटर की ऊँचाई पर बेहद खूबसूरत हिलस्टेशन है| ऊँची पर्वतीय चोटियाँ, भय पैदा करने वाली घाटियाँ,चटख़ हरियाली, ठण्डी पर्वतीय हवा, झील, हरे भरे घने जंगल और स्ट्रॉबेरी के बगीचों की शोभा देख कुछ पल के लिए मुम्बई की उमस भूल गई थी मैं| ब्रिटिश शासन काल में बॉम्बे प्रेसीडेंसी की यह ग्रीष्मकालीन राजधानी थी| महाबलेश्वर में बेबिंगटन पॉइंट, धूम डैम, पंचगंगा मंदिर जहाँपाँच नदियों का झरना है| ये पाँच नदियाँ हैं कोयना, बैना, सावित्री, गायत्री और कृष्णा नदी| यहाँ स्वयंभू शिवजी का मंदिर जागृत मंदिर माना जाता है| स्ट्रॉबेरी के बगीचे, महाबलेश्वर की ख़ास पीली रंग की मीठी गाजर पर्यटकों की पहली पसंद है| झील में बोटिंग करने से पहले बंदरों के झुंड से मुलाकात मानो एक शगल ही है|

महाबलेश्वर से आगे पंचगनी तो मानो मुम्बई का शांतिनिकेतन ही है| तमाम शिक्षाकेन्द्रों से युक्त है पंचगनी| दूर-दूर से विद्यार्थी यहाँ पढ़ने आते हैं| पंचगनी का अर्थ है पाँच पहाड़ियों से घिरा| यह महाबलेश्वर से ३८ मीटर नीचे १३३४ मीटर की ऊँचाई पर है| एक ओर कृष्णा नदी, दूसरी ओर तटीय मैदान| पुराने युग की वस्तुओं से सजा यह एक आवासीय पर्वत स्थल है| यहाँ ब्रिटिश कालीन भवनों की वास्तुकला,पारसी घर, बोर्डिंग स्कूल और घर भी हैं जो एक शताब्दी पुराने हैं| उस युग को अगर डूब कर देखना है तो किसी पुराने ब्रिटिश काल के घर या पारसी घरों में पर्यटक की हैसियत से रहना होगा|

मुम्बई के दक्षिण पूर्व में सौ किलोमीटर की दूरी पर खंडाला, लोनावला जैसे सुरम्य स्थल हैं जो खूबसूरत सूर्यास्त और छोटे-छोटे ढेरों जलप्रपातों के लिए प्रसिद्ध हैं| बारिश के मौसम में पर्वतों से निकलते जलप्रपात देखना बहुत मनमोहक लगता है| खंडाला घाट पर अमृतांजन पॉइंट क सबसे बड़ा पर्यटन स्थल है|विशाल हरियाली घाटी के दृश्यों की सुंदरता देखते ही बनती है जिसके आसपास ड्यूक नोज़ मानो घूमती नज़र आती है| खंडाला और लोनावला में मात्र पाँच किलोमीटर का फासला है| 

माथेरान महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में स्थित है| सह्याद्रि पर्वत माला पे बसा यह खूबसूरत पहाड़ी स्थल समुद्र सतह से ८०३ मीटर की ऊँचाई पर है| माथेरान ठंडा और कम नमी वाला स्थल है जहाँ नाम को प्रदूषण नहीं है| यह मुम्बई से सौ किलोमीटर की दूरी पर है|यह अंग्रेज़ों द्वारा बसाया गया है जहाँ टॉय ट्रेन से जाते हुए तमाम वैलियों से गुज़रना पड़ता है| माथेरान यानी चोटी पर जंगल….. माथेरानसाल भर तो हरियाली से घिरा रहता ही है बारिश में यह और अधिक निखर जाता है| माथेरान तक तो अपनी प्राइवेट गाड़ियों से जाया जा सकता है लेकिन अंदर की खूबसूरती बची रहे इसलिए गाड़ियों कोअंदर ले जाने पर प्रतिबंध है|लाल मुरम से बनी सड़कों पर घोड़ा, हाथ रिक्षा या पैदल ही भ्रमण किया जाता है| केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने माथेरान को इको सेंसेटिव इलाका घोषित किया है|

हेमंत(पुत्र) जब पहली बार माथेरान गया था तो उसका एक जूता पानी में बह गया था| उसने दूसरा जूता भी यह कहकर पानी में बहा दिया था कि जिसे पहला मिले उसे दूसरा भी तो मिले ताकि उसके पहनने के काम आए| मेरी कलम अब भीगने लगी है, हेमंतजब दूसरी बार माथेरान फ्रेंडशिप डे मनाने अपने मित्रों के साथ गया था तो जुम्मापट्टी की वैली में गिरकर उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी और मित्रों सहित वह घर लौटकर फिर कभी नहीं आया|

प्रवासी पक्षियों की सैरगाह हैं अरब सागर की खाड़ियाँ…..

जनवरी लगते ही मुम्बई का आकाश और खाड़ियों के किनारे खूबसूरत गुलाबीपंखों वाले समुद्री पक्षी फ्लेमिंगो से भर जाता है| मुम्बई में खारे समुद्री पानी की कई खाड़ियाँ हैं|पश्चिम में माहिम की खाड़ी, बाँद्रा की खाड़ी, मालाड की खाड़ी है| पूर्व में भी कई खाड़ियाँ हैं| मुम्बई से जुड़े उपनगरों और गाँवों उरण, करनाला, पनवेल, शिवड़ी में खाड़ियाँ मेंग्रोव्ज़ से घिरी हैं| मइन्हींमेंग्रोव्ज़ की सघनता में बर्फीले देशों जैसे साइबेरिया आदि से आये ये प्रवासी पक्षी प्रजनन करते हैं| इनके अंडों के लिए मेंग्रोव्ज़ की घनी चादर मानो सुरक्षा कवच है| ट्रांस हार्बर लिंक यानी शिवड़ी, न्हावा, शेवा का समुद्री मार्ग फ्लेमिंगो की पसंदीदा जगह है| शिवड़ी की खाड़ी में १००० से अधिक फ्लेमिंगो आते हैं| बॉम्बे, नैचरल हिस्ट्री सोसाइटी प्रकृति और प्रकृति चरों से प्रेम का संदेश देती है और इन पक्षियों  की देखभाल करती है| खाड़ी के किनारे मेंग्रोव्ज़ मुम्बई को प्रदूषण 

मुक्त करते हैं…..हवा, पानी, तूफान, बाढ़ तथा अन्य कारणों से होने वाले ज़मीन के कटाव को रोकने का काम करते हैं साथ ही सैंकड़ों किस्म की समुद्री मछलियों, कोरल रीफ,समुद्री घास के उत्पादन में मदद कर मछलियों, शंखों और अन्य जीव जंतुओं और हज़ारों लाखों किस्म की माइक्रो लाइफ के जीवों का संरक्षण भी करते हैं| मुम्बई का समुद्री तट वन्य जीव अभ्यारण्य ही नहीं बल्कि दुर्लभ माइग्रेटरी बर्ड्स और फ्लेमिंगो का ठिकाना भी है|महाराष्ट्र सरकार ने मुम्बई, ठाणे और नवी मुम्बई में ऐसे ६१३५ हेक्टेयर इलाके को रिज़र्व फॉरेस्ट घोषित कर दिया है|

मुम्बई में बारिश के पानी और प्राकृतिक स्त्रोत से लबालब पवई, तुलसी, विहार तमसा और वैतरणा झीलें पूरे साल शहर की जलपूर्ति का माध्यम हैं| ठाणे में असंख्य छोटे तालाब और झीलें हैं|मुम्बई का मशहूर भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान पवई झील के किनारे है|

ओशिवाड़ा और दहीसार नदी नेशनल पार्क से शुरू होकर अरब सागर में मिल जाती है| मीठी नदी पवई झील से निकली है| वसई और ठाणे की खाड़ियाँ उल्हास नदी के मुहाने हैं|

मुम्बई एक ऐसा महानगर है जहाँ कायनात ने अपनी सारी खूबसूरती और विविधताएँ खुले हाथों लुटाई हैं| मुम्बई को तीन ओर से घेरे ठाठें मारता अरब सागर है इसलिए यहाँ अन्य महानगरों जैसा प्रदूषण नहीं है क्योंकि समुद्री हवाएँ सारा प्रदूषण बहाले जाती हैं|  इसे पूर्णरूप से  प्रदूषण  मुक्त करने  के  लिए जानी-मानी  प्रदूण आंदोलनकारी सुमैरा अब्दुलाली कमर कसे हैं| मुम्बई कर भी जागृत हुए हैं| ध्वनिप्रदूषण को नियंत्रित करने के  लिए आगे आ रहे हैं| बढ़ी जागरूकता  के कारण त्योहारों के दौरान ‘पीकनॉइसलेवल’ दिन-ब-दिन घट रहा है| सरकार भी‘नॉइसमैपिंग’ योजनाओं को लागू करने के लिए ‘नॉइसबैरियर्स’ लगा रहे हैं|अब नवरात्रि में गरबा भी१२ बजे रात के बाद नहीं खेलाजाता, दीपावली में बिना पटाख़ों के खुशियाँ मनाने का चलन जारी है| सुमैरा अब्दुलाली  का कहना है कि“कुछ दशक पहले लंदन में  प्रदूषण  की वजह से रहना दुश्वार था| टेम्सनदी का पानी  बेहद गंदा हो  चुका था| आज वही  लंदन प्रदूषण मुक्त शहरों के लिए मिसाल  माना जाता है| टेम्स का पानी भी  स्वच्छ हो चुका है|और इसकी वजह सरकार के साथ साथ जनता की जागरूकता भी है|

मुम्बई में जहाँ सह्याद्री पर्वत श्रृंखला है तो तीन नदियाँ भी बहती हैं| इतने सालों से मुम्बई में रहते हुए कभी जाना ही नहीं इन नदियों के बारे में| वो तो २००५ में २६ जुलाई की बाढ़ के बाद मीठी नदी महत्त्वपूर्ण हो उठी है|

मुम्बई में कई राष्ट्रीय पक्षी विहार हैं| नेरल, करनाला तो विदेशी ओरियोल पक्षियों की आश्रम स्थली है| करनाला कर्जत से पहले आता है| राष्ट्रीय पक्षी उद्यान ४४६ स्क्वेयर किलोमीटर में फैला है| उद्यान पर्यटकों के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है| पर्यटकों के लिए बर्डव्यूटॉवर भी है जहाँ से इन रंगबिरंगे पक्षियों को हरेभरे दरख़्तों पर कलरव करते देखा जा सकता है| कुछ तो बेहद दुर्लभ पक्षी भी हैं यहाँ| जाड़े के मौसम में विदेशी पक्षी भी यहाँ आते हैं| उस समय पर्यटकों की संख्या भी बढ़ जाती है|यहाँ पर्यटकों के ठहरने के लिए होटल, गेस्टहाउ सभी हैं| महाराष्ट्र स्टेट फॉरेस्ट डिपार्टमेंट उद्यान का संरक्षक है| यहीं पर करनाला किला है जो ४४५मीटर ऊँचा है| इसका निर्माण १२वीं सदी में किया गया था| करनाला पक्षी उद्यान में प्रवेश करते ही झरने, घने दरख़्त, मकड़ियों के बड़े बड़े जाले, कीड़े, मकोड़े से मुलाकात करते हुए जब रंग बिरंगे पक्षी दिख जाते हैं तो लगता है एक अलग ही दुनिया में आ गये हैं| इस मोहक जंगल से गुज़रना मानो किसी तिलिस्म से गुज़रने जैसा है|

बोरीवली में संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान सह्याद्री की घाटी में बसा ऐसा वन्य प्रदेश है जहाँ सभी प्रकार के जंगली जानवर जाली की ऊँची-ऊँची बाड़ लगाकर खुले में रखे गये हैं|लायन सफ़ारी में किसी भी वक़्त शेरों के झुंड देखे जा सकते हैं| उद्यान के बीचों बीच शीशे सी चमकती झील पर पक्षियों के झुंड मँडराते हैं|टॉयट्रेन जंगल की सैर कराती है जो बड़ा ही रोमाँचक है| ट्रेनसेजंगल में प्रवेश करते ही पूरी वाइल्ड लाइफ़ नज़रों के सामने से गुज़रती है| कहीं सफेद शेर तो कहीं घने अयाल वाला बाघ तो कहीं चितकबरा तेंदुआ, रंग बिरंगे पक्षी पेड़ों पर चहचहाकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते नज़र आते हैं| पेड़ों पर मचान भी बने हैं जिनसे जंगल का खूबसूरत नज़ारा देखा जा सकता है| एक सौ चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान नेशनल पार्क के नाम से भी जाना जाता है| गेट के उद्यान में प्रवेश करते ही हरी घास की ढलान पर संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान लिखा हुआ दिख जाता है|जंगल के अंदर ही कान्हेरी की गुफ़ाएँ हैं जो पश्चिमी भारत में बौद्ध गुफ़ाओं का सबसे बड़ा समूह है|कान्हेरी शब्द संस्कृत के कृष्णागिरी का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है काले रंग का पर्वत| काली बेसाल्टिक चट्टानों से बनी ये गुफ़ाएँ पहली शताब्दी से नौवीं शताब्दी तक के बौद्ध धर्म के उत्थान पतनको दर्शाती हैं| यह जगह मौर्य और कुशाण वंश के काल में बड़ा शिक्षा का केन्द्र थी|ये गुफ़ाएँ ऐसी टाइम मशीन हैं जिसमें पहुँचकर शताब्दियों पूर्व भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनते देर नहीं लगती| ८६ फुट लम्बी, ४० फुट चौड़ी, ५० फुट ऊँची इन गुफ़ाओं में ३४ स्तंभ है| इसकी गणना पश्चिमी भारत के प्रधान बौद्ध दरी मंदिरों में की जाती है|

मुम्बई के अँधेरी पश्चिम में महाकाली की गुफ़ाएँ बौद्ध मठ के पास स्थित हैं| इन गुफ़ाओं के कारण इस पूरे क्षेत्र का नाम महाकाली पड़ गया है| एक ही पर्वत के अंदर १९ चट्टानों में १९ गुफ़ाएँ बनी हैं जिनका निर्माण पहली से छठी शताब्दी के मध्य आँका गया है| बीच में ८ फुट ऊँचा शिवमंदिर है| मंदिर के परिसर की दीवार पर कुछ देवी देवताओं के चित्र बने हैं|नौवीं गुफ़ा सबसे बड़ी है| जिसमें बुद्ध की पौराणिक कथा और उनके सात भित्तिचित्र हैं|१९८८ में सरकार ने इसे संरक्षक स्मारक और राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया|

भायखला में वीरमाता जीजाबाई भोंसले उद्यान है| पहले यह विक्टोरिया गार्डन के नाम से जाना जाता था| यह उद्यान चिड़ियाघर, संग्रहालय और वनस्पति और प्राणी विज्ञान से सम्बन्धित है| इस उद्यान में दुर्लभ और रोचक वनस्पतियों का संग्रह है| हरे भरे खुले परिसर में कई किस्म के जानवर हैं|प्रवेश द्वार मानो किसी ऐतिहासिक किले का गेट लगता है जहाँ बहुत अधिक संख्या में पत्थर से बने बेहद खूबसूरत हाथी हैं| उद्यान में जीजामाता की वात्सल्य पूर्ण मूर्ति से लगे खड़े हैं बालक शिवाजी| सफेद मोर इस उद्यान की शान हैं जो पर्यटकों को देखते ही पंख पसारकर नाचने लगते हैं|

बोरीवली पश्चिम में गोराई खाड़ी स्थित ग्लोबल विपश्यना पगोडा विशाल क्षेत्र को घेरे एक अद्भुत शांति खूबसूरतीऔर पवित्रता का एहसास कराता है| गोराई जेट्टी फिश मार्केट से फेरी की ओर जाते हुए भयानक बदबू पर्यटकों के क़दम आगे बढ़ने से रोकती है पर जाने कैसा सम्मोहन है कि पंद्रह मिनट की फेरी द्वारा समुद्री यात्रा चित्त शांत कर देती है और हवा पावन हो उठती है| गोराई जेट्टी पर ही फेरी का रिटर्न टिकट मिलता है| खाड़ी का पानी तीन ओर सघन मेंग्रोव्ज़ से घिरा है| फेरी से उतरते ही कड़ी धूप के बावजूद ठंडी हवा ने मुझे छू लिया| करीब दस मिनट के चढ़ाई वाले रास्ते को पार कर हम पगोडा पहुँच गये| रास्ता सुंदर उद्यानों से घिरा है| बिल्कुल बाँध जैसा दिखता विशाल जल जमाव स्थल है जो पॉलीथीन की बड़ी बड़ी शीट से मढ़ा है| गहराई दस मीटर है| कुछ काली सफेद बत्तख़ें वहाँ झुंड बनाये बैठी थीं|

पूरे पगोडा को पत्थरों की बाड़ से घेरा है जिस पर स्टील की जाली बँधी है| पगोडा का प्रवेश द्वार विशाल द्वारपालों की पहरेदारी में मानो सुनहले जगमगाते भव्य पगोडा को सुरक्षा प्रदान करता है| इसे बनाने में हज़ारों ट्रक पत्थर हज़ारों मील दूर की खदानों से लाये गये और सैंकड़ो मज़दूरों ने दिन रात श्रम करके और कुशल कारीगरों के साथ मिलकर इसे स्थापत्य में ढाला| यह स्थापत्य बर्मी स्थापत्य कहलाता है| सफेद और सुनहले (कहीं कहीं लाल और लौकी का रंग भी) रंगों से सजे इस पगोडा का गुंबद ९७ मीटर ऊँचा है और बिना किसी स्तंभ के सहारे के यह सालों से इसी तरह खड़ा है| पगोडा के विशाल केंद्रीय गुंबद 5के शिखर पर भगवान बुद्ध के शरीर धातु अवशेष प्रतिष्ठापित हैं जो सुनहले गोलाकार चक्र में अलग ही दिखलाई पड़ते हैं| नीचे विशाल हॉल है जिसमें आठ हज़ार साधक एक साथ ध्यान कर सकते हैं| पर्यटकों के लिए अलग काँच से मढ़ी गैलरी है जिसमें से वे हॉल और साधकों को देख सकते हैं|

पूरे आठ वर्ष में बनकर तैयार हुए इस खूबसूरत भव्य, आलीशान पगोडा का उद्घाटन ८ फरवरी २००९ में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल ने किया था और तभी से पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ| यह पगोडा अपने बेहतरीन बेजोड़ शिल्प और पावन ध्यान केन्द्र की वजह से मानो भव्य भूतकाल के लिए स्मरणांजलि है| पगोडा के आठ गेट हैं प्रत्येक गेट में तीन दरवाज़े हैं….. हर एक दरवाज़े पे सुरक्षा हेतु कर्मचारी मौजूद रहते हैं| गौतम बुद्ध की इस धरोहर के प्रतिनिधि सयाजी ऊबा खिन हैं|

गुंबदीय गोल हॉल में साया जी गोयनका ने २००९ (फरवरी) में पहला धम्म प्रवचन दिया तब से लाखों बौद्ध धर्मावलम्बी प्रतिवर्ष विपश्यना करते हैं| हॉल के सामने ध्यान कक्ष है| यहध्यान कक्ष उनके लिए है जिन्होंने दीक्षा नहीं ली है| मैंने भी वहाँ नीले रंग के चौकोर आसन पर बैठकर दस मिनट ध्यान किया| माइक पर गुरु की आवाज़ में ध्यान करने का तरीका बताया जाता रहा|

बुद्धकी इस चैत्य भूमि में पुस्तकालय है| एक चलचित्र गृह भी है जहाँ नींव खुदने से लेकर अब तक की कहानी की फिल्म दिखाई जाती है| चित्र प्रदर्शनी भी है जहाँ १८ गैलरियों में आमने सामने गौतम बुद्ध के जीवन की कथा बड़े बड़े चित्रों में प्रदर्शित की गई है| चित्रकार ने कुल १२२ चित्रों में गज़ब के चित्र उकेरे हैं| रंगों और भावों का ऐसा कमाल कि चित्र बोलते प्रतीत होते हैं|

यह पगोडा पूर्णतया स्वैच्छिक दान से चलता है और यहाँ कोई प्रवेश शुल्क नहीं देना पड़ता| रिफ्रेशमेंट के लिए एक कैंटीन है और फूड प्लाज़ा है| जगह जगह फिल्टर्ड पानी के कूलर लगे हैं| स्वच्छता, शांति और सौन्दर्य के एक साथ दर्शन कराता है यह पगोडा|दूर फेरी से ही मेंग्रोव्ज़ की सघन हरियाली में सुनहले रंग वाला पगोडा किसी इन्द्रपुरी से कम नहीं लगता|

लोकल से चर्चगेट से विरार तक का रोमाँचकारी सफ़र…..

चर्चगेट से विरार तक जाने वाली लोकल ट्रेन मुम्बई की सबसे रोमाँचक यात्रा कराती है| इस पर पीक आवर्स में चढ़ना तो दूर दरवाज़े पर लटकने भी मिल जाए तो अहो भाग्य| मुम्बई की ज़िन्दग़ी केअसल रंग दिखाती है यह लोकल| भीड़ भड़क्के का पर्याय व मानक, खट्टी मीठी यादों से जुड़ा और लगभग मिथक|विरार पश्चिम रेल का अंतिम स्टेशन है| यहाँ से पालघर, दहाणू, सूरत, भरूच, वलसाड़ के लिए शटल भी जाती है|

सालों किराए के मकान में रहने के बाद मैंने विरार में स्टेशन से पाँच मिनट की दूरी पर टू बेड रूम हॉल किचन का फ्लैट ख़रीदा था| सोचती हूँ वो मेरा दुस्साहस था| ग्रांट रोड स्थित अपने स्कूल में अध्यापिका की नौकरी के लिए सुबह छै: बजे से घर से निकलने को मजबूर मैं आठ बजे रात को जब लौटती थी तो लगता था जैसे शहर में काम निपटा रात को अपने गाँव लौटी हूँ| लेकिन विरार तब भी आकर्षण से भरा था| खूबसूरत पहाड़ की चोटी पर स्थित जीवदानी देवी का सफेद झक्क मंदिर यहाँ आने वाले हर मुसाफिर को लुभाता है| लगभग बारह सौ सीढ़ियाँ चढ़ कर जब मैंने जीवदानी देवी के दर्शन किये तो लगा इससे खूबसूरत मूर्ति मैंने कहीं नहीं देखी| नमक के खेतोंऔर घनी वन संपदा से भरा पूरा है विरार| पहले यहाँ कोली और वार्ली आदिवासी रहते थे जो गन्ना उगाते थे| यहाँ उन्नीसवीं सदी का पारसनाथ मंदिर और भीमाशंकर मंदिर भक्तों की भीड़ से भरा रहता है|सागर का अरनाला तट दूर-दूर तक कैसुआरिना के ऊँचे-ऊँचे सतर दरख़्तों से घिरा है|सफेद रेत के किनारों से समँदर की गरजती बिछलती लहरें जब टकराती हैं तो अपने पीछेछोड़ जाती हैं शैवाल, सीप और घोंघे| यहाँ किला और जैनियों का प्रसिद्ध अयाशा तीर्थ भी है| अरिहंत वॉटर पार्क रिसॉर्ट में पर्यटकों का जमावड़ा रहता है|फिल्म अभिनेता गोविंदा यहीं छोटे से घर में रहता था| लेकिन वो उसका आरंभिक दौर था जिससे हर कलाकार गुज़रता है|

विरार से चर्चगेट के लिए रवाना होने पर पहला स्टेशन नालासोपारा आता है| भारत में रेलवे की शुरुआत के दिनों में दहिसर बसीन और विरार के साथ जिस नीला नाम का ज़िक्र मिलता है वह दरअसल नालासोपारा ही है| ईसा पूर्व १५वीं सदी से १३०० ईस्वी तक नालासोपारा उत्तरी कोंकण की राजधानी था| कहते हैं गोकर्ण तीर्थ से प्रभास तीर्थ जाते समय पांडवों ने यहाँ विश्राम किया था| यह भगवान परशुराम, तीर्थंकर ऋषभ देव जी और बुद्ध के एक अवतार की धरती है| जैनों के एक संप्रदाय का नाम यहाँ के नाम पर है और यह जैनों के ८४ तीर्थस्थानों में भी शुमार है| नालासोपारा सम्राट अशोक के पश्चिमी प्रांत का मुख्यालय और बौद्ध ज्ञान विज्ञान का केन्द्र भी रहा है| अशोक की लाट, स्तूपों पर इसका अस्तित्व मिलता है| पुरातत्वविदों को सोपारा नामक टीले पर पाँच पात्रों के साथ सिक्के, उच्च कलात्मक चीज़ें और अन्य चिह्न मिलेहैं जो एशियाटिक सोसाइटी में रखे हैं| नीला से नालासोपारा तक का सफ़र धीमी रफ़्तार से चला| दूध, सब्ज़ी और मछलियों की बहुतायत की वजह से यहाँ से ये सारी चीज़ें शहर भेजी जाने लगीं| नालासोपारा हर वर्ग और समुदाय की कॉस्मोपोलिटन बस्ती है|सेंट फ्रांसिस और सेंट एलोशियस इंग्लिश स्कूल की गणना क्षेत्र की अच्छी शैक्षिक संस्थाओं में होती है|कलंब और माजोडी नाम के समुद्र तट पर्यटकों को लुभाते हैं|इसके नज़दीक है मुम्बई की जलपूर्ति करने वाली वैतरणा, तुलसी और निर्मला झीलें|आगाशी नामक खूबसूरत गाँव है| सिद्धेश्वरी देवी का मंदिर, शंकराचार्य का मंदिर,निर्मल गाँव जहाँ से कार्तिक मास में छह दिनों की यात्रा शुरू होती है, के कारण यह स्टेशन मुम्बई के पर्यटन में स्थान पा चुका है|

नालासोपारा के बाद वसई जिसे बसाई और बासीन भी कहा जाता था| मुम्बई से ५० कि.मी. दूरअरब महासागर के तट पर वसई एक खूबसूरत गाँव है जो उल्लास नदी के तट पर बसा है| वसईअब धीरे-धीरे मुम्बई की संस्कृति अपनाकर और आधुनिक बदलाव सहित मुम्बई का ही हो गया है| वसई का किला बहुत प्रसिद्ध है जो १६वीं सदी में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के अधीन था और जिसे पुर्तगालियों ने २३ दिसंबर १५३४ में हुई संधि के द्वारा अपने अधीन कर लिया था| इस किले का पुनरुद्धार कर पुर्तगालियों ने इसे नया रूप दिया| विशाल परकोटे, किले के चारों ओर सुरक्षा के लिए बनाए गये ११ बुर्ज और भव्य भवनों के निर्माण के कारण यह खूबसूरत आकार में ढल गया| इसमें कई कलात्मक चर्च भी बने| वसई भारतीय उपमहाद्वीप में पुर्तगालियों की व्यापारिक गतिविधियों का मुख्यालय बन गया|

किले के आसपास नारियल और खजूर के पेड़ों की हरियाली मन मोह लेती है| लेकिन इतने वर्षों में सत्ता के हस्तांतरण, लूट पाट की वजह से किला अब खंडहर हो गया है और किले की चार कि.मी. तक फैली दीवारों और सीढ़ियों पर झाड़ियाँ उग आई हैं| वहाँ एक छोटा दुर्ग भी है जो पानी के टैंकों और शस्त्रागार आदि से सुसज्जित है| किसी समय यहाँ फसलों और साग सब्ज़ियाँ उगाई जाती थीं| अब वहाँ सन्नाटा रहता है| कभी-कभी पर्यटक आ जाते हैं या फिर दीपावली के दौरान रौनक रहती है|

वसई में तुंगेश्वर मंदिर, चिंचोटी जलप्रपात, रनगाँव समुद्र तट, चंडिका देवी का मंदिर आदि वसई के लोकप्रिय दर्शनीय स्थल हैं|वसई गाँव अब अपने जंगल खो चुका है और बिल्डरों ने उन जगहों पर गगनचुम्बी इमारतें, बंगले, डुप्लेक्स खड़े कर दिये हैं जिसकी वजह से वसई समृद्ध होता जा रहा है| बॉलीवुडकी नज़र भी वसई को अपनी गिरफ़्त में ले चुकी है| लेखक, कलाकारों का बसावड़ा और लोकल ट्रेन की सुविधाओं ने वसई को मानो कलानगरी का रूप दे दिया है|

वसई के आगे नायगाँव, भयंदर और मीरारोड भी कला नगरी बनते जा रहे हैं| मुझे याद है जब मुम्बई से फिल्मफेयर पत्रिका निकलती थी तो उसके पत्रकार किरन पांडे ने मीरा रोड में बहुत सस्ते दामों में प्लॉट ख़रीदा था….. लेकिन तब यहाँ घना जंगल था, डाकू, हत्यारों, नशेड़ियों का अड्डा था यहाँ| खून करके लाश को जंगल में फेंक देना मामूली बात थी| घबराकर किरन ने प्लॉटबेच दिया लेकिन उसके बाद ही मीरा रोड की काया पलट हो गई| सेलसेटद्वीप पर बसा मीरा रोड कोंकण रेंजका ही एक हिस्सा है| धीरे धीरे यहाँ लेखक और बॉलीवुड कलाकार बसते गये| बॉलीवुड एक्टर कुणाल खेमू और बजरंगी भाईजान की मुन्नी हर्षाली मल्होत्रा यहीं रहती है| यहीं सुप्रसिद्ध लेखक धीरेन्द्र अस्थाना और मैंने फ्लैट ख़रीदे| निर्मल प्रति सप्ताह निकलने वाली सबरंग नगर पत्रिका के संपादक| सबरंग बेहद लोकप्रिय हुई| मुम्बई का हर लेखक उसमें छपना अपनी शान समझता| टॉवर के सातवें फ्लोर पर मेरा  संगमरमर का बेहद खूबसूरत फ्लैट था| महीने में एक बार मेरे घर लेखकों का जमावड़ा होता| कविता पाठ, कहानी पाठ की मुखरता में शामें बीततीं| कभी कभी धीरेन्द्र अस्थाना जी अपने हाथों से नॉनवेज बनाकर खिलाते| तब वे जनसत्ता में सहयोगी संपादक थे और प्रतिसप्ताह निकलने वाली सबरंग नगर पत्रिका के संपादक |सबरंग बेहद लोकप्रिय हुई| मुम्बई का हर लेखक उसमें छपना अपनी शान समझता|

मुम्बई की बारिश के क्या कहने | पूरी बरसात छतरी, रेनकोट और टोपियों का बोलबाला रहता है| उस शाम भी घनघोर बारिश हुई और उसी शाम धीरेन्द्र अस्थाना का कहानी पाठऔर जम्मू से आए कवियों को मेरे घर आकर सभी को सुनना था| लग रहा था कोई नहीं आयेगा |लेकिन धुआँधार बारिश में घुटने तक पैंट चढ़ाए पहले धीरेन्द्र जी और फिर लगभग सभी आ गये| मीरा रोड की वह शाम कभी नहीं भूलती जब छमाछम बारिश में साहित्य रस घुल रहा था और रसोई में सिंकते भजियों की खुशबू माहौल को रोमेंटिक बना रही थी|
मीरा रोड से ठसाठस भरी लोकल पकड़ मुझे सुबह छै: बजे ग्रांट रोड आना पड़ता था| तब मैं वालकेश्वर स्थित गोपी बिरला मेमोरियल स्कूल में पढ़ाती थी| लोकल के दरवाज़े पर खड़े होने की जगह मिलती| भीड़ धीरे धीरे अंदर ठेलती जाती| पता ही नहीं चलता कब अंदर पहुँच गई| कभी कभी ट्रेन की पटरियों के किनारे लगे पालक के खेत दिखाई दे जाते| वहीं झोपड़पट्टी में तवे पर सिंकती मछली और पास ही के गटर की गंध एक साथ नथुनों में समाती|
मीरारोड के पश्चिम में बल्कि विरार तक नमक के खेत हैं| बड़े बड़े खेतों में समुद्री पानी सूरज देवता की मेहरबानी से नमक में परिवर्तित होता जाता है|इस नमक को इकट्ठा करने, बोरियों में भरकर ट्रकों में लादने का काम जो मज़दूर करते हैं उनके पाँवों में प्लास्टिक बँधा होता है वरना नमक से पाँव गल जाने का ख़तरा रहता है| धूप में चमकते नमक के ये ढेर बर्फीले इलाके का आभास कराते हैं|
मीरारोड सलीके से बसा और तमाम सुविधाओं से युक्त उपनगर हो गया है जबकि दहिसर से आगे सारे उपनगर ठाणे जिले में आते हैं|
दहिसर में चैक नाका है जो ठाणे और मुम्बई को अलग अलग दिशाओं  में मोड़ देता है| दहिसर भी मुम्बई के उपनगर के तौर पर पूरी तरह गाँव से आधुनिक मुम्बई में तब्दील होता जा रहा है| यहाँ भी बिल्डरों ने जंगलों को ऊँची ऊँची इमारतों में तब्दील कर दिया है| मुझे तो मीरा रोड के टॉवर फ्लैट की सातवीं मंज़िल में रहते हुए डर लगता था….. मेरा मानना है कि हमें इतने ऊँचे नहीं जाना चाहिए कि ज़मीन से रिश्ता टूटने लगे| क्योंकि भले ही इतनी ऊँचाई से आसपास का नज़ारा दिलफ़रेब हो पर सड़क चलता आदमी कितना छोटा दिखाई देता है| न उसके माथे का पसीना दिखाई देता, न आँख के आँसू, न क़दमों की चाप| एक और बात है कि ज़मीन के बजाए सीधे सामने तेज़ी से उगती लगभग होड़ सी लेती नई इमारत पर ही नज़रें टिकी रहती हैं|
दहिसर में भूटाला देवी मंदिर, विट्ठल मंदिर, श्री सिद्धिविनायक मंदिर, शिवमंदिर, गोवर्धन नेताजी की हवेली, श्री विट्ठल रखुमाई मंदिर, श्री भाव देवी मंदिर हैं|कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ बहने वाली दहिसर नदी के किनारेऔर ओल्ड ब्रिज पर हुई है| यहाँ एक बंगला भूत बंगला नाम से सालों ख़ाली पड़ा रहा अब वहाँ फिल्म स्टूडियो है| दहिसर में कई शिक्षा के केन्द्र और विद्यालय हैं|रिसर्च इन्स्टिट्यूट और रुस्तमजी कैम्ब्रिज इन्टरनेशनल स्कूलहै|
दहिसर और मीरा रोड के बीच काशीमीरा एक खूबसूरत गंतव्य है| काशीमीरा वेस्टर्न हाइवे पे फाउंटेन होटल में उस रात मैंने अपनी सखियों के संग डिनर लिया था|बाहर घनघोर बारिश हो रही थी| यह होटल इतना लोकप्रिय है कि चाहे अमीर हों या ग़रीब हर बजट के लोग यहाँ भोजन करते हैं| अमीरों की गाड़ियाँ लाइन से खड़ी रहती हैं| इस के पीछे चायना क्रीक गाँव है जो गझिन हरियाली से ढँका है| बेहद विशाल अमराई….. आम के ढेरों पेड़ जिनके नीचे से गुज़रते हुए लगता है जैसे हम मलीहाबाद आ गये हों|गाँव के बीचोंबीच नदी बहती है….. जंगल से भरा गाँव पहाड़ियों से घिरा है जिनसे छोटे-छोटे झरने ख़ास बारिश के दिनों में प्रगट हो जाते हैं| दुनिया बदल गई,मुम्बई कहाँ से कहाँ पहुँच गई पर दहिसर चैक नाका से मात्र ६ किलोमीटर स्थित चायना क्रीक में मानो सदियों पुरानी तहज़ीब ठहर कर रह गई है|ग्रामवासी नहीं जानते चर्चगेट या मरीन ड्राइव कहाँ है| हाँ, खुश होकर यह ज़रूर बताते हैं कि….. “साहब, लगा के मदर इंडिया से आज तक की फ़िल्में यहाँ शूट हुई हैं, मुग़लेआज़म के कुछ सीन शूट हुए हैं….. यहाँ शूट हुई फिल्में ऑस्कर तक गई हैं|” तब यकीन नहीं होता कि जन ग्रामवासियों ने फिल्मी कैमरे, हीरो हीरोइन, वेनिटीकार और शूटिंग का साज़ो सामान देखा है उनके रहन सहन में ज़रा भी बदलाव नहीं| पैबन्द लगे कपड़े, नंगे पाँव और घरों के छप्पर टूटे फूटे….. उन छप्परों पर लौकी, तुरई की बेलें ज़रूर छाई हैं|
उल्हास नदी के कच्चे किनारों से कुछ पथरीली सीढ़ियाँ नदी की ओर उतरती हैं| एक भुतहा टूटा फूटा बंगला भी दिखा जिसका लोहे का विशाल गेट था| थोड़ीदूरी पर घुड़साल जिसमें घोड़े एक भी न थे| फिल्मी डकैतों के घोड़े वहीं बँधते होंगे| टूटा फूटा बैरक नुमा लाइन से आठ दस कमरों का घर जिस पर टीन की छत और छत पर हरियाली का सघन विस्तार….. दूर दूर तक जंगल, खेत, दरिया और पंछियों की चहचहाहट| भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की स्थापना के साथ ही चायना क्रीक बॉलीवुड की निग़ाह में आ गया| यहाँ शुरुआत की फिल्म आलमआरा की शूटिंग भी हुई थी| चायना क्रीक से चलते चलते लगा जैसे जंगल और सारे दृश्य जाने पहचाने हैं शायद इसलिए कि कई फिल्मों में इन्हें देख चुकी हूँ|

अनजान थी मैं इन नदियों से…..

एक ज़माने में मुम्बई में पारदर्शी मीठे पानी की पाँच प्रमुख नदियाँ बहती थीं| उल्हास नदी जहाँ चायना क्रीक में फिल्म वालों के आकर्षण का केन्द्र रही वहीं मीठे स्वच्छ जल से लबालब ये नदियाँ मुम्बई के पर्यावरण की खूबसूरती में चार चाँद लगाती थीं| नौका विहार, तैराकी, बंशी डालकर मछलियों को पकड़ना और आए दिन किसी न किसी फिल्म की शूटिंग का ये केन्द्र थीं| पिकनिक स्पॉट ही नहीं ये नदियाँ सैकड़ों मछुआरों की रोज़ी रोटी जुटाने का साधन भी थीं| मुम्बई में तीन दशक गुज़ार चुकने के बाद मुझे इन नदियोंके अस्तित्व की जानकारी २००५ की उस भयंकर बाढ़ से पता चला जब पूरा मुम्बई जलमग्न हो त्राहि-त्राहि कर उठा था|
दहिसर नदी बारह किलोमीटर लम्बी है जो नेशनल पार्क में कन्हेरी की गुफ़ाओं के पास तुलसी झील से दहिसर पुल, दौलत नगर, बोरीवली और दहिसर के कुछ हिस्सों को छूते हुए गोराई खाड़ी में विसर्जित होती है| यह नदी ‘नया दौर’ फिल्म का लोकेशन थी|
मीठी नदी १७.८ किलोमीटर लम्बी है| यह पवई स्थित विहार और पवई झीलों के अतिरिक्त प्रवाह से जन्म लेकर मरोल, साकीनाका, कुर्ला, कालीना,धारावी, माहिम और बाँद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में वकोला नाले से मिलते हुए माहिम खाड़ी होते हुए अरब सागर में समाप्त हो जाती है| एक ज़माने में इसका फ्लो ४०००० से ५०००० क्यूसेक था जो सबसे लंबी नहर कहलाती है|

ओशीवरा नदी १० किलोमीटर लम्बी है| आरे मिल्क कॉलोनी के उद्गम स्थल से लेकर गोरेगाँव हिल्स, इंडस्ट्रियल इस्टेट और झोपड़पट्टियों से होते हुए मालाड खाड़ी और अंततः अरब सागर में जाकर समाप्त होती है|

पोईसर नदी सात किलोमीटर लम्बी है| जो नेशनल पार्क के उद्गम स्थल से लेकर गोराई खाड़ी होते हुए अरब सागर में समाप्त होती है| यह तैराकों की ख़ास पसंदीदा नदी थी|और मुम्बईकर इसमें नहाते भी थे|

उपेक्षा, अनाचार और प्रदूषण की चौतरफ़ा चोट ने इन नदियों को अब गंदे, काले पानी का नाला बना दिया है| अब ये सीवरके हश्र में परिवर्तित हो गई है और आज की युवा पीढ़ी नहीं जानती कि उनकी मुम्बई चार-चार नदियों की खूबसूरत नगरी थी जहाँ इसके बहते जल की कलकल कभी गुँजायमान थी|

मुम्बई की नाइट लाइफ़…..

मुम्बई कभी सोती नहीं| उसकी नाइटलाइफ़ के बारे में यही कहा जाता है| मुझे याद आ रहाहै

‘मुम्बई रात की बाहों में’| एथेना, लश, पॉइजन, वेलोसिटी, अजियानो, व्हाइट,इन्सोम्निया और इनिग्मा के डांस फ्लोर्स, कॉफ़ी शॉप्स और बार्स रात भर गुलज़ार रहते थे| इन्हीं में से तय किया जाता था पार्टी का कांसेप्ट, थीम्स| लेकिन आतंकी घटनाओं के कारण शहर जल्दी सोने लगा है| पार्टी का कांसेप्ट भी बदल गया है| उनकी जगह अब पब और रेव पार्टी ने ले ली है| शहर के परिदृश्य पर परेल जैसे नए हॉटस्पॉट्स उग आए| लोग अब पार्टी में केवल शराबखोरी और कैबरे के लिए नहीं, म्यूज़िक और सोशलाइज़िंग  के लिए जाने लगे| उनकी इस ज़रुरत की पूर्ति की माइक नाइट्स और लाइव म्यूज़िक वेन्यूज़ ने| लेकिन पुरानी जगहों पर अब भी फिल्मी पार्टियाँ सुबह ५ बजे तक चलती हैं|

अब मुम्बई के ट्रेवलर्स रात के लिए विशेष पैकेज देते हैं जिसमें साइकल टूर्स बहुत लोकप्रिय है| दिन भर बसों, कारों, ट्रकों, ठेलागाड़ियों, ऑटो औरटैंकर्स, बाइक आदि वाहनों की ठेलमठेल में, आवाजाही में जोमुम्बई ढंग से साँस भी नहीं ले पाती वही रात को निखर उठती है|कोलाबा कॉज़वे से बांद्रा बैंडस्टैंड तक २० किलोमीटर के इस टूर में शामिल युवा वर्ग का कहना है कि समुद्र से उठती हवाके मस्त झोंकों के बीच सुबह की भागमभाग में देखा शहर सुस्त रातों में बिल्कुल अलग ही दिखता है| अरब सागर की सरगोशियाँ ज़्यादा नटखट हो जाती हैं, दूर से आती लाँग ड्राइवके लिए निकली कारें रोशनी का पुंज लगतीहैं|ओह, मुम्बई कितनी जवान, कितनी हसीन नज़र आती है|
नाइट लाइफ़ का एक और रूप है| अक्सर नाइट शिफ़्ट में कार्यालयों में काम होता है| ऐसे में चाय की तलब अगर बेचैन करे तो अँधेरी पश्चिम में स्टेशन के बाहर खूब गाढ़ी, कड़क चाय मिल जायेगी साथ में स्पेशल भुर्जी पाँव भी| घाटकोपर के जे बी सागर का तवा पुलाव, गिरगाँव चौपाटी की भेल, कोलाबाके बड़े मियाँ, मरीन ड्राइव पर भारत डेरी एंड जूस सेंटर,क्राफर्ड मार्केट का जाफ़रान, मोहम्मद अली रोड का कबाब कीमा कई ऐसे ठिकाने हैं जहाँ नाइट शिफ़्ट वाले अपनी भूख शांत करते हैं| घाटकोपर में सँकरी खाऊ गली है जहाँ की फ्रेंकी हाथों हाथ बिक जाती है| बोरीवली की कल्पतरु लेन दाबेली, फनरिपब्लिक, अँधेरी की गली आलू के परांठे और छाछ और बांद्रा की गली सिगड़ी पंजाबी डिशेज़ के लिए मशहूर है| घाटकोपर की सिंधु वाड़ी वेजीटेरियन गुजराती और मारवाड़ियों की पसंद है| मालाड की खाऊ गली यहाँ की बी पी ओ और कॉल सेंटर्स इंडस्ट्री की खुराक है| ये खाऊ गलियाँ अमीर ग़रीब का फ़र्क़ नहींकरतीं,न ही मौसम इनके आड़े आता है| ऑपेराहाउस, जुहू, विले-पार्ले, अँधेरी, चर्चगेट, लोअर परेल हर जगह ऐसी खाऊ गलियाँ हैं| रेलवे स्टेशनों के पास होने से ज़ाहिर है उनके ज़्यादातर ग्राहक लोकल यात्री हैं पर मज़दूर, विद्यार्थी, ऑफ़िस और फैक्टरी एम्पलाईज़, बार गर्ल्स, सेक्स वर्कर्स भी हैं| जहाँ ये गलियाँ नहीं हैं वहाँ ठेलों और साइकल पर अंडा-भुर्जी, वडापाव, सैंडविच, पावभाजी, चायनीज़की चलती फिरती दुकानें हैं| मुम्बई-कर अपने दोस्तों और परिवार के साथ यहाँ आते हैं| वीकेंड्स की रौनक का पूछ नाही क्या? दरअसल खान-पान उद्योग मुम्बई का सबसे बड़ा रोज़गार दाता ही नहीं यहाँ की वास्तविक नाइट लाइफ़ का एक हिस्सा भी है| यहाँ के कुल एक लाख हॉकर्स में ४० प्रतिशत की जीविका यही है| मुम्बई में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो रात का खाना बाहर ही खाते हैं|


फास्टफूड संस्कृति मुम्बई की ही देन है| हर मुम्बई कर को पैसा कमाने का जुनून है इसीलिए अन्य प्रदेशों से भी लोग मुम्बई का ही रुख करते हैं….. दिन रात मेहनत….. काम ही काम….. थकना तो जानते ही नहीं| लंच का समय होते ही ऑफ़िसों से निकलकर पूरी मुम्बई फास्टफूड स्टॉलों को घेर लेती है| चायनीज़ भोजन जहाँ ज़रुरत बनता जा रहा है वहीं मज़दूरों के लिए झुणका भाखर केवल चार रुपए में उपलब्ध कराना मुम्बई की ही औकात है| मुम्बई हर प्रदेश के ज़ायकेदार खाने के लिए प्रसिद्ध है|पारसी धान-शाक, गुजराती थाली, मुस्लिम कबाब, राजस्थानी दालबाटी चूरमा, गोआनी बिंडालू, पंजाबी तंदूरी स्पेशल, मुग़लई स्पेशल, इटालियन, मैक्सिकन, थाईफूड, ओरियंटल फूड, सब कुछ सड़क के किनारे लगे स्टॉल्स से लेकर पंच सितारा होटल तक हर जगह मिलता है| हर बजट के लोगों के ज़ायके दार पसंदीदा व्यंजन खिलाना मुम्बई की ही ज़िद्द है| वैसे मुम्बई के स्ट्रीट फूड में भेलपूरी सबसे अधिक प्रसिद्ध है| कुछ रेस्तरां तो अपनी ख़ास डिशेज़ के लिए ही जाने जाते हैं|दादर का इंडस किचिन गोवानी और तंदूरी भोजन के लिए प्रसिद्ध है तो चर्नी रोड का गोल्डन स्टार गुजराती और राजस्थानी स्पेशल थाली के लिए, अँधेरी लोखंडवाला का ताल ग्रास स्पेशल मुग़लई लंच, डिनर के लिए, नाना चौक का गोल्डन क्राउन सी फूड के लिए,चौपाटी का क्रीम सेंटर छोले भटूरे और हरी मटर की ज़ायकेदार गुझिया के लिए|चर्चगेट का स्टारटर्स एंड मोर बुफ़े लंच के लिए, ताड़देव का स्वाति स्नैक्स दाल ढोकली के लिए, कोलाबा का तेंदुलकर्स बैंगन के भरते के लिए, बाबुलनाथ का सोम पूरनपोली, कढ़ी और गट्टे की सब्ज़ी के लिए, गिरगाँव चौपाटी का क्रिस्टल राजमा, चावल और ख़ीरके लिए और चर्नी रोड का आइस्क्रीम सेंटर हाथ से बनी (हैंड मेड) कुल्फ़ी और अदरक की आइस्क्रीम के लिए लोगों की ज़बान पर चढ़ा है| आइस्क्रीम सेंटर का तो ये हाल है कि आभिजात्य वर्ग की कारें रात के एक बजे तक आइस्क्रीम के लिए लाइन लगाए रहती हैं….. इनमें ज़्यादातर सेठ वर्ग (हीरे, चाँदी, सोने के व्यापारी जो रात १२ बजे घर लौटते हैं) या फिल्मी जगत की हस्तियाँ होती हैं जिनके लिए रात सोने का नाम नहीं बल्कि सड़कों पर मस्ती करने का नाम है| तभी तो कहते हैं मुम्बई कभी सोती नहीं| रात में मुम्बई के नूर के क्या कहने?

लोकल ट्रेन : मुम्बई की जीवन रेखा…..

शायद यही वजह है कि मुम्बई की जीवन रेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेन चौबीसों घंटे में से कभी भी खाली नहीं मिलती| प्रत्येक प्रहर अलग-अलग तरह की भीड़ ट्रेन में सफ़र करती नज़र आती है| सुबह शाम दफ़्तर के कर्मचारियों और विद्यार्थियों की भीड़, दोपहर को शॉपिंग, बिज़नेसवालों को रात को फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने वालों, कॉल सेंटर में काम करने वालों, बार डांसर्स, सैक्स वर्कर्स की और राततीन बजे से सब्ज़ी, भाजी, फूल विक्रेताओं की| रात में बस डेढ़ बजे से तीन बजे तक ही लोकल ट्रेन विश्राम करती है|वरना तो लोकलहर वक्त खचाखचभरी….. लेकिन मुम्बई कर ज़िन्दग़ी की हर आपाधापी को एंज़ॉय करते हैं| दरवाज़ों-खिड़कियों से लटका आदमी, छतों पर बैठा आदमी….. फिर भी बेफ़िक्र….. कभी कोई आतंकित नहीं हुआ| घंटे, डेढ़ घंटे की दूरी तमाखू मलते, ब्रीफकेस आमने-सामने रख ताश के पत्ते फेंटते या मंजीरे बजा-बजाकर भजन गाते तय हो जाती है|इसी भीड़ में किसी अंधे भिखारीके गले में लटके हारमोनियम पर तान सुनाई देती है|हारमोनियम पर रखे कटोरे में सिक्के भी टन-टन आ गिरते हैं| औरतों के डिब्बों में पूरा बाज़ार साथ चलता है| चूड़ी, बिंदी, मैक्सी, चादर, चॉकलेट, फल, नमकीन हर चीज़ बिकती है| खिड़की से चिपकी युवा पीढ़ी पुराने फिल्मीगानों पर अंताक्षरी खेलती है| गृहणियाँ सब्ज़ी तोड़-छीलकर प्लास्टिक में भर लेती हैं ताकि समय की बचत हो| दरवाज़े पर भीड़ का ये आलम कि अगर शरीर में कहीं खुजली हो रही हो तो कर्ण की तरह दम साधकर अपने स्टेशन आने का इंतज़ार करना पड़ता है वरना हमारी चप्पल किसी और की पिंडलीको अपनी समझ खुजा सकती है और लेने के देने पड़ सकते हैं| इसीभीड़ में कई बार औरतों की डिलीवरी तक हो जाती है और पूरा डिब्बा उसकी तीमारदारी में जुट जाता है| वट सावित्री का त्यौहार ट्रेन में बरगद की डाल की पूजा कर मना लिया जाता है, करवा चौथ परकार्यालयों में छुट्टीतो होती नहीं अतः ट्रेन से चाँद दिखते ही बोतल का पानी कलश में डाल औरतें चाँद को अर्ध्य चढ़ाकर व्रत का पारायण कर लेती हैं| महिला दिवस पर विभिन्न संस्थाएँ लेडीज़ स्पेशल ट्रेन में गिफ़्ट बाँटती हैं| स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भी मुफ़्त उपहार बाँटे जाते हैं| जहाँ एक ओर प्लेटफार्म पर तीस सेकेंड के लिए रुकी ट्रेन में चढ़ने-उतरनेवाले न बच्चे देखते,न बुज़ुर्ग ज़ोरदार धक्का देकर चढ़ते उतरते हैं वहीं मुसीबत पड़ने पर सब एक हो जाते हैं|

सब्र और सह अस्तित्व की पाठशाला है लोकल| ७० लाख मुम्बई करों के लिए समय की पाबंदी और सुरक्षा तो मुम्बई लोकल की यात्रा का मर्म है हमारा ट्रेन एबली और ट्रेन फ्रेंडली होना| ट्रेन एबली होना आपके बाहुबल, दौड़ती ट्रेन में चढ़ने, फुटबोर्ड से चिपटे रहने, अपने पैरों पर खड़ा रहने व लांग जंप की आपकी लियाकत और तीन इंच की जगह में काम चला लेने के संतोष पर निर्भर करेगा| ट्रेन फ्रेंडली होना पंगा लेने व उसे शांत करने की सामर्थ्य और लोकल के अघोषित कायदों के पालन की आपकी मजबूरी है| फिर चाहे दुर्घटना हो, दंगा फ़साद हो, आतंकवादी हमला हो, बमविस्फोटहो या फ्रेंडशिप ताज़िंदगी आपके काम आएगी|

याद करती हूँ मुम्बई का वो दिन जब मैं नई-नई आई थी| साँताक्रुज़ में पेइंग गेस्ट थी और चर्चगेट से आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग के बाद सांताक्रुज़ लौट रही थी| मैं तो आराम से अपनी सीट पर बैठी थी कि सांताक्रुज़ आने से पहले उठ जाऊँगी| भीड़ का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था| एक तो पीक ऑवर ऊपर से नौसिखिया मैं, सांताक्रुज़ आते ही भीड़ ने मुझे ऐसा ढकेला कि साड़ी का पिन खुलकर कँधे में धँस गया लेकिन प्लेटफॉर्म पर मुझे उतनी भी ख़ाली जगह नहीं मिली जहाँ खड़े होकर मैं उमड़ आए आँसुओं को पोछ सकूँ| उस दिन मुम्बई ने मुझे वो हौसला दिया कि अब तो काँटों भरी राह पर भी आसानी से चल लेती हूँ|

मुम्बई की अपनी अलग संस्कृति…..

मुम्बई की अपनी अलग संस्कृति है| मुम्बई में हर शख़्स ज़िन्दादिल है| वो ज़िन्दग़ी को हर हाल में हँसते-हँसते जीता है| चाहे भीड़ भरी लोकल हो, अनवरत होती घनघोर बारिश हो….. कभी रूकती नहीं मुम्बई| मानो हर हाल में सब कुछ अपनी पहुँच में हो|दिन भर की कड़ी मेहनत, कार्यालय पहुँचने की आपाधापी के बावजूद मुम्बई कर मौज-मस्ती का कोई मौका नहीं चूकते| वीकेंड में आराम करने के बजाय पिकनिक के लिए निकल पड़ना, समुद्र तट परलहरों से खेलना और चाट पकौड़ी खाना, कोकम के स्वादिष्ट शरबत वाली बर्फ़ कैंडी चूसना जिसे काला-खट्टा कहते हैं….. मुम्बई गुलज़ार है इस जज़्बे से|
मुम्बई की अपनी ख़ास भाषा है जिसे फिल्मों में खूब इस्तेमाल किया जाता है| यह टपोरी बोली मुम्बई की सड़कों और नुक्कड़ नाकों से लोकल ट्रेन और दफ्तरों तक हर कहीं बोली जाती है| इस झकास रसीली भाषा में वाट भी लगती है, लोचा भी होता है, वांदा भी होता है, परवड़ता भी होता है|शानपट्टी दिखाने पर लफ़ड़ा भी हो जाता है| चिल्लमचिल्ली हो तो आदमी पतली गल्ली पकड़ लेता है| यहाँ सूक्तियों की तर्ज़ पर तुक भरे बोलवचन भी होते हैं, मसलन‘हटा सावन की घटा’ देश भर से मुम्बई आए लोगों की बोलियों के मेल से मुम्बई संस्कृति की इस भाषा का क्या कहना! “बोले तो, इसमें हिंदी की मिठास के साथ मराठी का मीठ (नमक) और गुजराती की तीखाश (तीखापन) भी है भिडु, (साथी, दोस्त) क्या!!”

जितनी सहनशक्ति मुम्बईकरों में है उतनी शायद ही देश के किसी और शहर के बाशिंदों में हो| खचाखच भरी लोकल में चिपचिपाते पसीने के बीच वे रोज़ घंटों सफ़र करते हैं, हमेशा वक्त से आगे दौड़ने की कोशिश करते हैं, गलाकाट स्पर्धा में खुद को साबित करने के लिए संघर्ष करते हैं, मगर उनके माथे पर कभी सिलवटें नहीं दिखतीं| भीड़ के बीच के समँदर मेंबूँद जैसा व्यक्तित्व होने के बावजूद खुश और संतुष्ट रहने की अदा कोई मुम्बई से सीखे|इसीलिए यहाँ तमाम वजहें होने के बावजूद झगड़ा-फ़साद, मार-काट, तकरार जैसे नज़ारे नहीं के बराबर हैं|हर कोई भीड़ में रहकर भी अकेला है और दूसरों की किसी भी बात को मन में नहीं लेता| मुम्बईकरों का भाईचारा ही मुम्बई को कॉस्मोपॉलिटन कैरेक्टर बनाताहै| देश के हरप्रदेश, क्षेत्र, धर्म, जाति और समुदाय के लोग यहाँ रहते हैं, मगर मुम्बई ने उन्हें एक कर दिया है| वे एक दूसरे के त्यौहार मनाते हैं, रस्में निभाते हैं और मज़बूतरिश्तों में ढल जाते हैं| झोपड़ियों, चॉलों, फ्लैटों, डुप्लेक्स आलीशान बंगले हर जगह यही आदत पनपी है| बिल्डिंगोंमें रहने वालों के बारे में भले ही यह कहा जाता हो कि वे बरसों तक अपने पड़ोसी को नहीं जानते हों, लेकिन ज़रुरत पड़ने पर मदद का हाथ ज़रूर बढ़ाते हैं| किसी को मुश्किल में देखकर बहुत से कदम थम जाते हैं और दूरियाँ मिट जाती हैं| यही भाईचारा तो मुम्बई की जान है| भाईचारे के साथ मुम्बई का अनुशासन एक मिसाल है अन्य शहरों के लिए| बिना अनुशासन के तो मुम्बई जैसे रफ़्ता रही खोदेगी| र जगह योग की मुद्रामें लाइन, न कोई लाइन तोड़ता है न धैर्य खोता है|महिलाएँ भी काउंटर पर जाकर लेडीज़ फर्स्ट का फायदा नहीं उठातीं| सीनियर सिटीजन में तो कितने ही ऐसे हैं जो खुद को बूढ़ा कहलाना पसंद नहीं करते और जवानों की तरह लाइन में लगे रहते हैं|

एकजुटता की प्रतीक चॉल…..

मुम्बई से अगर चॉल शब्द हटा दिया जाए तो मुम्बई की पहचान और इतिहास दोनों ख़त्म हो जाएँगे| चॉल मुम्बईकरों की एकजुटता का उदहारण है| वरनादस बाई दस के कमरे में दस पंद्रह लोगों का एक साथ रहना क्या संभव है?चॉल ने कितनी ही महान हस्तियों को संघर्ष के शुरूआती दिनों में पनाह दी है| फिल्मी दुनिया के तो ज़्यादातर कलाकारचॉल में ही रहकर फिल्मी संघर्ष करते थे| उन दिनों आठ आने की चार रोटियाँ और उसके साथ दाल फ्री मिलती थी और कलाकारोंमें लगन ऐसी कि अगर स्टूडियो के चक्कर काटते रात हो जाए तो वहीं स्टूडियो केबंद शटर के सामने ही लम्बी तानकर सो जाते थे| ऐसे समर्पित कलाकार इस समय फिल्म इंडस्ट्री की शान हैं|

मुम्बई सभी को लुभाता है| कई लेखक,कवी यहाँ फिल्मी लेखक और फिल्मी गीतकार बनने आये| प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, ख़्वाजा अहमद अब्बास, राही मासूम रज़ा से लेकर आज की युवापीढ़ी तक इसी आकर्षण में बँधी चली आ रही है| हर साल पाँच छै: हज़ार लड़के, तीन-चार हज़ार लड़कियाँ यहाँ मॉडलिंग, टी वी सीरियल और फिल्मों में अपना भाग्य आज़माने आते हैं| कुछ को ब्रेक मिलता है, कुछ को नहीं| अबयादगार फ़िल्में भी नहीं बनतीं| आवारा, शहर और सपना, सात हिन्दुस्तानी, श्री चार सौ बीस, मुग़ले आज़म, पाकीज़ा जैसी फिल्में तमाम तकनीकी सहूलियत और नए-नए फिल्मी आविष्कारों केबावजूद फिल्मइंडस्ट्री नहीं बना पा रही है|

मैंने पूरे भारत का भ्रमण किया है पर ट्रेफ़िक की जो व्यवस्था मुझे मुम्बई में दिखी वो और कहीं नहीं दिखी| यहाँ रफ़्तार के तेवर ऐसे कि फ़ास्ट भी धीमा लगता है इसीलिए‘बड़ाफास्ट’ सिर्फ मुम्बई में ही मिलेगा| अपने मुहाने पर ठहरे समँदर जैसे खुले दिमाग़ वाला यह शहर दिन भर दौड़ता है लेकिन इस दौड़ में ज़िन्दग़ी कभी पीछे नहीं रहती| ख़तरों से खेलने के बावजूद सब महफ़ूज़ हैं यहाँ|मुम्बई दुनिया का पहला शहर है जहाँ लेडीज़ स्पेशल ट्रेन चली है|

मुम्बई की बारिश के क्या कहने| यहाँ चार महीने आसमान पर बादल ऐसे डेरा जमा लेते हैं जैसे बनजारे अपने तम्बू गाड़ते हैं| यहाँ की बारिश के लिए कहा जाता है कि मुम्बई की बरसात का क्या ऐतबार….. यह मानो मुम्बई की फितरत और इसके कैरेक्टर को परिभाषित ही नहीं करता बल्कि इसकीअल्हड़और अलमस्त आनंद भरी छबि को भी पेश करता है|इस मौसम का मज़ा लेने दूर-दूर से लोग यहाँ उसी तरह आते हैं जैसे पहाड़ोंपर लोग बर्फ़बारी देखने जाते हैं| जून में पहले लोकल बादल आकर मुम्बई को सौंधी खुशबू से सराबोर करते हैं फिर दक्षिण भारत से मॉनसून की पहली दस्तक यहीं सुनाई देती है| मॉनसून आते ही ‘टप टप गिरती बूँदों’ का सम्मोहन मुम्बई करों को समँदर के तटों पर ले जाता है जहाँ उमड़ती लहरों औरबरसते पानी में भी न जाने कैसे कोयले की आँच में सिंकते भुट्टों की खुशबू होती है….. भुट्टे वाले बरसात भर मालामाल होती रहते हैं| मुम्बई की बारिश नींद को गहरा और ज़िन्दग़ी को बिंदास बनाती है|

मुम्बई में तरह-तरह के व्यवसाय, पेशे, शेयर बाज़ार, फिल्में, संगीत, लोकल रेल, थियेटर, होटल, मॉडलिंग,अंडरवर्ल्ड, मल्टीनेशनल, डिज़ाइनिंग, एक्सपोर्ट्स, सॉफ्टवेयर, एनीमेशन, हेल्थकेयर, स्किनक्लीनिक, कॉलसेंटर जैसे क्षेत्र तेज़ी से उभरे हैं जिन्होंने मुम्बई को बदल डाला है| फिर भी संघर्ष करने वालों के लिए मुम्बई की रहमदिली में फ़र्क नहीं आया है| आज भी जेब में चंद पैसे खनखनाते संघर्ष करने वाले वड़ापाव या ऊसलपाव से पेट भर फुटपाथ, स्टेशनों के प्लेटफॉर्म या पाइपलाइनों के अंदर बसेरा कर लेते हैं|

बांद्रा वर्ली सी लिंक का रोमांचकारी सफ़र, सोपऑपेरा, सिंथेटिक, हीरा और सराफ़ा बाज़ार, रिलायंस की व्यापारी दौड़, मोबाइल क्रांति और पूरे भारत से आये लोगों मारवाड़ी, सिंधी, पंजाबी, गुजराती, बिहारी,उत्तरप्रदेशीय संस्कृति में डूबी मुम्बई एक नगर नहीं एक पूरी की पूरी सभ्यता है| मुम्बई सबको अपने दिल में जगह देती है| राजनीतिक दाँवपेंच, भाषा और प्रांत की दुहाई देकर खुद को मुम्बई के असली वासी कहने वाले लोग कुछ भी कहते रहें पर यह हकीकत है जो एक बार मुम्बई आ गया, बस वो मुम्बई का ही होकर रह जाता है|

– संतोष श्रीवास्तव

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